बजटः आयकर में छूट की सीमा बढ़ेगी?

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सोमवार से मोदी सरकार का पहला पूर्ण बजट पेश होने जा रहा है. नई सरकार के इस पूर्ण बजट से कारपोरेट जगत और आम लोग, दोनों ने ही बहुत सारी उम्मीदें लगा रखी हैं.

भारत के वित्त मंत्री अरुण जेटली के सामने फौरी तौर पर राजस्व घाटे पर काबू पाने और टैक्स को लेकर उद्योग जगत और आम लोगों को राहत देने की चुनौती है.

दोनों को उम्मीद है कि यह निवेश को प्रोत्साहित करने वाला और देश में चहुंमुखी विकास लाने वाला होगा.

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हालांकि सरकार के सामने खुद राजकोषीय घाटे पर काबू पाने, लचर आधारभूत संरचनाओं को मजबूत करने, मैन्यूफ़ैक्चरिंग को बढ़ाने और ग़रीबों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा एवं कौशल विकास वाले कार्यक्रमों का समर्थन करना एक चुनौती है.

विदेशी निवेशक बजट में कुछ कड़े उपाय की उम्मीद लगाए हुए हैं. शेयरों के अप्रत्यक्ष ट्रांसफ़र पर रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स (पिछली तारीख़ से टैक्स) को ख़त्म किए जाने और वर्तमान निवेश से संबंधित गतिविधियों को लेकर चल रही अनिश्चितता के अंत होने की उम्मीद की जा रही है.

इस बात पर स्पष्टता ज़रूरी है कि भारत में मौजूद सम्पत्तियों में कैसे महत्वपूर्ण वृद्धि होगी क्योंकि यह वैश्विक विलय और अधिग्रहणों पर असर डालता है.

टैक्स प्रावधान

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यह देखना दिलचस्प होगा कि सामान्य परिवर्जन रोधी नियम (गार) पर सरकार क्या रुख़ अख़्तियार करती है क्योंकि इन नियमों को कम से कम एक या दो साल के लिए टाल देने की आशा की जा रही है.

इसके अलावा ‘गार’ के विभिन्न पहलुओं पर दिशा-निर्देश और स्पष्टता की ज़रूरत है, ख़ासकर उन समझौतों पर जो इस क़ानून के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं.

विशेष आर्थिक क्षेत्रों (सेज) में उद्योगों के लिए न्यूनतम वैकल्पिक टैक्स (मैट) को ख़त्म करना चाहिए या उन्हें सीमित करना चाहिए.

इस बात को स्पष्ट करने की सख़्त ज़रूरत है कि मैट विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेशकों (एफपीआई) पर लागू नहीं होगा, नहीं तो, इससे लंबा चलने वाला विवाद और मुकदमेबाजी शुरू हो जाएगी.

विवाद निपटान तंत्र

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औद्योगिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए मैन्युफ़ैक्चरिंग और आधारभूत संरचना क्षेत्रों में चुनिंदा टैक्स प्रोत्साहन दिया जा सकता है, जैसे निवेश भत्ता, नए रोजगार और कौशल विकास के लिए छूट आदि.

आजकल, किसी भी तरह के टैक्स विवाद से निपटने के लिए लगने वाला समय, कारोबार के लिए एक बड़ी चिंता का सबब है.

अथॉरिटी फ़ॉर एडवांस्ड रूलिंग (एएआर), एडवांस्ड प्राइसिंग एग्रीमेंट्स (एपीए) और म्यूचुअल एग्रीमेंट प्रोसीज़र (एमएपी) समेत तमाम मौजूदा विवाद हल करने वाले तंत्र को मजबूत करने की ज़रूरत है.

हज़ारों लंबित टैक्स विवादों का समयबद्ध प्रभावी हल समय की मांग है, जो समय, परिश्रम और संसाधनों के मामले में करदाता और कर संग्रहकर्ता, दोनों पर भारी पड़ते हैं.

आय पर छूट की सीमा

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टैक्स नीति में जो सबसे बड़े सुधार पर सबकी नज़र है, वो है वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी).

उम्मीद की जा रही है कि तमाम अप्रत्यक्ष करों को जीएसटी अपने आप में समेट लगेगा और यह अनुपालन एवं क्रेडिट तंत्र को आसान बनाने में मदद करेगा.

इसलिए, सरकार को जीएसटी के लिए एक कार्य योजना रखनी चाहिए.

आम लोग भी टैक्स कटौती में कुछ राहत की उम्मीद लगाए बैठे हैं. आयकर छूट की सीमा को ढाई लाख रुपए से बढ़ाकर तीन लाख रुपए करने और विभिन्न बचत एवं निवेशों पर टैक्स कटौती को डेढ़ लाख से दो लाख रुपए बढ़ाने की मांग है.

चूंकि, आधारभूत संरचनाओं के विकास के लिए देश को बड़े पैमाने पर धन की ज़रूरत है, इसलिए सरकार इन्फ़्रास्ट्रक्चर बांड में किए जाने वाले व्यक्तिगत निवेश पर निश्चित टैक्स कटौती कर सकती है.

परिवहन और मेडिकल प्रतिपूर्ति

प्रति माह 800 रुपए का परिवहन भत्ता और प्रति वर्ष 15 हज़ार रुपए की मेडिकल प्रतिपूर्ति जैसे छूट अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं.

छूट की इन सीमाओं को काफ़ी हद तक बढ़ाया जाना चाहिए ताकि परिवहन और स्वास्थ्यगत खर्चों में बढ़ोतरी से आम लोगों को वास्तव में राहत दी जा सके.

इसमें कोई शक नहीं कि सरकार के लिए इन सारी आकांक्षाओं पर खरा उतरना मुश्किल है, फिर भी, निवेशकों में फिर से भरोसा पैदा करने के लिए कुछ कड़े क़दम उठाए जाने की ज़रूरत है.

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