ये हैं भारत की 'मैकारून क्वीन'

मैकारून क्वीन शॉप, पूजा धींगरा

एक भारतीय अख़बार ने अपने लेख में पूजा ढींगरा को 'द मैकारून क्वीन ऑफ़ इंडिया' कहा. पूजा ने फ्रांसीसी मैकारून केक पहली बार साल 2008 में पेरिस में खाया था. उसके बाद ही उन्होंने तय कर लिया कि वो अपने करियर के रूप में बेकिंग को ही चुनेंगी.

आज सात साल बाद 28 वर्ष की उम्र में पूजा ढींगरा की मुंबई स्थित तीन मैकारून केक शॉप बेहद सफल है. वो मुंबई में तीन और दुकानें खोलने के साथ ही पूरे भारत में अपना कारोबार फैलाना चाहती हैं.

लेकिन एक कम उम्र लड़की के रूप में अपना कारोबार शुरू करना उनके लिए आसान नहीं रहा.

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पूजा ने जब पहली बार फ्रांसीसी मैकारून केक चखा तभी उन्हें ये पता चल गया था कि उन्हें अपने जीवन में क्या करना है. वो साल 2008 था और वो पेरिस में पेस्ट्री शेफ़ का प्रशिक्षण ले रही थीं.

मैकारून बादाम और क्रीम से बनने वाला गोल और छोटा केक है. पूजा के कॉलेज के दोस्तों को पता चला कि उन्होंने कभी मैकारून केक नहीं चखा है तो वो उन्हें पेरिस की सबसे अच्छी मैकारून शॉप में ले गए.

पूजा कहती हैं, "ये थोड़ा नाटकीय लगता है लेकिन मुझे महसूस हुआ कि मैं यही करना चाहती हूँ. मैं भारत जाकर मैकारून बनाना चाहती हूँ. यही मेरा मिशन है."

ये घटना सात साल पुरानी है. इस समय पूजा 28 साल की हैं और मुंबई में तीन मैकारून शॉप की मालकिन हैं. वो इस साल के अंत तक तीन और शॉप खोलने वाली हैं. उनका इरादा पूरे देश में इसकी शाखाएँ खोलना हैं.

वकालत छोड़ी

भारत में एक कारोबारी महिला के रूप में ख़ुद को स्थापित करना पूजा के लिए आसान नहीं रहा.

पूजा मुंबई विश्वविद्यालय में वकालत की पढ़ाई कर रही थीं लेकिन उन्हें लगा कि उन्हें कुछ रचनात्मक करना चाहिए और उन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़ दी.

उन्होंने तय किया कि वो खान-पान के क्षेत्र में अपना करियर बनाएंगी और अपने माता-पिता को राज़ी किया कि वे उन्हें स्विट्ज़रलैंड जाकर हॉस्पिटैलिटी और मैनेजमेंट की पढ़ाई करने दें.

स्विट्ज़रलैंड के केटरिंग कॉलेज में तीन साल पढ़ने के बाद उन्होंने पेरिस के जाने-मने ल कॉर्डॉन ब्लेयू स्कूल में एक साल अध्ययन किया. वापस आने के बाद उन्होंने अपने घर में मैकारून बनाने की अपनी ख़ास विधि विकसित की.

मुंबई का मौसम पेरिस की तुलना में ज़्यादा गर्म और उमस भरा होता है इसलिए उन्हें नरम केक बनाने की विधि विकसित करने में छह महीने लग गए.

वो कहती हैं, "मुझे केक की रेसिपी पर शोध करने में छह महीने लग गए. 60 अलग-अलग विधियों को आजमाने के बाद मुझे कुछ सफलता मिली."

पिता से मदद

इमेज कॉपीरइट BBC World Service

उनके कारोबारी पिता उनके व्यवसाय की शुरुआत में मदद करने के लिए तैयार हो गए. लेकिन कम उम्र लड़की होने की वजह से उनकी मुश्किलें और बढ़ गईं.

वो कहती हैं, "सबसे बड़ी मुश्किल ये थी कि लोग मुझे गंभीरता से नहीं लेते थे. लीज़ पर दस्तख़त करने या मशीन ख़रीदने के लिए अपने पिता की मदद लेनी पड़ती थी."

पूजा को भारत की अफ़सरशाही का भी सामना करना पड़ा. वो कहती हैं, "स्विट्ज़रलैंड में मेरी पढ़ाई के कारण होटलों और हॉस्पिटैलिटी के कामकाज के बारे में मुझे काफ़ी कुछ पता था लेकिन भारत में कारोबार शुरू करने में यहाँ की अफ़सरशाही का सामना करना एक बड़ी बाधा है."

आख़िरकार वो साल 2010 में अपनी पहली मैकारून शॉप खोलने में सफल हो गईं. उन्होंने कर्मचारियों को काम पर रखना शुरू किया और अपनी शॉप का नाम 'ल 15 पतिस्री' उस इलाक़े के नाम पर रखा जहाँ वो अपने पढ़ाई के दौरान रही थीं.

मुफ़्त खिलाया केक

मुंबई में मैकारून के बारे लोगों को ज़्यादा जानकारी नहीं थी इसलिए पूजा ने मुफ़्त में इसके नमूने देने शुरू किए. बहुत कम समय में ही उनके बनाए मैकारून केक लोकप्रिय हो गए.

पूजा ने मैकारून और अन्य तरह के केक बनाने का प्रशिक्षण भी देना शुरू कर दिया. इससे भी उनके कारोबार को फ़ायदा हुआ.

उन्होंने इस कला पर एक किताब भी लिखी जो भारत में बेस्ट सेलर रही. एक अख़बार ने उनपर प्रकाशित एक लेख में उन्हें, 'द मैकारून क्वीन ऑफ़ इंडिया' कहा.

इस समय उनकी शॉप में क़रीब 40 कर्मचारी काम करते हैं और यहाँ मैकारून समेत कई अन्य तरह के केक मिलते हैं.

होड़ से दिक्कत नहीं

Image caption पूजा पाक कला पर किताब भी लिख चुकी है.

उनकी सफलता के बाद मुंबई में मैकारून की कई और दुकानें खुल गई हैं लेकिन पूजा प्रतिद्वंद्विता से घबराती नहीं हैं.

वो कहती हैं, "लोग आपके पहले किए गए कामों की ही नकल कर सकते हैं, आपके विचारों और परिकल्पनाओं की नहीं. इसलिए मुझे होड़ पसंद है. इससे हम हमेशा बेहतर प्रदर्शन करना चाहते हैं ताकि सबसे आगे रह सकें."

पूजा चाहती हैं कि भारत और पूरी दुनिया में अधिक से अधिक औरतें कारोबार में आएँ. वो कहती हैं, "आप जो करना चाहते हैं अगर उसे लेकर आप में जज़्बा है तो आप को उसमें सफलता मिलती ही है."

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