क्यों बदली मोदी के भाषण की भाषा

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को दिल्ली में चर्च के एक कार्यक्रम में कहा कि किसी भी धर्म पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

उन्होंने कहा कि सभी धर्मों का सम्मान और सहनशीलता भारत की परंपरा है. भारत का संविधान भी इसी परंपरा से निकला है.

उनका कहना था कि देश में हर धर्म के लोगों को अपने धर्म के मुताबिक़ जीने का अधिकार है. किसी भी स्थिति में उन्हें उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता.

पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार आकार पटेल का विश्लेषण

वीपी सिंह जब प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने भाजपा के बारे में एक बात कही थी जो आज एकदम सही साबित हो रही है.

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जब 1980 के दशक में वीपी सिंह राजीव गांधी को हराने की कोशिश कर रहे थे तो उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी का सहयोग लिया था.

यह वह समय था जब अयोध्या में राम मंदिर के लिए आंदोलन उग्र होता जा रहा था. लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा शुरू की थी.

वीपी सिंह को लगा कि इससे देश को नुक़सान होगा. तब बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ़्तार कराया था.

फिर भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया, जिससे सरकार गिर गई.

धर्मनिरपेक्षता की रक्षा

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इसके बाद वीपी सिंह यह कहने में सक्षम हो गए कि धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए उन्होंने शहादत दी है. बाद का समय उन्होंने ऐसे छोटे समूहों को संगठित करने में बिताया जिनका बुनियादी लक्ष्य भाजपा को हराना था.

एक बार किसी संवाददाता ने उन्हें बताया कि वाजपेयी संयम और सहिष्णुता का प्रचार कर रहे हैं, इसलिए लगता है कि पूरी भाजपा सांप्रदायिक नहीं है.

इस पर वीपी सिंह ने कहा कि भाजपा को हमेशा आक्रामक तरीके से बात करने की ज़रूरत नहीं है. लोगों को भाजपा समर्थकों की बातें सुननी चाहिए. भाषणों में किस तरह की भाषा का उपयोग किया जा रहा है?

इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वरिष्ठ भाजपा नेता मीडिया के सामने कैसा बयान दे रहे हैं. उन्होंने कहा कि ज़मीनी स्तर पर यह काफ़ी ज़हरीला है.

इस हफ़्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सद्भाव और सहिष्णुता पर बोलते सुनकर वीपी सिंह की यह बात मुझे याद आ गई.

चर्चों पर हमलों की बढ़ती ख़बरों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चर्च के एक कार्यक्रम में शामिल हुए.

अपने भाषण में मोदी ने संत घोषित किए गए केरल के दो भारतीयों कुरियाकोस एलियास और मदर यूफ़्रेसिया के बारे में चर्चा की.

चर्च की पहल

मोदी ने कहा कि इन संतों ने ऐसे समय काम किया, जब शिक्षा तक बहुत कम लोगों की पहुंच थी. उस समय उन्होंने मांग की कि चर्च का भी एक स्कूल होना चाहिए. इस तरह उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लिए शिक्षा के दरवाज़े खोले.

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अपने संस्कृत ज्ञान का उदाहरण देते हुए नरेंद्र मोदी ने संस्कृत की उन पंक्तियों का उल्लेख किया, जिनमें खुलेपन और सहिष्णुता की बात की गई है.

स्वामी विवेकानंद को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदू न केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में विश्वास करते हैं, बल्कि वो यह भी मानते हैं कि सभी धर्म सही हैं.

बहुत साल पहले जब मैंने नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार लेते समय इससे जुड़ा सवाल पूछा था तो वह सतर्क हो गए थे. उन्होंने मुझसे कहा कि वो सहिष्णुता पर बात नहीं करना चाहते. उनका कहना था कि इसकी जगह हमें हिंदू स्वीकार्यता पर बात करनी चाहिए क्योंकि सहिष्णुता का स्थान इसके एक पायदान नीचे है.

धर्म का अधिकार

इस भाषण में अपने विचार से पीछे हटते हुए मोदी ने कुछ बातें बहुत साफ़-साफ़ कहीं जो दोबारा याद करने के लिए बहुत ज़रूरी हैं.

उनके शब्द थे, ''हम मानते हैं कि किसी धर्म या विचार को मानने या उसे अपनाने की आज़ादी एक नागरिक के पास है.'' उन्होंने कहा कि उनकी सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि यहां विचारों की पूरी आज़ादी है और हर नागरिक के पास बिना किसी अनुचित प्रभाव में आए हुए किसी धर्म को स्वीकार करने या उसे मानने का निर्विवाद अधिकार हो.

Image caption धार्मिक मामलों पर मोदी कभी कभार ही बोलते हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उनकी सरकार अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक समुदाय के किसी भी धार्मिक संगठन को दूसरों के खिलाफ खुले तौर पर या छिपे तौर पर नफरत भड़काने की इजाज़त नहीं देगी. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार सभी धर्मों को समान सम्मान देगी.

महत्वपूर्ण बात है कि यह बात बहुत ही साफ़गोई से कही गई. प्रधानमंत्री ने कहा कि जब उन्होंने इस विषय पर कुछ कहा तो उन्हें उनके कैबिनेट सहयोगियों और पार्टी तथा संघ परिवार के सहयोगियों की आलोचना का सामना करना पड़ा.

व्यक्तित्व

इस भाषण में मोदी के व्यक्तित्व का एक नया पक्ष सामने आता है जो अक्सर सामने नहीं आता था. वह है उनकी गुजराती भावना. मोदी जब विकास से जुड़े मुद्दों पर बात करते थे, वो अक्सर इसकी चर्चा करते थे.

इस दौरान वह आरएसएस की आर्थिक विचारधारा को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देते थे जिसे दीन दयाल उपाध्याय ने विकसित किया था.

धार्मिक मामलों पर मोदी कभी-कभार ही बोलते हैं, इसलिए उनका यह भाषण महत्वपूर्ण था.

अंतत: हमने नेता की बात सुनी और इससे पता चला कि उनका स्टैंड क्या है. अब हमें निश्चित रूप से यह आशा करनी चाहिए कि मोदी के मातहत और संघ परिवार में उनके दूसरे सहयोगी इसी भाषा का प्रयोग करेंगे.

यह वैसा ही है जैसा वर्षों पहले वीपी सिंह ने देखा था. यहां यह कहना बेकार है कि नेता अपने भाषणों में शांति कायम करने वाले शब्दों का प्रयोग करेंगे.

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