'हत्या का उत्सव' और शोक भी, भला कैसे?

  • 22 फरवरी 2015
गोविन्द पांसरे, सीपीआई नेता
Image caption गोविन्द पांसरे की गोली मारकर हत्या कर दी गई.

आखिर गोविंद पांसरे को खो दिया गया. बयासी साल की उनकी देह ने तीन-तीन गोलियां जो झेली थीं.

हम उम्मीद कर रहे थे कि लड़ाका इस बार भी जीत जाएगा. अफ़सोस कि अक्सर भौतिक स्थिति आत्मा का साथ नहीं देती. पांच दिन तक सर्जरी के बाद जूझते हुए आखिर उनके शरीर ने जवाब दे ही दिया.

दिल्ली से दूर, कोल्हापुर में हुई यह मौत क्या राष्ट्रीय विषय है? इसलिए कि इसके आशय कहीं गहरे हैं. महाराष्ट्र से आगे पूरे भारत और दुनिया के लिए भी विचारणीय.

यह कहना कि व्यक्ति मारे जा सकते हैं विचार ज़िंदा रहते हैं, एक दिलासा भर है. विचार खुद सफ़र नहीं करते. और उन्हें असरदार होने के लिए व्यक्तियों की आवश्यकता होती है. इसके लिए व्यक्तियों को खुद को तैयार करना पड़ता है.

यह तैयारी भी इतनी आसान नहीं. व्यक्तियों का ज़िंदा रहना हमारे लिए क्यों ज़रूरी है और इसलिए उनकी ह्त्या को रोकने के हर उपाय करना क्यों हम सबका फर्ज है, यह कामरेड पांसरे पर बात करते हुए हम समझ सकते हैं.

विरोधियों ने भी सुना

अभी कुछ रोज़ पहले पुणे में लोकायत संस्था के नीरज जैन बहुत उत्साह से बता रहे थे कि गोविन्द पांसरे का व्याख्यान उन्होंने आयोजित किया था शिवाजी पर.

हाल खचाखच भरा था. पांसरे शिवाजी को एक धर्मनिरपेक्ष, जनता के राजा के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे. लोगों ने एकाग्र शांति से उन्हें सुना.

"क्या हंगामा, विरोध नहीं हुआ?” नहीं, शिव सेना, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के लोग भी वहां थे. लेकिन उन्होंने सुना.”

तभी यह भी मालूम हुआ कि 'शिवाजी कोण होता' नामक एक पुस्तक भी पांसरे साहब ने लिखी है. उसकी कोई डेढ़ लाख प्रतियां बिक चुकी हैं मराठी में.

मैं अचम्भे में पड़ गया, इस किताब पर क्यों नहीं शोर हुआ? जेम्स लेन की शिवाजी वाली किताब को लेकर ही तो पुणे का भंडारकर इंस्टिट्यूट तोड़-फोड़ दिया गया था?

और जैसा हाल ही में एक लेखक ने लिखा हमारी विश्वविद्यालयों में कैद अकादमिक दुनिया को उसके बाहर निर्मित इस ज्ञान का इल्म क्यों न था?

हत्या और विचार

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Image caption शिव सेना ने गोविन्द पांसरे की हत्या की निंदा की है.

गोविन्द पांसरे के अंतिम क्षणों पर विचार करने से बात कुछ-कुछ समझ में आती है.

उनपर हमले के फौरन बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने गहरा अफ़सोस जताया और उनके इलाज में कसर न छोड़ने की बात कही.

शिव सेना ने भी हमले की निंदा की. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस के बयान से स्पष्ट था कि वे कोई राजनीतिक शिष्टाचार भर नहीं निभा रहे थे.

हालत जब बिगड़ी तो एयर-अम्बुलेंस से मुंबई ले जाने और ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल तक बिना ट्रैफिक की रुकावट के उन्हें पहुँचाने का सारा इंतजाम किया गया.

पांसरे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे, उस पार्टी के, जो अभी की सबसे कमजोर कम्युनिस्ट पार्टी है. फिर भी उनकी इतनी और हर तरफ इज्जत क्यों?

क्योंकि वे, जैसा हर मराठी अखबार ने लिखा जनता के लगभग हर तबके के संघर्ष से जुड़े थे. एक तो उनका खुद का अपना जीवन बड़े श्रम से गढ़ा जीवन था.

खुद से पढ़ाई करते हुए एक चपरासी से अध्यापक तक का सफ़र. संयुक्त महाराष्ट्र आन्दोलन और गोवा मुक्ति संघर्ष में हिस्सेदारी. औरतों, मजदूरों, किसानों, छात्रों, हर तबके के संघर्ष में भागीदारी.

