'अंग्रेज़ी बोलना मोदी की कुंठा है'

  • 20 फरवरी 2015
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नरेंद्र मोदी का सौभाग्य यह है कि वह एक ऐसे प्रधानमंत्री के बाद प्रधानमंत्री बने हैं जिनके बोलने पर उनके चेहरे पर कोई उतार-चढ़ाव होते ही नहीं थे.

डॉ. मनमोहन सिंह जैसे भी प्रधानमंत्री रहे हों, वह बहुत कम बोलते थे और बहुत ख़राब वक्ता थे. वह 10 साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे.

उनके लिए हिंदी के बजाए अंग्रेज़ी में बोलना सहज था लेकिन उनका संवाद बिल्कुल भी अच्छा नहीं था.

मोदी एक अच्छे वक्ता हैं और वह शब्दों का चयन भी बहुत सोच-समझकर करते हैं.

लेकिन हाल के दिनों में अंग्रेज़ी के प्रति उनका प्रेम बढ़ा है और ग़लतियां भी.

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नरेंद्र मोदी जानते हैं कि कब किसी पड़ोसी देश के राष्ट्रपति को 'मियां' कहकर संबोधित करना है. वह अपनी राजनीति के हिसाब से शब्दों का चयन करते हैं.

लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की सीमा सामने आ रही है. वे न केवल अपनी भाषा और राजनीति में बल्कि अपने व्यवहार में भी एक तरह के अतिवाद के शिकार हैं.

दिल्ली विधानसभा के चुनाव में उन्होंने कहा था कि पेट्रोल के दाम मेरी ख़ुशनसीबी से घटे हैं, मैं खुशनसीब हूं, आप मुझे चुनिए, बदनसीब को क्यों चुनें.

यह भाषा किसी प्रधानमंत्री को शोभा नहीं देती. आप जिस भी भाषा में संवाद करें, एक बुनियादी मर्यादा होनी चाहिए.

गुजरात दंगों के बाद जब चुनाव आयोग के लोग जाते थे तो वो जेएम लिंगदोह को जेम्स माइकल लिंगदोह और कांग्रेस नेता अहमद पटेल को अहमद मियां पटेल कहते थे.

मोदी की चूक

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इसके बहुत से निहितार्थ निकाले गए. मेरा कहना है कि सार्वजनिक जीवन जीने वाले नेता को भाषा की मर्यादा का ख़्याल रखना चाहिए.

नरेंद्र मोदी अपने शब्दों के चयन में और लहज़े के चयन में चूक करते हैं. अगर प्रधानमंत्री बनने के पहले की बातें भुला भी दें तो ज़्यादा दुखद यह है कि ख़ुशनसीब और बदनसीब तो उन्होंने अभी पिछले महीने कहा था.

अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र में पहली बार हिंदी में भाषण दिया था और बहुत वाहवाही हुई थी. मोदी ने भी विदेशों में हिंदी में भाषण देकर वैसी ही वाहवाही लूटी.

मगर आज़ादी के बाद से हिंदी एक विडंबना की शिकार हुई है, उसकी ताक़त घटती गई है और उसका प्रतीकात्मक गौरव ही सब कुछ मान लिया गया है.

स्थिति यह है कि आपका सारा दस्तावेज़ और कामकाज अंग्रेज़ी में होगा और नीचे दस्तख़त हिंदी में होगा. यह एक मजबूरी भी है.

हिंदी के लिए क्या?

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असल में, इस देश की बुनावट ऐसी है कि अगर करुणानिधि भी प्रधानमंत्री बनें तो लाल क़िले से अंग्रेज़ी में उनका भाषण नहीं चलेगा. तमिल में शायद चल जाए.

देवेगौड़ा तो हिंदी जानते भी नहीं थे. उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद कहा था, ''मैं हिंदी सीखूंगा.''

हिंदी की ऐसी स्थिति हो गई है जैसे किसी से सब कुछ छीन लें और उसकी मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करने लगें.

यही कारण है कि जब प्रधानमंत्री हिंदी में बात करते हैं तो हिंदी वालों को इसकी बेहद खुशी होती है.

लेकिन मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि क्या प्रधानमंत्री ने ऐसी कोई व्यवस्था की है जिससे उच्च शिक्षा हिंदी में हासिल होने लगे.

क्या प्रधानमंत्री ने कोई ऐसी पड़ताल की है कि देश में जितने विश्वविद्यालय हैं, उनमें से कितने वाइस चांसलर 'हिंदीवालाज़' हैं.

बहुभाषी

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हिंदी की सारी क्षमता को राजभाषा विभागों तक सीमित कर दिया गया है जो एक तरह से अनुवाद विभाग हैं.

हिंदी धीरे-धीरे सत्ता विमर्श से बाहर होती जा रही है और इसे मीडिया और लोकप्रियतावाद की भाषा में तब्दील किया जा रहा है.

विशेष सांस्कृतिक-ऐतिहासिक स्थितियों और एक बहुभाषी समाज होने के नाते हर पढ़ा-लिखा हिंदुस्तानी बहुभाषी नहीं तो द्विभाषी ज़रूर होना चाहता है.

अगर कोई हिंदीभाषी है तो वह कलकत्ता या मुंबई में रहते हुए बंगाली और मराठी भी जान जाता है. ऐसे ही एक मराठी व्यक्ति अगर दिल्ली में आता है तो उसे हिंदी भी आ जाती है.

इस पर हमें गर्व करना चाहिए लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इसे हमारे यहां बढ़ावा नहीं दिया जाता.

मोदी और राजीव गांधी

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बोलने में ग़लतियों को लेकर दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गांधी की भी बहुत खिल्ली उड़ती थी. हालांकि राजीव गांधी और नरेंद्र मोदी की पृष्ठभूमि में काफ़ी अंतर है.

राजीव गांधी की खिल्ली उड़ती थी उनकी हिंदी पर और नरेंद्र मोदी खिल्ली उड़ती है उनके अंग्रेज़ी ज्ञान पर. मेरी मोदी के साथ इस मुद्दे पर सहानुभूति है.

असल में एक देश, एक धर्म, एक संस्कृति और एक भाषा पर जो ज़ोर है, यह भारतीय सच्चाई के बिल्कुल उलट है. यह मोदी की राजनीतिक पृष्ठभूमि की बुनियादी गड़बड़ी है.

मोदी का हाल के दिनों में अंग्रेज़ी में संवाद करना उनकी मजबूरी कम, अंग्रेज़ी ज्ञान को लेकर उनकी ग्रंथि ज़्यादा है. इसीलिए वह अंग्रेज़ी में बोलने की खामखां कोशिश करते हैं.

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श्रीलंका के राष्ट्रपति के आने पर अंग्रेज़ी में बोलने की कोई ज़रूरत नहीं थी. मोदी ने अंग्रेज़ी में जबकि श्रीलंकाई राष्ट्रपति ने सिंहली में बोला.

नरेंद्र मोदी की समस्या यह है कि उन्हें लगने लगा है कि अंग्रेज़ी की दक्षता दिखाए बिना, वह दिल्ली के उसी सत्ता के गलियारे में बेगाने हैं, जिसके बेगानेपन को वह अपनी विशेषता बताते थे.

यह वाक़ई दुखद है और उनसे मुझे सहानुभूति है.

(हिंदी के प्रोफ़ेसर रहे पुरुषोत्तम अग्रवाल के साथ बीबीसी रेडियो एडिटर राजेश जोशी की बातचीत के आधार पर)

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