दिल्ली चुनाव में 'आप' किसके बूते जीती?

  • 12 फरवरी 2015
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दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों का विश्लेषण करें तो ये मालूम पड़ता है कि शहर के अलग अलग सामाजिक तबकों के बीच एक फ़ासला दिखता है.

ऐसा नहीं है कि आम आदमी पार्टी को मिला जनादेश समाज के किसी ख़ास तबके का उसके पक्ष में ध्रुवीकरण ही है. यह बढ़ा चढ़ाकर कही गई बात है और ग़लत है.

आम आदमी पार्टी की ज़बर्दस्त जीत के लिए ग़रीबों और समाज के निचले तबके के मतदाताओं से बड़े पैमाने पर समर्थन मिलना है.

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पार्टी को मध्य वर्ग के मतदाताओं का दिल जीतने में भी कामयाबी मिली है और उसने उच्च वर्ग के बीच भी अपनी जगह बनाई है.

सीएसडीएस ने चुनाव बाद जो सर्वेक्षण कराए थे, उससे पता चलता है कि 'आप' को ग़रीब तबके के मतदाताओं के बीच बीजेपी की तुलना में 43 फ़ीसदी की बढ़त हासिल थी.

आंकड़ें बताते हैं कि दिल्ली के ग़रीब तबके से आने वाले मतदाताओं का 22 फ़ीसदी ही बीजेपी के पक्ष में था जबकि 65 फ़ीसदी ग़रीबों ने 'आप' का साथ पसंद किया.

बीजेपी का प्रदर्शन

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मध्य वर्ग के वोटरों के बीच दोनों पार्टियों का फ़ासला तुलनात्मक रूप (14 फीसदी) से कम था लेकिन आकार के लिहाज़ से यह ख़ासा महत्वपूर्ण है.

लेकिन उच्च मध्य वर्ग के मतदाताओं के बीच बीजेपी का प्रदर्शन बेहतर रहा है. यहां दोनों पार्टियों के बीच का फ़ासला घटकर दो फ़ीसदी रह गया है.

दिल्ली के अलग-अलग क्षेत्रों से उभरने वाली तस्वीर भी इसी रवायत की ओर इशारा करती है. ग्रामीण दिल्ली में आम आदमी पार्टी को 50 फ़ीसदी वोट मिले हैं.

'आप' को 57 फ़ीसदी

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जबकि 2013 में इसी इलाक़े में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया था. डीडीए के एलआईजी इलाक़ों और झुग्गी झोपड़ी कॉलोनियों में आप को ज़बर्दस्त समर्थन मिलता दिखता है.

इन इलाकों में 'आप' को 57 फ़ीसदी वोट मिले हैं. यह पूरे राज्य में पार्टी को मिले औसत वोट से तीन फ़ीसदी ज़्यादा है जबकि बीजेपी को 32 फ़ीसदी ही वोट मिल पाए.

मध्य वर्ग के वोटरों और निचल तबक़े के बीच बीजेपी को तवज्जो नहीं मिल पाई. यहां तक कि दिल्ली की कम विकसित कॉलनियों में भी बीजेपी का प्रदर्शन खराब रहा है.

कड़ा मुक़ाबला

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यह साफ़ है कि अनधिकृत कॉलनियों को नियमित करने का बीजेपी का दावा वोटरों को उत्साहित नहीं कर पाया.

दिल्ली के सभ्रांत इलाक़ों में बीजेपी और 'आप' के बीच कड़ा मुक़ाबला देखने में आया लेकिन यहां भी आम आदमी पार्टी को दो फ़ीसदी की बढ़त मिली है.

दिल्ली के विधानसभा क्षेत्रों में एक ही तरह की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठिभूमि वाले वोटर नहीं हैं और भीतरी दिल्ली के ज़्यादातर निर्वाचन क्षेत्रों में मिली-जुली आबादी देखने को मिलती है.

वोट शेयर

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शायद इस वजह से बीजेपी के जनाधार के स्वरूप पर असर पड़ा और इसका नतीजा यह निकला कि पार्टी के वोट शेयर और उसे मिली सीटों में बहुत बड़ा फ़र्क आ गया.

दिल्ली चुनाव को वर्गवाद की राजनीति की शुरुआत क़रार देने से किसी को परहेज़ करना चाहिए और इसके कई कारण भी हैं.

पहला यह कि अमीरों और ग़रीबों के बीच वोटिंग के रुझान में बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं है. मध्य वर्ग में आम आदमी पार्टी को बड़े पैमाने पर वोटिंग हुई है.

चुनावी भाषण

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दिल्ली के सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े तबक़े पर असर रखने वाली कांग्रेस की ज़मीन हासिल करने में 'आप' कामयाब रही.

जबकि बीजेपी उच्च वर्ग के बीच अपने जनाधार से आगे नहीं बढ़ पाई.

दूसरे, यह मानना मुश्किल है कि वर्ग राजनीति ऐसे माहौल में ठहर पाएगी जहां दोनों ही राजनीतिक विरोधी समाज के एक ही तबक़े को अपनी ओर खींचना चाहें.

अगर बिजली-पानी केजरीवाल के चुनावी भाषणों के प्रमुख बिंदु थे तो बीजेपी ने उसी तबक़े से 'जहां झुग्गी, वहां मकान' और जनधन योजना जैसी केंद्रीय योजना के फ़ायदों का वादा किया.

अगर नरेंद्र मोदी ने दिल्ली को एक विश्वस्तरीय शहर बनाने के वायदा किया तो केजरीवाल ने भी मुफ़्त में वाई-फ़ाई सुविधा और कारोबारियों के लिए कम वैट और जांच का वायदा किया.

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