हर तबके के लिए संघर्ष

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शायद ही ऐसा कोई अंग हो समाज का जिससे कामरेड पांसरे ने खुद को न जोड़ा हो. और अभी इस उम्र में वे आईआरबी इंफ्रास्ट्रक्चर के लोनावाला में जमीन हड़पने और उसके ज्यादा टोल टैक्स लेने के खिकाफ संघर्ष में जुड़े थे.

वे अथक जन-शिक्षक थे. जितनी छाप सड़क पर उतनी ही कागज़ पर भी. ऐसे व्यक्ति कैसे बनते हैं? क्यों वे हम सबके लिए मूल्यवान हैं?

उन्हें गढ़ने में खुद उनका और इतने सारे आंदोलनों का कितना रोल है? वह सारा श्रम, प्रेम, उत्साह, समय, जीवट: तीन गोलियों ने यह सब खत्म कर दिया.

क्या वह फिर आसानी से हासिल हो जाएगा? यह नुकसान कितना बड़ा है और कितनों का?

गाँधी के बारे में कहा जाता है कि उनके सामने आप जैसे अपनी तुच्छता छिपा लेना चाहते थे. वे आपका श्रेष्ठ आपके भीतर से निकाल कर रख देते थे. यही बात कामरेड पांसरे के बारे में कही जा सकती है.

असहमति और सम्मान

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Image caption समाज सुधारक नरेंद्र दाभोलकर की भी हत्या कर दी गई थी.

उनकी ह्त्या पर शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी का शोक ईमानदार नहीं, यह मानने को जी नहीं चाहता. उनकी प्रतिक्रिया से उने भीतर दबी पड़ी इंसानियत ही जाहिर होती है जो इस क्षण में विचलित हो उठी है.

शिव सेना के पत्र ‘सामना’ ने लिखा कि शिवाजी पर उनके विचारों से लोगों को असहमति हो सकती है, लेकिन उनका सामाजिक योगदान अमूल्य है.

फिर इस मौत का, जो ह्त्या है, मतलब खुद इन पार्टियों के लिए क्या है?

कहा जा रहा है कि हाल में गांधी की ह्त्या में नाथूराम गोडसे की भूमिका पर बोलने के लिए उन्हें धमकियां दी जा रही थीं. क्या इस ह्त्या का रिश्ता उनसे है? क्या यह किसी संगठन के इशारे पर की गई है?

अभी बहुत वक्त नहीं गुजरा, पांसरे की तरह की सुबह की सैर पर निकले तार्किकता के आन्दोलन के नेता नरेंद्र दाभोलकर की ह्त्या कर दी गई थी.

हत्यारे का पता नहीं चला. क्या वह किसी संगठन का था?

नफ़रत और घृणा के विचार

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महात्मा गाँधी की ह्त्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगाने के अपने फैसले को उचित ठहराते हुए भारत के तत्कालीन गृह मंत्री ने संघ प्रमुख को लिखा था कि उन्हें यह मानना होगा कि संघ ने अपनी गतिविधियों से देश में विद्वेष और घृणा का ऐसा माहौल पैदा कर दिया था कि बापू की ह्त्या की जा सकी.

यही बात अभी भी कहे जाने की ज़रूरत है. इस बात पर संघ को और शिव सेना जैसे संगठन को सोचना ही पड़ेगा कि उन्होंने नफरत और घृणा का जो पर्यावरण बना दिया है उसमें हत्यारों का पैदा होना ही स्वाभाविक है.

वे अगर यह सोचते हैं कि वे नफरत को नियंत्रित कर सकते हैं, कि वह इतनी दूर, इतनी तीव्रता में, इतने वक्त तक ही हो तो यह मुमकिन नहीं. हिंसा और नफरत का अपना तर्क और अपनी गतिकी होती है.

'हत्या का उत्सव'

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इस देश में खतरा इस बात का है कि ऐसी हत्याओं के बाद हमें कभी न मालूम हो पाएगा कि ह्त्या किसने की. मुमकिन है कि उनकी योजना कहीं से न बनाई जा रही हो. मुमकिन है, स्वायत्त हत्यारे पैदा हो रहे हों.

जब एक ह्त्या का उत्सव मनाया जाएगा, और वह भी महात्मा गाँधी की ह्त्या का, जब हम उसे भूल जाने पर जोर देने लगेंगे और उसे वध कहते रहेंगे तब तक हमें कामरेड पांसरे की ह्त्या पर शोक मनाने का हक न होगा.

जैसा मैंने कहा, मैं खुद को यह कह कर तसल्ली नहीं देना चाहता की कामरेड पांसरे के विचार ज़िंदा रहेंगे. मुझ जैसों के लिए पांसरे का तब तक ज़िंदा रहना ज़रूरी था जब तक कुदरत उन्हें खुद में न मिला लेती. कामरेड पांसरे का कुछ था जो इस हत्या ने ओट कर दिया, यह कहा ही जाना चाहिए.

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