मप्र: शिवराज का राज बचेगा कि जाएगा?

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मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में इन दिनों राजनीतिक उथल-पुथल मची है. निशाने पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हैं.

अब तक अलग-अलग गुटों में बंटे कांग्रेसी नेता व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) में हुए कथित घोटाले को लेकर अचानक से एक हो गए है और उन्होंने मुख्यमंत्री पर हमला बोल दिया है.

दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एक साथ मिलकर मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ कथित घोटाले में मामला दर्ज करने के साथ ही उनके इस्तीफ़े की मांग की है.

शिवराज सिंह ने त्यागपत्र देने से इंकार करते हुए अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों को 'घिनौना षड़यंत्र' बताया है.

व्यापम घोटाले में अपना नाम घसीटे जाने से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कम से काम ऊपरी तौर पर तो विचलित नज़र नहीं आना चाहते हैं.

भाजपा आलाकमान हाल-फ़िलहाल इस स्थिति में नहीं है कि शिवराज के स्थान पर किसी और नेता की ताजपोशी करा दे.

शिवराज स्वयं भी अपनी पार्टी की इस हक़ीक़त से वाकिफ़ हैं.

कांग्रेस को मिला सहारा

इसका पहला कारण तो यह है कि पार्टी कभी नहीं चाहेगी कि एक चर्चित मुख्यमंत्री को पद से हटवा देने का श्रेय डूबती हुई कांग्रेस के खाते में चला जाए और भाजपा के लिए मध्य प्रदेश जैसे राजनीतिक रूप से स्थिर राज्य में अस्थिरता फ़ैल जाए.

इससे कांग्रेस को राज्य में फिर पैर जमाने का मौका मिल सकता है. दूसरे यह कि शिवराज सिंह के विकल्प को लेकर स्थिति वैसी ही है जैसी कि दिल्ली चुनावों में मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार के चयन को लेकर थी और बाद में पार्टी को उसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ा.

मध्य प्रदेश में जैसी सहमति शिवराज सिंह के नाम को लेकर रही है वैसी किसी और नेता के पक्ष में नहीं रही. मुख्यमंत्री इस सच्चाई से परिचित भी हैं और उसका लाभ भी लेते रहे हैं.

मुख्यमंत्री के नजदीक जिस तरह का साम्राज्य खड़ा होता गया है वह भी शिवराज के इसी आत्मविश्वास का परिणाम है.

भाजपा के समीकरण बदले

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अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि दिल्ली के चुनाव परिणामों ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की ऐसी किसी भी पहल पर रोक लगा दी है कि भाजपा शासित राज्यों में किसी परिवर्तन को अंजाम दिया जाए. इस कारण से न सिर्फ शिवराज ही बल्कि वसुंधरा राजे और रमन सिंह भी राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सुरक्षित हो गए थे.

अरविंद केजरीवाल ने जीत तो आम आदमी पार्टी को दिलवाई पर समीकरण भाजपा के बदल कर रख दिए. भाजपा दिल्ली के सदमे से उबर ही नहीं पा रही है.

शिवराज सिंह की चर्चा करें तो एक वक्त ऐसा भी था जब लोकसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर पार्टी के एक खेमे में मोदी के साथ-साथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम की चर्चा भी सार्वजनिक तौर पर की जा रही थी.

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लालकृष्ण आडवाणी उस समय शिवराज के नाम की ज़्यादा पैरवी कर रहे थे. इस समय हालत बदले हुए हैं. व्यापम में हुए भर्ती घोटाले को लेकर कांग्रेस द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों ने मुख्यमंत्री के विरोधियों को राज्य में नेतृत्व परिवर्तन का दबाव बनाने के लिए फिर से मज़बूत कर दिया है.

बैकफ़ुट पर शिवराज सरकार

मुख्यमंत्री समर्थक खेमे का यह मानना सही भी हो सकता है कि कांग्रेस नेताओं को सारे दस्तावेज भाजपा के ही शिवराज विरोधी तत्वों ने उपलब्ध कराए होंगे.

शिवराज सिंह का दावा चाहे जो भी हो, कांग्रेस ने जो अभियान चलाया है, उसका असर भोपाल में दिखाई देने लगा है.

समूची सरकार और पार्टी, मुख्यमंत्री बचाओ अभियान में जुट गई है. लोग स्वाइन फ़्लू से मर रहे हैं और मंत्री सरकार के प्रवक्ताओं के रूप में कांग्रेस के आरोपों की सफ़ाई देने में जुटे हुए हैं.

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देखना होगा कि कांग्रेस की 'शिवराज-मुक्त मध्य प्रदेश मुहिम' का मुक़ाबला करने में भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व मुख्यमंत्री का कितनी दूरी तक साथ देता है.

बात इतने वर्षों के बाद बाहर निकली है तो निश्चित ही दूर तलक भी जाएगी. मध्य प्रदेश की लड़ाई और तेज हो सकती है और भोपाल से बाहर निकल कर दिल्ली पहुंच सकती है.

विचित्र संयोग है कि एक ही घोटाले की आंच ने भोपाल में राजभवन और मुख्यमंत्री निवास दोनों को एक साथ अपनी चपेट में ले लिया है.

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