'आठ महीने में ही मोदी ने मायूस कर दिया'

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Image caption प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी मुहिम के दौरान दिल्ली में कई रैलियां की थीं

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत और उसके सियासी निहितार्थों पर पाकिस्तान के उर्दू मीडिया में बीते हफ़्ते ख़ूब चर्चा हुई.

रोज़नामा दुनिया लिखता है कि इन चुनावों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के लिए बड़ा इम्तिहान माना जा रहा था जिसमें वो नाकाम रहे हैं.

अख़बार के मुताबिक़ आम आदमी पार्टी की यह जीत साफ़ करती है कि लोग आठ महीने में ही बीजेपी की सरकार और उसकी नीतियों से मायूस हो गए हैं और अब अपनी समस्याओं के हल के लिए कोई नई सियासी राह तलाश रहे हैं.

'सीखें पाकिस्तानी'

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Image caption शनिवार को आम आदमी पार्टी की सरकार ने शपथ ग्रहण की

इसी विषय पर जंग की राय है कि सूचना और जानकारी के आधुनिक माध्यमों के कारण लोगों में बहुत जागरूकता आई है, अब ऐसे नेता उनकी पसंद बन रहे हैं जो उन्हीं के बीच से हों, उनके जैसी जिंदगी जीते हों, उनके दुख-दर्द और समस्याओं को जानते हों और उन्हें हल करने के लिए पूरी ईमानदारी से काम करने को तैयार हों.

अख़बार के मुताबिक़ पाकिस्तान समेत पूरी दुनिया के पारंपरिक सियासतदानों को इस स्थिति से सबक सीखना होगा.

एक्सप्रेस लिखता है कि भारत में चुनाव न सिर्फ़ पारदर्शी होते हैं बल्कि हर पार्टी अपनी विरोधी पार्टी की जीत को खुले दिल से स्वीकार करती है, तभी तो शुरुआती नतीजों के बाद ही भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को फोन कर बधाई दी.

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Image caption भारत पाकिस्तान में अंदरूनी हस्तक्षेप के आरोपों से इनकार करता है

अख़बार के मुताबिक़ दिल्ली के नतीजे ये भी बताते हैं कि जो सरकार जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती उसे लोग बख़्शते नहीं है, भले ही उसने लगातार पंद्रह साल तक दिल्ली में शासन क्यों न किया हो.

अपने कार्यकर्ताओं को अहंकार न करने की केजरीवाल की हिदायत पर अख़बार ने लिखा है कि पाकिस्तान की सियासी पार्टियों और राजनेताओं को भी इससे सीख लेनी चाहिए.

'भारत का हाथ'

औसाफ़ ने पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता आसिम सलीम बाजवा के इस बयान पर संपादकीय लिखा है कि पाकिस्तान में होने वाली दहशतगर्दी की घटनाओं में भारत शामिल है.

सैन्य प्रवक्ता के मुताबिक़ बलूचिस्तान से लेकर क़बायली इलाक़ों तक प्रतिबंधित संगठन तहरीके तालिबान के पीछे भारत का हाथ है. अख़बार ने लिखा है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को सारे सबूत जमा कर अंतरराष्ट्रीय बिरादारी के सामने पेश करने चाहिए.

गुरुवार को अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की तरफ़ से प्रधानमंत्री शरीफ को फोन किए जाने पर उम्मत लिखता है कि पाकिस्तान के लिए अमरीका की तरफ़ से फ़ौरी मदद यही हो सकती है कि वो भारत की सरपरस्ती में बहुत आगे बढ़ने की बजाय पाकिस्तान और भारत के बीच अपने रिश्तों में संतुलन कायम करे और भारत को ज़रूरत से ज्यादा सैन्य मदद कर देकर क्षेत्र का संतुलन न बिगाड़े.

अख़बार के मुताबिक़ पाकिस्तान इससे ज्यादा अमरीका से ज्यादा कुछ नहीं चाहता.

'सुलगती बीजेपी'

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रुख़ भारत का करें तो दिल्ली के चुनावी नतीजों पर हिंदोस्तान एक्सप्रेस का संपादकीय है- अंदर ही अंदर सुलग रही है बीजेपी.

अख़बार की राय है कि बीजेपी दिल्ली की सत्ता से 16 साल से बाहर है और अगले पांच साल के लिए वो फिर सत्ता से दूर हो गई है.

अख़बार के मुताबिक़ दिल्ली बीजेपी के नेताओ की सबसे बड़ी शिकायत ये है कि उन्हें चुनाव से पहले भरोसे में नहीं लिया गया, खुल कर तो कोई कुछ नहीं कह रहा है लेकिन स्थानीय नेता ये जरूर चाहते हैं कि हार के कारण तलाशे जाएं.

वहीं दिल्ली में सत्ता संभालने वाली आम आदमी पार्टी के लिए हमारा समाज लिखता है- अब आज़माइश की घड़ी है.

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