'केजरीवाल भाजपा विरोध की धुरी बन सकते हैं'

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आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गेनाइज़र’ के अनुसार यदि केजरीवाल अपने वादों को निभा पाए तो वो भाजपा-विरोधी ताकतों की धुरी बन सकते हैं.

दिल्ली विधानसभा चुनाव में 'आप' की ज़बरदस्त जीत और भाजपा की करारी हार पर ‘ ऑर्गेनाइज़र’ ने लिखा है कि ये डिज़ाइनर पोशाकों और मफ़लर या एक 'चायवाला' और पूर्व आईआरएस अफ़सर के बीच की लड़ाई नहीं थी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र की टिप्पणी है, “यह लोकतंत्र है जहां एक व्यक्ति ने सरकारी खज़ाने पर भारी पड़ने वाला लोकप्रियता का एजेंडा अपनाया और दूसरे ने सुशासन की विचारधारा के अलावा कोई वादा नहीं किया.”

कवर आर्टिकिल में कहा गया है कि दिल्ली में स्थानीय नेतृत्व की अनुपस्थिति से भाजपा को आंशिक नुकसान हुआ. इसमें ये संकेत भी दिया गया है कि जनसंघ के समय से दिल्ली में मज़बूत रही पार्टी (भाजपा), दिल्ली में बदलते समाज की उम्मीदों के मुताबिक ख़ुद को ढाल नहीं पाई है.

‘ऑर्गेनाइज़र’ ने 10 सवालों की लिस्ट दी है 'जिनके उत्तर नहीं मिले हैं.' पेश हैं इनमें से कुछ सवाल:

सवाल-जवाब: मुख्य अंश

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‘आप’ की भारी बहुमत से जीत के क्या कारण थे?

दिल्ली एक पूर्ण राज्य तक नहीं है, लेकिन सत्ता के गलियारों के बारे में बहुत संवेदनशील रहा है. इसी संवेदनशीलता को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने भी छुआ था. केजरीवाल पर भाजपा के हमले को सत्ता में साझीदारी चाहने वाले एक 'आम आदमी' पर हमले की तरह देखा गया. इससे वो वोटर भी केजरीवाल के पक्ष में चले गए जो आख़िरी क्षण में अपना मन बनाते हैं.

भाजपा की हार मोदी सरकार पर जनमत है?

ऐसा नहीं है.....यह चुनाव मोदी सरकार के ख़िलाफ़ राय ज़ाहिर करने की बजाय, मुख्यमंत्री के रूप में केजरीवाल के पक्ष वोट ज़्यादा था. हालांकि इसमें भाजपा ने अपने 33 प्रतिशत वोटरों को जोड़े रखा, लेकिन उसके लिए चिंता की बात है कि लोकसभा में उसके पक्ष में मतदान करने वाले 13 प्रतिशत अतिरिक्त मतदाता उससे छिटक गए.

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क्या भाजपा को स्थानीय नेतृत्व की गैर-मौजूदगी से सबसे अधिक नुकसान हुआ?

आंशिक रूप से यह सही है....जनसंघ के ज़माने से ही दिल्ली भाजपा का पारम्परिक रूप से गढ़ रही है. लेकिन पार्टी दिल्ली के बदलते समाज की आकांक्षाओं के अनुरूप खुद को ढालने में असफल रही.

क्या ‘आप’ सेक्युलरिज़्म के नाम पर साम्प्रदायिक राजनीति का नया चेहरा है?

दिल्ली के बारे में तो ये सही है....दिल्ली चुनाव में अल्पसंख्यक, खासकर मुस्लिम मतदाताओं ने ‘आप’ को वोट दिया. लेकिन मुसलमानों का यह स्वाभाविक विकल्प नहीं है. कांग्रेस इस दौड़ में ही नहीं थी, इसलिए भाजपा को हराने के लिए उनका वोट आप को गया. यह संभव है कि बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जहां अन्य दल भी हैं, वहां ऐसा न हो. केजरीवाल ने ख़ुद को सेक्युलर साबित करने के लिए हर मौके का इस्तेमाल किया और ध्रुवीकरण किया है.

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केजरीवाल क्या भाजपा-विरोधी ताकतों के अगुवा बन सकते हैं?

'आप' राष्ट्रीय दल के तौर पर अब भी शुरूआती दौर में है. उसने मई 2014 में शुरू हुआ भाजपा का सपना पर विराम लगा दिया, लेकिन वह कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के लिए ख़तरा है, भाजपा के लिए नहीं....यदि केजरीवाल अपने वादों को निभाने में सफल रहते हैं, तो लंबे दौर में वो भाजपा-विरोध के नाम पर ताक़त बनकर उभर सकते हैं.

बहुजन समाज पार्टी जैसी ताक़तों का क्या हुआ?

बसपा, जो 1998 के विधानसभा चुनाव में एक महत्वपूर्ण पार्टी बन गई थी, इस बार अपना पूरा वोट बैंक आप के हाथों गंवा बैठी. लोकसभा के दौरान पंजाब में भी बीएसपी का वोट बैंक आप की ओर खिसका था. पंजाब में मायावती की परीक्षा होगी और इसका उत्तर प्रदेश में भी असर पड़ेगा.

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आप की जीत का संदेश क्या है?

इस चुनावी नतीजे की महत्वपूर्ण बात है व्यवस्थागत मुद्दों और राजनीतिक वर्ग के ख़िलाफ़ आम आदमी का गुस्सा. महंगे चुनावी खर्च और पैसे वाले लोगों को ख़ुश करने की राजनीतिक दलों की 'बाध्यता' भारत में भ्रष्टाचार की जड़ बन चुकी है. इस समस्या से निजात दिलाने का आप दावा करती है, हालांकि इसको परखा जाना अभी बाकी है.

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