कश्मीरी दस्तकारीः न क़दरदान, न ख़रीदार!

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पूरे विश्व में अपना अलग वजूद रखने वाली कश्मीर घाटी का हस्तशिल्प उद्योग आज कल अपने बचाव के लिए गुहार लगा रहा है.

सैंकड़ों सालों से घाटी के हस्तशिल्प उद्योग को यहाँ के मर्द, औरत, बच्चे और बूढ़े अपनी उंगलियों के हुनर से ज़िंदा रखे हुए हैं.

लेकिन उनकी संख्या भी अब कम हो रही है. इस उद्योग से जुड़े लोग सरकार की और से कोई ख़ास मदद न मिलने से मायूस हैं.

उनका कहना है कि पिछले 25 सालों से जारी कश्मीर के हालात की वजह से उद्योग को बहुत नुक़सान हुआ है.

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कश्मीर की दस्तकारी से जुड़े अफ़राद को अब ये डर सताने लगा है कि कहीं आने वाले समय में ये उद्योग दम न तोड़े और कश्मीर अपनी एक शानदार पहचान से महरूम हो जाए.

श्रीनगर के ग़ुलाम नबी शाह पिछले 54 सालों से क़ालीन बनाने के काम से जुड़े हैं. वे कहते हैं कि उनके मोहल्ले में 40 फ़ीसदी लोग क़ालीन बनाने का काम करते थे लेकिन अब वो अकेले हैं जो क़ालीन बनाते हैं.

वह कहते हैं, "तीस साल पहले मेरे साथ मेरे कारख़ाने में 300 से ज़्यादा कारीगर काम करते थे. लेकिन आज मैं अकेला हूँ. इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि दस्तकारी से जुड़े लोगों की तरफ़ सरकार ने कभी तवज्जो नहीं दी."

कश्मीरी दस्तकारी

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ग़ुलाम नबी का कहना है, "इस काम में कारीगर की जो कमाई होती है उससे उसका पेट नहीं भरता है, यही कारण है कि सबने इस काम को छोड़ दिया. सरकार से क़र्ज़ मांगते हैं तो चक्कर काटने के सिवा और कुछ मिलता नहीं."

शाह कश्मीर में पिछले 25 सालों के ख़राब हालात को भी क़ालीन उद्योग की ख़स्ताहाली की वजह मानते हैं.

कश्मीर के हस्तशिल्प उद्योग में क़ालीन को 'कश्मीरी दस्तकारी का ताज का मुक़ाम' हासिल है.

कश्मीर घाटी के ज़िला अनंतनाग में इस काम के साथ लोगों की एक बड़ी तादाद रोज़ी रोटी के लिए जुड़ी हुई है लेकिन इस काम से दो वक़्त की रोटी न मिलने का भी इनको गिला है.

ख़ूबसूरत नक़्शे

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अनंतनाग ज़िले के अनचिड़ोरा इलाक़े के मोहम्मद अकबर लोन पिछले 30 साल से सोज़नी का काम कर रहे हैं लेकिन अब वह इस काम को छोड़ने का रास्ता तलाश रहे हैं.

उनका कहना है, "आज तक इस काम को किसी तरह से आगे बढ़ाया लेकिन अब इस काम को मैं नहीं कर सकता. हमारी उंगलियां ख़ूबसूरत नक़्शे बनातीं हैं लेकिन फिर बाज़ार में उस की ख़ूबसूरत क़ीमत नहीं मिलती. पूरा महीना काम करने के बाद दो हज़ार की कमाई होती है."

ग़रीब लड़कियों की एक बड़ी संख्या भी इस उद्योग से जुड़ी हुई है. यहाँ कई सारी लड़कियां और महिलाएं सोज़नी का काम करती हैं.

कश्मीर के इस उद्योग को ज़िंदा रखने की तमन्ना भी इनको इस काम की तरफ़ खींच रहा है लेकिन अब इन्हें लगता है कि इस काम से इनका सिर्फ़ वक़्त ख़राब होता है.

ख़राब हालात!

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46 वर्षीया परवीन कहती हैं, "इस काम से अब लोग इस क़दर भाग रहे हैं कि इस काम के साथ जुड़े व्यक्ति के साथ कोई शादी करने के लिए तैयार नहीं होता है."

वह आगे कहती हैं, "सरकार इस उद्योग को ज़िंदा रखने के लिए कुछ नहीं कर रही है."

कश्मीर के मत्ती पोरह के अब्दुल मजीद ने इस काम को कुछ साल पहले छोड़ दिया था. वह क़ालीन बनाने के काम के साथ जुड़े थे.

सरकार भी इस बात से इंकार नहीं करती है कि 25 सालों के ख़राब हालात ने उद्योग को नुक़सान पहुंचाया लेकिन साथ ही उद्योग को आगे बढ़ाने के दावे कर रही है.

अच्छी कमाई!

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कश्मीर की दस्तकारी विभाग के निदेशक कहते हैं, "हमने क़ालीन उद्योग से जुड़े लोगों के लिए क़र्ज़ देने की योजना की शुरुआत की है जिसके तहत हम एक कारीगर को एक लाख रुपये का लोन देते हैं जिसका सूद पांच साल तक सरकार ख़ुद अदा करती है और इस सिलसिले में पिछले तीन साल में हमने 33 हज़ार कारीगरों को लोन दिया हैं."

इंस्टिट्यूट ऑफ़ कॉरपोरेट टेक्नोलॉजी ऑफ़ कश्मीर के सीनियर कोर्डिनेटर आसिफ़ गौहर ख़ान मानते हैं कि कश्मीर की नई पीढ़ी क़ालीन के काम को अपना भविष्य नहीं बनाना चाहती क्योंकि ये काम अब अच्छी कमाई का ज़रिया नहीं समझा जाता है.

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