भाजपा-पीडीपी गठबंधन, किसे फ़ायदा किसे नुक़सान

  • 25 फरवरी 2015
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भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच सरकार बनाने पर सहमति बन तो गई है, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ क्या हैं.

इस सहमति के बावजूद सरकार गठन में समय लगेगा, क्योंकि न्यूनतम साझा कार्यक्रम (सीएमपी) की घोषणा प्रधानमंत्री मोदी और मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बातचीत के बाद ही होगी.

दोनों ही पार्टियों ने बीच का रास्ता ढूंढा है, लेकिन इस गठबंधन से कश्मीर घाटी में एक बेचैनी सी दिखती है.

'छुपा हुआ एजेंडा'

कश्मीर घाटी में ज़्यादातर लोग भाजपा और पीडीपी के इस गठबंधन से नाराज़ हैं. इस लिहाज से देखा जाए तो पीडीपी के लिए यह बहुत बड़ा जुआ है.

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लेकिन पीडीपी के राजनीतिक अस्तित्व का सवाल इस गठबंधन से जुड़ा हुआ है. सीएमपी की भाषा से पता चलेगा कि वह कश्मीर घाटी के लिए राजनीतिक मुद्दों पर कुछ कर पाते हैं या नहीं.

भाजपा को इसमें ज़्यादा ख़तरा नहीं है, लेकिन पीडीपी का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है.

लोगों को डर है कि भाजपा आरएसएस के एजेंडे को लागू कर सकती है. घर वापसी, जनसांख्यिकी को बदलना और सबसे बढ़कर कश्मीर की राजनीतिक पहचान को कमजोर करना.

समझौते के मुद्दे

समझौते के मुद्दों में से एक पाकिस्तान से बातचीत को लेकर कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने खुद ही पाकिस्तान से दोबारा बातचीत शुरू करने की पहल की थी.

सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून के बारे में कहा जा रहा है कि दोनों पार्टियों ने एक समिति बनाई है, जिसमें भाजपा और पीडीपी के एक-एक सदस्य के अलावा सुरक्षा बलों और कुछ नौकरशाह भी लोग शामिल होंगे, जो इस बात का जायज़ा लेंगे कि कहां से किस वक्त एएफ़एपीए को हटाया जाए.

ऐसा कहा जा रहा है धारा 370 के बारे में भाजपा एक लिखित आश्वासन देगी कि वह इस मुद्दे को नहीं छेड़ेगी.

पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों को लेकर भी दोनों पार्टियों ने एक बीच का रास्ता निकाला है कि इसे मानवीय आधार पर देखने की ज़रूरत है.

अब देखना यह होगा कि सीएमपी की भाषा क्या रहती है और क्या उसमें कुछ मुद्दों को लेकर कोई समयसीमा तय की जाती है.

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