बेदी का सियासी सफ़र शुरू होने से पहले ख़त्म?

  • 10 फरवरी 2015
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भारतीय जनता पार्टी पिछले साल युद्ध जीती लेकिन आज छोटी लड़ाई हार गई.

आम चुनाव में भारी जीत के बाद भाजपा ने विधानसभा के तीन चुनावों में भी जीत हासिल की.

लेकिन पार्टी को पहला कड़ा मुक़ाबला दिल्ली विधान सभा में आम आदमी पार्टी ने दिया और पार्टी ये लड़ाई बुरी तरह से हार गई.

संसद के चुनाव में ज़बरदस्त जीत के बाद तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में कामयाबी के कारण शायद पार्टी का आत्मविश्वास आसमान को छू रहा था. दिल्ली के नतीजों के बाद इसके पैरों तले की ज़मीन खिसकती नज़र आती है

एक ओर भाजपा की मुख्य मंत्री पद की उम्मीदवार किरण बेदी ने कहा है कि ये नतीजे मोदी सरकार पर मत नहीं हैं. तो दूसरी ओर भाजपा नेताओं ने भी पहले से कह रखा है कि ये चुनाव मोदी सरकार पर मत नहीं होगा.

नौ महीने की सरकार

दिल्ली चुनाव के हार के लिए भाजपा के अंदर लोग किरण बेदी को ज़िम्मेदार मान रहे हैं.

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भाजपा नेता कोई भी सफ़ाई दें सब जानते हैं कि पार्टी ने इस चुनाव को जीतने के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया था. पार्टी के लिए ये आन की लड़ाई थी. इसलिए हार सहन करना पार्टी के लिए कठिन हो सकता है.

हार के बाद विशेषज्ञ कह रहे हैं कि पार्टी का ये तर्क कि ये नरेंद्र मोदी की नौ महीने वाली सरकार पर मैंडेट नहीं है, खोखला दावा लगता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी रैलियों में वोटरों से ख़ुद अपील की थी कि वो वोट भाजपा को दें. इसके इलावा पार्टी ने चुनावी प्रचार के लिए वरिष्ठ मंत्रियों और सांसदों को मैदान में उतारा था.

हार के लिए बेदी जिम्मेदार?

एक राय ये है कि किरण बेदी को लाने का मक़सद पार्टी के हारने की स्थिति में सारी ज़िम्मेदारी उन पर डालना और मोदी को इस हार के नुक़सान से बचाना था.

लेकिन मीडिया और जनता कुछ और ही मानती है. वह नरेंद्र मोदी और अमित शाह को इसका ज़िम्मेदार मान रही है.

किरण बेदी को चुनाव बिलकुल पास आने पर पार्टी में लाना और मुख्यमंत्री पद का उमीदवार बनाना ग़लत साबित हुआ.

बेदी को लाने वाले वित्त मंत्री अरुण जेटली थे लेकिन पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने ख़ुद उनके नाम की स्वीकृति दी थी और चुनाव की रणनीति की बागडोर ख़ुद उन्होंने संभाल ली थी.

लेकिन इसमें उन्हें बलि का बकरा बनाना सही नहीं होगा. उन्हें दिल्ली भाजपा के नेताओं का सहयोग नहीं मिला. उन्हें न तो पार्टी में अपनी साख जमाने का समय मिला और न ही कार्यकर्ताओं से जुड़ने का वक़्त मिला.

अमित शाह को धक्का

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मेरे विचार में इस हार से पार्टी में अमित शाह की साख कमज़ोर होगी.

भाजपा के दिल्ली नेता ये मानते हैं कि अमित शाह को धक्का लगना ज़रूरी था.

इन नेताओं के अनुसार वो पार्टी के बड़े नेताओं की नहीं सुनते और सारे बड़े फ़ैसले नरेंद्र मोदी के साथ मिल कर ख़ुद ही लेते हैं.

किरण बेदी को लाने के पीछे जिसका भी हाथ रहा हो, वो केजरीवाल के मुक़ाबले में बेअसर साबित हुईं.

किरन बेदी की दबंगई

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पूर्व पुलिस अफ़सर होने के कारण किरन बेदी का चुनावी रैलियों में आला अफ़सर और दारोग़ा वाला रुख़ साफ़ दिखाई दिया जो जनता को पसंद नहीं आया.

आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष ने कहा कि किरण बेदी का नाम आने के बाद पहले उनके ख़ेमे में चिंता हुई लेकिन उन्हें मालूम था कि जैसे वो टीवी पर अपना मुंह खोलेंगी और सभाओं को सम्बोधित करेंगी उनकी कमज़ोरियाँ आम आदमी पार्टी को फ़ायदा ही पहुंचाएगी.

और हुआ भी ऐसा ही. मोदी से प्रेरित होकर उन्होंने भी अपने पूर्व साथी केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमले किए जो उनकी पार्टी पर भारी पड़े.

सियासी सफ़र

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अब सवाल ये है कि यहाँ से किरण बेदी कहाँ जाएंगी? भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अन्ना हज़ारे की मुहिम में केजरीवाल और वो आगे-आगे थे.

केजरीवाल ने 2013 में सियासत का रास्ता चुना लेकिन बेदी राजनीति में अभी-अभी आई हैं. भाजपा के भीतरी सूत्रोें के अनुसार मोदी सरकार उन्हें दिल्ली या किसी और राज्य का राज्यपाल बना सकती है.

इस हार से किरण बेदी का सियासी सफ़र शुरू होने के तुरंत बाद ही कहीं ख़त्म ना हो जाए.

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