दम लगाके हइशा.. पुरानी यादें ताज़ा

दम लगा के हइशा इमेज कॉपीरइट Yash Rja Films

रेटिंग: ***

तकनीक वक़्त को दर्शाने का सबसे बेहतर तरीक़ा हो सकती है. अगर आज के एक्टर आपको किसी फिल्म में नोकिया का ईंट सरीख़ा फ़ोन पकड़े नज़र आते थे, तो आपको फ़ौरन पता लग जाता था कि इस फ़िल्म की पृष्ठभूमि आख़िर किस वक़्त की है.

उसी तरह इस फ़िल्म में संगीत सुनने के लिए लोकप्रिय रहे टू-इन-वन ऑडियो कैसेट का इस्तेमाल किया जा रहा है. इस फ़िल्म का मुख्य किरदार एक ऐसी दुकान चलाता है जहां वो अलग अलग गानों को एक कैसेट में डालने का काम करता है.

ये फ़िल्म 90 के दशक पर आधारित है जिसमें गंगा किनारे बसे उत्तर प्रदेश के शहर हरिद्वार को दर्शाने की कोशिश की गई है.

इस शहर के एक घर का माहौल आमतौर पर गंभीर ही दर्शाया गया है जिसके कई कारण है. उनमें से एक यह कि उनका बड़ा बेटा ख़ुश नहीं है.

आरएसएस का प्रभाव

इमेज कॉपीरइट Yash Raj Films

बेटे का किरदार निभा रहे हैं आयुष्मान खुराना, जो आरएसएस के एक कार्यकर्ता बने हैं. उनकी सुबह कसरत करते और प्राचीन भारत की कहानियों पर सिर हिलाते गुज़रती है.

इस फ़िल्म में दिखाने की कोशिश की गई है कि नौकरशाही, सोशल मीडिया और राजनीति में आरएसएस का सांस्कृतिक प्रभाव कितना प्रबल है.

ये सोचकर आश्चर्य होगा कि इसे हमारी फ़िल्मों में कितना कम दिखाया जाता है. सिर्फ़ एक फ़िल्म मुझे ऐसी याद पड़ती है जिसमें मुख्य किरदार को आरएसएस से संबंधित दिखाया गया था वो फ़िल्म थी शशि कपूर अभीनीत धर्मपुत्र (1961), ये फ़िल्म पूर्ण रूप से एक राजनीतिक फ़िल्म थी.

इसके बारे में ये बात शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि इस फ़िल्म का निर्देशन यश चोपड़ा ने किया था.

दम लगाके हइशा भी यशराज की ही फ़िल्म है. हालांकि इस फ़िल्म का राजनीति से कोई लेना देना नहीं है लेकिन ये भी अपनी रचनात्मकता के लिए मशहूर यशराज द्वारा बनाई गई उन कई फ़िल्मों की तरह ही है.

इस फ़िल्म में एक भारी भरकम शरीर वाली, थोड़ी ज़्यादा पढ़ी लिखी, हाल ही में विवाह के बंधन में बंधी रोमांटिक लड़की का किरदार निभाया है भूमि पेडनेकर ने .

उसका पति आयुष्मान खुराना शादी से ख़ुश नहीं है. उनकी शादी उनके अभिभावोकों ने तय की थी. लेकिन हीरो को ऐसा लगता है कि वह उससे ज़्यादा अच्छी लड़की के लायक़ है, जो थोड़ा अटपटा है.

हालांकि लड़की मोटी है, लेकिन वह काफ़ी ख़ूबसूरत है. सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण ये है कि हीरोइन हीरो को चाहती है. लेकिन लगता है कि हीरो शादी ही नहीं करना चाहता था.

यथार्थवाद

इस फ़िल्म का आधार और यहां तक कि इसका यथार्थवाद आपको बासु चटर्जी की फ़िल्म सारा आकाश (1969) की याद दिलाता है. रजत कपूर की आंखों देखी की तरह ही इस फ़िल्म में भी दुनिया को उसी रंग में दर्शाया गया है.

इमेज कॉपीरइट Yash Raj Films

इस फ़िल्म में भी बाबूजी की भूमिका संजय मिश्रा ने निभाई है. एक अच्छे अभिनेता मिश्रा हालांकि एक ही रोल निभाने के रिस्क को बार बार उठाते नज़र आ रहे हैं. वहीं सीमा पाहवा मां की भूमिका में नज़र आ रही हैं.

इस फ़िल्म के किरदार असल ज़िंदगी से जुड़े हुए लगते हैं. भारतीय समाज के छोटे शहर से शहरों में बसी मिडिल क्लास परिवार की हर छोटी छोटी चीज़ आपको इस फ़िल्म के किरदार निभाते दिखेंगे.

वो इतने ग़रीब नहीं हैं कि सड़क पर आ जाएं और न ही इतने अमीर की ज़िंदगी की मूल लग्ज़री ख़रीद पाने में समर्थ हों.

ये फ़िल्म अपने प्लॉट से कहीं बेहतर तरीक़े से दर्शाई गई है लेकिन आपको इससे बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ेगा. आप कई सीन में ख़ुद को हंसने से नहीं रोक सकेंगे. दूसरी तरफ़ आप इस फ़िल्म की बहतरीन कास्ट की तारीफ़ करने से भी खुद को रोक नहीं पाएंगे.

हालांकि इस फ़िल्म का प्रोमोशन ख़राब रहा तो मैं ये नहीं कह सकता कि ये फ़िल्म थिएटर में भारी भीड़ जुटाने में कामयाब रहेगी या नहीं.

लेकिन अगर तकनीक की बात की जाए तो यह उस तरह का सिनेमा है जिसे कई सालों बाद लोग डीवीडी, यूट्यूब या इंटरनेट पर डाउनलोड के ज़रिए देखा ज़रूर जाएगा.

मुझे नहीं लगता कि आपको इतना इंतज़ार करना चाहिए.

(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार