रेल बजटः पांच चुनौतियां, पांच शिकायतें

  • 26 फरवरी 2015
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केंद्रीय रेल मंत्री सुरेश प्रभु गुरुवार को रेल बजट पेश करने जा रहे हैं. भारतीय रेलवे की चुनौतियों से पार पाना और यात्रियों की आम शिकायतों से निपटना उनके लिए एक बड़ी चुनौती है.

आम तौर पर यात्रियों को टिकट न मिलने, सुरक्षा और यात्रा के दौरान रेलवे की गंदगी से जुड़ी शिकायतें होती हैं.

लेकिन रेलवे की खस्ता हालत को देखते हुए उसमें निवेश एक ऐसी समस्या है जिससे निपट कर ही सुविधाओं में सुधार किया जा सकता है.

यहां हमने उन पांच चुनौतियों और पांच आम शिकायतों को सामने लाने की कोशिश की है, जिनको लेकर इस बजट से काफ़ी उम्मीदें हैं.

पांच चुनौतियां

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आर्थिक संकटः रेल मंत्रालय के अनुसार, भारतीय रेलवे पर संचालन अनुपात भारी पड़ रहा है. वर्ष 2004-05 में यह अनुपात 90.98 प्रतिशत था, यानी एक रुपए में क़रीब आठ पैसे की बचत. वित्त वर्ष 2013-14 में यह अनुपात बढ़कर 93.5 प्रतिशत हो गया. इस वित्त वर्ष में रेलवे को महज 600 करोड़ रुपए का लाभ हुआ.

निवेश की समस्याः वर्तमान में 357 रेलवे प्रोजेक्ट लटके हुए हैं, जिनके लिए 1.82 ख़रब रुपए की ज़रूरत है. फ़रवरी 2012 में सैम पित्रोदा कमेटी की रिपोर्ट में रेलवे के आधुनिकीकरण के लिए अगले पांच सालों में 5.6 ख़रब रुपए की ज़रूरत का अनुमान लगाया गया था, जबकि मार्च 2012 में ही अनिल काकोदकर कमेटी ने रेलवे सुरक्षा उपायों पर अगले पांच सालों में एक ख़रब रुपए के निवेश का अनुमान लगाया था.

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क्षमता में ठहरावः पटरियों के विस्तार का काम लगभग ठहरा हुआ है. वित्त वर्ष 2004-05 में रनिंग ट्रैक (डबल ट्रैक समेत पटरियों की कुल लंबाई) 84,260 किलोमीटर और रूट की लंबाई 63,465 किलोमीटर थी. जबकि वित्त वर्ष 2012-13 में रनिंग ट्रैक में केवल 4,976 किलोमीटर और रूट की लंबाई में केवल 1,931 किलोमीटर की ही बढ़ोत्तरी हो पाई. आबादी के बढ़ते दवाब और धन की कमी के चलते पटरियों की लंबाई बढ़ाना एक बड़ी चुनौती है.

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निजी और विदेशी निवेश की चुनौतीः वित्त वर्ष 2012-2013 में भारतीय रेलवे सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के तहत केवल 2,500 करोड़ रुपए का निवेश ही आकर्षित कर पाई, जबकि लक्ष्य 6,000 करोड़ रुपए इकट्ठा करने का था. रेलवे की आधारभूत संरचनाओं के विकास में 100 प्रतिशत एफ़डीआई की मंजूरी के बावजूद भारतीय रेलवे विदेशी निवेशकों का ध्यान नहीं खींच पाई है.

बाजार हिस्सेदारी में गिरावटः माल ढुलाई के मामले में भारतीय रेलवे सड़क मार्ग के मुकाबले तेजी से पिछड़ रही है. रेल मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 1950-51 में जहां इसकी बाज़ार हिस्सेदारी 89 प्रतिशत थी, वहीं 2007-08 में इसकी हिस्सेदारी घटकर 30 प्रतिशत तक पहुंच गई है. वहीं सड़क मार्ग से होने वाली ढुलाई की हिस्सेदारी 11 प्रतिशत से बढ़कर 61 प्रतिशत हो गई है.

पांच आम शिकायतें

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साफ सफाई शौचालयः सीधे डिस्चार्ज और गंदगी, भारतीय रेलवे की एक बड़ी समस्या रही है. ओडिशा के एक सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा दिसम्बर 2013 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में दायर याचिका में सीधे डिस्चार्ज को खुले में मलत्याग जैसा माना. इसकी जगह बॉयो टॉयलेट की मांग की गई. 2013-14 (दिसम्बर तक) 2,774 बोगियों में बॉयो टॉयलेट लगाए जा चुके हैं. लेकिन 51, 288 डिब्बों के मुकाबले ये कुछ भी नहीं है.

महंगा टिकटः मोदी सरकार के पहले अंतरिम रेल बजट में यात्री किराया भाड़े में 14 प्रतिशत की वृद्धि की गई जबकि कुछ प्रीमियम ट्रेनों को हरी झंडी दी गई जिनका किराया मांग के आधार पर तय होता है और कभी कभी यह हवाई सफर के बराबर या उससे भी ज़्यादा होता है.

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एक्सिडेंटः ट्रेनों की टक्कर और रेल पटरियों पर होने वाली दुर्घटनाओं का न रुकना हमेशा से ही एक आम यात्री की चिंता का विषय रहा है. हालांकि रेल मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1960-61 में जहां प्रति दस लाख किलोमीटर पर दुर्घटनाएं की संख्या 5.5 थी जबकि 2011-12 में यह घटकर 0.13 हो गई. लेकिन इन दुर्घटनाओं में हताहतों की संख्या कम नहीं हो रही है. वर्ष 2011-12 के आंकड़ों के अनुसार, सभी प्रकार की दुर्घटनाओं में 3,665 लोग हताहत हुए, जिसमें पटरियों और मानवरहित क्रासिंग पर होने वाली दुर्घटनाओं में मारे गए और घायल होने वालों की संख्या सर्वाधिक 2,107 है.

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पीने का साफ़ पानी: ट्रेनों में पीने के पानी की समस्या विकराल हो चुकी है. यहां तक कि कुछ-एक को छोड़ कर रेलवे स्टेशनों पर पीने के साफ़ पानी की सुविधा नदारद होती है. वर्ष 2003-04 में बोतल बंद पानी के लिए ‘रेल नीर’ परियोजना की शुरुआत की गई लेकिन अब इसके दाम भी बाज़ार से नियंत्रित हो गए हैं, जबकि उस समय इसका मूल्य 10 रुपए रखा गया था.

खाना: आम तौर पर ट्रेनों में कैटरिंग से संबंधित काफ़ी शिकायतें आती हैं. खाने के दामों में बढ़ोत्तरी के साथ ही उसकी गुणवत्ता में सुधार नहीं नज़र आता. लोगों को इसकी शिकायत रहती है कि उसी दाम में बाहर उससे कहीं बेहतर खाना मिलता है.

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