खेती, किसानों के लिए न समय है न सोच

  • 25 फरवरी 2015
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नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को सत्ता में आए करीब नौ महीने हो गए हैं. मोदी सरकार एक बजट पेश कर चुकी है और दूसरा बजट अगले कुछ दिनों में पेश करेगी.

लेकिन देश की करीब 60 फ़ीसदी आबादी की जीविका का आधार कृषि क्षेत्र अब भी सरकार के किसी बड़े नीतिगत बदलाव या घोषणा से अछूता है.

अलबत्ता कई तरह के संकट कृषि पर मंडरा रहे हैं. यही वजह है कि चालू वित्त वर्ष (2014-15) में कृषि विकास दर सिर्फ़ 1.1 फ़ीसदी पर रहने का अनुमान है.

अधूरे वादे

नई केंद्र सरकार का फोकस जिस तरह कॉरपोरेट और मैन्यूफैक्चरिंग पर है, उसकी प्राथमिकता में कृषि क्षेत्र कहीं आ ही नहीं पाया. यही वजह है कि मोदी सरकार के पहले साल में किसानों का संकट घटने की बजाय बढ़ा है.

भाजपा ने वादा किया था कि किसानों को उनकी लागत में 50 फ़ीसदी मुनाफ़ा जोड़कर फ़सलों का दाम दिलाया जाएगा.

लेकिन विडंबना देखिए कि नई सरकार ने अभी तक सिर्फ़ एक खरीफ सीजन और एक रबी सीजन के लिए फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय किया है.

दोनों बार कई फसलों का एमएसपी फ्रीज रखा गया वहीं बाकी के एमएसपी 3-4 फ़ीसदी ही बढ़े हैं.

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पिछले बजट में सरकार ने 1,000 करोड़ रुपए की प्रधानमंत्री सिंचाई योजना का ऐलान किया था, लेकिन जिस देश में करीब 60 फीसदी कृषि योग्य भूमि ग़ैर-सिंचित है वहां हर खेत को पानी पहुँचाने के लिए यह राशि बेहद कम है.

इस योजना में अब तक हुई प्रगति और भी धीमी है. खेत की मिट्टी की जांच के लिए मृदा कार्ड बनाने की बात कही गई थी. लेकिन अगले बजट से मात्र नौ दिन पहले इस योजना का शुभारंभ कृषि क्षेत्र की उपेक्षा को ही दर्शाता है.

किसानों की आय बढ़ाने या प्राकृतिक आपदा से सुरक्षा के लिए बीमा के ज़रिए कोई बड़ा कदम अब तक नहीं उठाया गया है.

जिस सरकार ने मेक इन इंडिया के लिए इतनी मशक्कत की, लगता है कि कृषि के लिए उसके पास ज़्यादा समय और सोच नहीं है.

अध्यादेश का दंश

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असल में किसानों की आय बढ़ाने के दो ही उपाय हैं. पहला, उसकी पैदावार और उपज का दाम बढ़ाना और दूसरा, उत्पादन लागत को कम करना.

इन दोनों मोर्चों पर मोदी सरकार ने अभी तक कोई बड़ा कदम नहीं उठाया है. जबकि कृषि क्षेत्र का संकट किसी से छिपा नहीं है.

वैश्विक और घरेलू बाजार में कृषि उत्पादों की कीमतें लगातार गिरी हैं. धान, कपास, मक्का के किसान समर्थन मूल्‍य से नीचे अपनी उपज बेचने को मजबूर हैं.

गन्ना किसानों को दो-दो साल से भुगतान नहीं हुआ है. चीनी मिलों पर किसानों का 12 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का बकाया है.

संकट और गुस्सा

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, खराब मानसून के चलते खाद्यान्न उत्पादन करीब तीन फ़ीसदी और तिलहन उत्पादन नौ फ़ीसदी से ज्यादा गिरने का अनुमान है.

इस तरह किसान कीमतों में कमी और उत्पादन में गिरावट की दोहरी मार झेल रहे हैं. ऊपर से लंबे अरसे बाद किसानों को यूरिया संकट का सामना करना पड़ रहा है. किसान उर्वरक भी ब्‍लैक में खरीद रहा है.

इन संकटों के बीच सरकार ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम में अध्यादेश के जरिए संशोधन कर दिया और 2013 के कानून में किसानों को जो थोड़ी बहुत ताकत मिली थी उसमें से अधिकांश को छीन लिया है.

अब देखना होगा कि देश भर में किसानों के बढ़ रहे ग़ुस्‍से के बीच मोदी सरकार क्या कदम उठाती है.

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