काला बकरा, बाढ़..सुने हैं इन स्टेशनों के नाम

  • 27 फरवरी 2015
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आँकड़ों के अंबार से भरा रेल बजट हर साल आता है और फिर उस पर होती है रिवायती राजनीतिक बयानबाज़ी, इस बार भी यही सब हुआ.

मगर 'आंकड़ेबाज़ी' और बयानबाज़ी से परे एक आम रेल यात्री के लिए रेलगाड़ी के और भी कई मायने हैं.

दरअसल भारत में रेल का सफ़र केवल यात्रा नहीं बल्कि भारत की बदलती तस्वीर देखने का बेहतरीन ज़रिया है और यादों का पिटारा भी.

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चौथी या पाँचवी कक्षा में हिंदी की किताब में चैप्टर था 'राजीव की बंगाल यात्रा'.. इसमें गर्मियों की छुट्टियों में नन्हा राजीव अपनी दीदी के साथ ट्रेन में बंगाल के एक गांव घूमने निकला है.

छोटे-छोटे स्टेशनों पर रुकती रेलगाड़ी, प्लेटफ़ॉर्म पर 'डाब' बेचने वाले का खोमचा और उसे देख प्लेटफॉर्म पर उतरने का बालहठ, उतर जाने पर गाड़ी छूट जाने का डर... उस चैप्टर में ट्रेन के ज़रिए लिखा दिलचस्प सफ़रनामा शायद रेल के प्रति मेरे आकर्षण का पहला पड़ाव बना.

रेल सफ़र में पड़ने वाले अजीबो-ग़रीब स्टेशनों के नाम मुझे काफ़ी दिलचस्प लगते थे.

पंजाब में आने वाला काला बकरा स्टेशन, महाराष्ट्र का चिंचपोकली, सबसे छोटे स्टेशन के नामों में से एक उड़ीसा का ईबी (IB), उड़ीसा में सिंगापुर रोड, तो बिहार में बाढ़ रेलवे स्टेशन.. और Venkatanarasimharajuvaripeta रेलवे स्टेशन को ठीक से हिंदी में लिखने की मेरी कोशिशें बेकार ही गई हैं.

खट्टी-मीठी यादें

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कोई 15 साल पहले के रेल सफ़र को याद करूँ तो याद आता है कि जब स्पीलर क्लास में टिकट लेकर आप ठाठ से बैठे हों और कोई बिना टिकट वाला आराम से आपकी सीट पर तशरीफ़ धर दे. और टोकिए तो बोले.. हियां ही तो उतरना है अगले टेशन पर, सीट पर बैठ जाएँगे तो सीट घिस थोड़े जाएगा..

अगर आप लंबी दूरी के सफ़र पर हों तो रेलगाड़ी में भूख लगने पर पॉलीथिन या पोटली में बंद घर के पराठे-सब्ज़ियाँ और आचार-मुरब्बे निकलते हैं और सीट पर अख़बार बिछाकर शुरू होता है भोज...और रेल का डिब्बा महक सा उठता है.

इसी स्पीलर क्लास में किसी के खिलाए कश्मीरी सेब का स्वाद और ख़ुशबू आज भी याद है.

इसी बीच ट्रेन की खिड़की के पास बैठने के लिए भाई-बहन का झगड़ा भी चलता रहता है...मानो रेल सफ़र में खिड़की वाली सीट से ज़्यादा अहम चीज़ कोई होती ही नहीं.

तब हाथ में न मोबाइल होता था न टैबलेट. ऐसे में लंबी दूरी के सफ़र में साथ यात्रा करने वाले के साथ देर-सबेर बस यूं ही गुफ़्तगू का सिलसिला शुरू हो जाता था.

अगर नेशनल इंटिग्रेशन को कोई ब्रैंड एंबेसेडर चाहिए तो भारतीय रेल अपनी दावेदारी ज़रूर पेश कर सकती है.

रेलवे की बदलती तस्वीर

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लेकिन ये कोई 15 साल पुरानी बात है- छात्र जीवन की. नौकरी लगने के बाद एसी क्लास और शताब्दी में भी सफ़र करने का मौका मिलने लगा. यह एसी रेलगाड़ी न तो हर छोटे स्टेशन पर रुकती है, न लोगों का रेला सीट से धकेलता हुआ अंदर आता है और न कोई खोमचे वाला सामान बेचने वाला यहां आता है.

इन ट्रेनों में परांठे की पोटली नहीं निकलती बल्कि आपकी टेबल पर फ़ॉर्क और स्पून के साथ खाना सर्व किया जाता है. एक अजीब सी ख़ामोशी के बीच सफ़र निकल जाता है.

कानों में हेडफ़ोन लगाए और हाथ में मोबाइल फ़ोन, स्मार्टफ़ोन और लैपटॉप लिए ट्रेन में सफ़र करते लोग भारत की एक अलग तस्वीर पेश करते हैं और रेल टिकट ख़रीदने के लिए घर बैठे माउस का एक क्लिक ही काफ़ी है ..

पीछे छूटे लोग..

रेल का सफ़र कई मायनों में बदला ज़रूर है लेकिन आज भी कई मायनों में भारतीय रेल ज्यों की त्यों है- कई गांवों-क़स्बों में रेलवे फ़ाटक न होने से बेवजह मरते लोग, ट्रेन में भीख माँगकर गुज़ारा करते बच्चे, रेलवे स्टेशनों के अंदर की गंदगी..

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एसी क्लास वाली शताब्दी जब दिल्ली से बस 10-15 मिनट के बाद बाहरी इलाक़ों में पहुंचती है तो सुबह-सुबह पटरी के किनारे कतार में लोग शौच करते दिख जाएंगे. शायद विकास की रेलगाड़ी ने इनके यहां कभी अपना स्टॉप बनाया ही नहीं.

यानी रेल सफ़र के बहाने, बिना किसी शोध के या किताब और रसाले का पन्ना पलटे, आप बता सकते हैं कि भारत कहां और कैसे बदला है और कहां नहीं.

अगर इतिहास के पन्ने पलटें तो बरसों दक्षिण अफ़्रीका रहने के बाद जब मोहनदास करमचंद गांधी भारत लौटे थे तो भारत को क़रीब से देखने और समझने के लिए उन्होंने लंबी रेल यात्राएं की थीं..

भारत के जानने-परखने का यह मूल मंत्र इतने सालों बाद भी बदला नहीं है.

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वैसे इन दिनों ट्रेन में सफ़र करते हुए अक्सर सोचती हूं कि पांचवी क्लास में पढ़ी राजीव की बंगाल यात्रा वाली कहानी आज के दौर में लिखनी हो तो कितनी अलग होगी..

क्या ट्रेन में बैठा नन्हा राजीव बड़ी-बड़ी अंचभित आंखों से वैसे ही सवाल पूछेगा.. या उसका सफ़र किसी वीडियो गेम में ही गुज़र जाएगा..

और हां, अगर आपको रेलवे स्टेशनों के कुछ अजीबोग़रीब नाम पता हों तो ज़रूर बताइएगा.

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