अब बस भी कीजिए

  • 1 मार्च 2015
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अब तक छप्पन 2

निर्देशक : एजाज़ गुलाल

कलाकार: नान पाटेकर, विकरम गोखले, आशुतोष राणा, गुल पनाग

रेटिंग: **

जैसा कि अक्सर नसीरुद्दीन शाह कहते हैं कि थियेटर करते वक़्त कहा जाता है फ़िल्मी बनने के लिए तो वहीं फ़िल्मों में नाटक की मांग की जाती है. इन दोनों ही बातों से अभिनय ख़राब होता है. नाना पाटेकर पर अपने पूरे फ़िल्मी करियर में ज़्यादा नाटकीय होने के आरोप लगते रहे हैं. लेकिन उनकी उम्दा अदाकारी से उन्हें दर्शकों ने ख़ूब प्यार दिया.

निर्देशक शिमित अमीन की पहली फ़िल्म अब तक छप्पन में नाना पाटेकर ने दया नाइक पर आधारित एक एन्काउंटर स्पेशलिस्ट की भूमिका निभाई थी. मुंबई के इस अफ़सर को अपराधियों को सुनवाई से पहले ही मार देने के लिए जाना जाता था.

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वो 2004 था और अब 11 साल बाद उन्होंने वहीं किरदार निभाया है जिसकी उम्र 63 साल दिखाई गई है. इस फ़िल्म में भी उन्हें बिल्कुल फ़िट, चुस्त, शांत और ख़तरनाक़ दिखाया गया है. फ़िल्म में ऐसे कई मौक़े आए हैं जब वो बिल्कुल मूक लगे. उसका कारण सेंसर बोर्ड द्वारा सभी अपशब्दों को हटा देना बताया गया है. नाना के इस तरह के अभिनय को देख उनकी फ़िल्म ख़ामोशी की यादे ताज़ा हो जाती हैं.

अगर फ़िल्म की बात की जाए तो फ़िल्म का पहला भाग राम गोपाल वर्मा ने निर्मित किया था. जिसमें उनकी कई रचनात्मक क्षमताएं नज़र आई थी.

दूसरा भाग डिजिटल कैमरे की मदद से फ़िल्माया गया है. इस फ़िल्म में भी कई अटपटे शॉट्स हैं जैसे की वर्मा की पहली फ़िल्मों में देखे जा चुके हैं.

कैमरा न तो ज़ूम हो रहा है न ही पैन किया जा रहा है जैसा कि ज़्यादातर अन्डरवर्ल्ड की फ़िल्मों में दिखाई देता है. चाहे वो भैंस के तबेले का सीन हो या फिर नाई की दुकान का जहां किरदार की शेविंग क़रीब से दिखाई जाती है.

कई मामलों और उनकी जांच के चलते देश से निकाले गए एन्काउंटर हीरो साधु को फिर से मुंबई पुलिस में बहाल कर दिया जाता है. ये कहना बेहद मुश्किल है कि इसके पीछे क्या कारण रहा कि राज्य सरकार साधु को जितनी मर्ज़ी गोलियां बरसाने की अनुमति आख़िर क्यूं दे देती है.

दो डॉन के बीच में भी मुक़ाबला दिखाया गया है. उनके लोग साधु पर गोलियां बरसाते रहते हैं. और साधु उनका जवाब देता रहता है.

नेताओं का सिस्टम पर दिया जाने वाला ज्ञान, मुंबई पर राज करने वाले रउफ़ और रावले जैसे माफ़िया. मुझे ऐसा लगता है कि चरमपंथ पूरी दुनिया के लिए ख़तरा बन गया है. ऐसे में 90 के दशक की तस्वीर पेश करती ये पिक्चर आख़िर दर्शकों को कितनी समझ आएगी ये देखना होगा.

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