क्या वाक़ई रिश्ते सुधारना चाहती है सरकार?

  • 1 मार्च 2015
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समाचार एजेंसी पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, “मंगलवार को विदेश सचिव एस जयशंकर के पाकिस्तान दौरे से भारत कोई बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं कर रहा है.”

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस दौरे को पाकिस्तान यात्रा की बजाय सार्क यात्रा के रूप में दिखाने पर भारत का ज़ोर है.

एक सेवानिवृत्त राजनयिक ने मुझे बताया कि उम्मीदों को दबाने के लिए यह ख़बर ‘लीक’ की गई थी.

इसका मतलब यह है कि भारत उन लोगों को निराश नहीं करना चाहता है जो इस मुलाक़ात से किसी बड़े बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं.

यह संभव है कि पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों में कुछ अहम बदलाव हो.

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हालांकि मेरे नज़रिए से, यह लीक किया जाना, भारत में मौजूद उस माहौल की ही परछाईं है, जिसमें माना जा रहा है कि पाकिस्तान के साथ रिश्ते रखना अहम नहीं था और मौजूदा तनाव जारी रहेगा.

असल में, पाकिस्तान के साथ बातचीत में दो मुख्य मुद्दे हैंः चरमपंथ और कश्मीर. पहला भारत के लिए मुख्य है और दूसरा पाकिस्तान के लिए.

तथ्य यह है कि भारत में चरमपंथ अभी तक के सबसे निचले स्तर पर है. कश्मीर, पूर्वोत्तर और नक्सल प्रभावित इलाक़ों को छोड़कर 2015 में चरमपंथ से मरने वालों की संख्या शून्य है.

पिछले साल यह संख्या चार थी. उससे पिछले साल यह 25 थी, जिसमें हैदराबाद धमाके में 18 लोग मारे गए थे. इसकी ज़िम्मेदारी इंडियन मुजाहिदीन ने ली थी.

वर्ष 2012 में केवल एक मौत हुई. लेकिन मीडिया में इस तरह दिखाया जा रहा है कि हम पाकिस्तान के चरमपंथी समूहों के निशाने पर हैं.

इस्लामी हिंसा

जहां तक इस्लामी हिंसा की बात है, तथ्य यह है कि भारत के लोग यूरोपीय लोगों से भी अधिक सुरक्षित हैं और भारतीय शहर दुनिया में चरमपंथ से सबसे कम प्रभावित शहर हैं.

इसलिए भारत को पाकिस्तान से बहुत कम वादों की ज़रूरत है, क्योंकि चरमपंथ के मामले में पाकिस्तान ने नतीजे दिए हैं.

हां, यह कहा जा सकता है कि मुंबई के हमलावरों पर मुक़दमे को तेज़ी से चलाया जाए और अधिकांश पाकिस्तानी इसे मानते भी हैं.

लेकिन यह मूल समस्या नहीं है. यदि हम ज़ोर देते हैं कि भारत में चरमपंथ के बढ़ने के लिए पाकिस्तान ज़िम्मेदार है तो हमें यह भी मानना चाहिए कि इसे कम करने में भी उसी का योगदान है.

इस मामले में पाकिस्तान से जो मोदी सरकार को चाहिए, वो उसे पहले ही मिल चुका है और मेरे हिसाब से इस मुद्दे को गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं है.

कश्मीर मुद्दा

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पाकिस्तान की मुख्य चिंता है कश्मीर मुद्दा और इस विवाद का हल.

यहां भारत पर दो मोर्चों पर दबाव है. पहला है राज्य में चरमपंथ, जिसे पाकिस्तान का समर्थन है और इस वजह से बड़ी संख्या में भारतीय सैनिकों की मौजूदगी है.

दूसरी समस्या है- लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सेदारी करने को लेकर कश्मीरियों की उदासीनता और 'आज़ादी' पर ज़ोर देना.

वर्ष 2001 में जम्मू कश्मीर में कुल 4507 लोग मारे गए थे. यह राज्य के इतिहास का सबसे रक्तरंजित साल था.

वर्ष 2003 तक हर साल मारे गए लोगों की संख्या 2000 से पार होती थी. वर्ष 2004-06 में यह संख्या गिर कर 1000 तक हो गई.

मुख्य धारा में वापसी

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वर्ष 2011 के बाद यह संख्या 200 तक सीमित हो गई है. इसमें सभी चरमपंथी, नागरिक और सैनिक शामिल हैं. पिछले दशक की तुलना में इस साल सबसे कम हिंसा हुई है.

कश्मीर में पिछले 25 सालों में (यानी अलगाववाद शुरू होने के बाद से) हिंसा सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है.

राज्य में सेना भी कम होना शुरू हो गई है.

राजनीतिक मोर्चे पर भी कश्मीर में वोटिंग, हिंसा शुरू होने के पहले के दिनों वाले स्तर को छू लिया है.

अलगाववादियों से सहानुभूति रखने वाले पीडीपी के मुफ़्ती मोहम्मद सईद जैसे संगठनों की चुनावों में हिस्सेदारी ने भी अलगाववादी सोच को मुख्य धारा की राजनीति की ओर मोड़ने में मदद की है.

बातचीत के मुद्दे

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यह सोचना ग़लत होगा कि अलगाववादी भावनाएं ख़त्म हो गईं. हालांकि उपर गिनाए गए कारणों की वजह से, कश्मीर मुद्दे पर कुछ करने के लिए भारत पर दबाव लगभग शून्य है.

इन दोनों मुद्दों से अलग, क़ानूनी और ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से व्यापार हो रहा है.

पाकिस्तान की उदासीनता के कारण, इस ओर किसी बड़े बदलाव की आशा नहीं की जा सकती.

पाकिस्तान के रास्ते मध्य एशिया से भारत को पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति में रुकावट, अफ़ग़ानिस्तान की समस्या के कारण है न कि पाकिस्तान के कारण.

तो, बातचीत के लिए बचा क्या? वीज़ा टाइप की मामूली चीज़ें.

वीज़ा

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यहां भारतीय जनता पार्टी को विभाजन के बाद कराची में बसे परिवारों से सहानुभूति नहीं है क्योंकि मुसलमान उनका मतदाता वर्ग नहीं है और इस सरकार के साथ ऐसी कोई मज़बूत लॉबी भी नहीं है.

ऐसे मामलों में वीज़ा सुविधाएं लेन देन पर आधारित होती हैं और मुंबई हमले के मद्देनज़र, इसकी कम ही संभावना है कि कोई भारतीय सरकार पाकिस्तानियों के लिए वीज़ा नियमों में ढील देगी.

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इसके अलावा बात करने को बहुत कम मुद्दे हैं क्योंकि पाकिस्तान अंदरूनी तत्वों से निपटने में व्यस्त है, जबकि मोदी सरकार लगातार घरेलू एजेंडा और कभी न ख़त्म होने वाले चुनावों पर ध्यान केंद्रित किए हुए है.

मेरे विचार से, इस स्थिति को भारत अपने पक्ष में मानता है और अगले सप्ताह होने वाली बैठक में वह पाकिस्तान के साथ शायद ठंडा रुख़ अपनाए.

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