ब्लॉग- 'मेरे पास नाथूराम गोडसे है...'

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मुझे मोदी सरकार तो अच्छी लगती है उससे भी अच्छा संघ परिवार लगता है. कारण यह है कि अच्छे और सच्चे लोग हैं.

साध्वी निरंजन ज्योति हों या योगी आदित्यनाथ हों, स्वामी सच्चिदानंद हरि, सुब्रह्मण्यम स्वामी, साक्षी महाराज या प्रवीण तोगड़िया वगैरा.. न दबने वाले, न झुकने वाले- जो दिल में, वही ज़ुबान पर. यही तो जनसत्ता का हुस्न है.

अब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को ही ले लीजिए. फ़रमाते हैं कि मदर टेरेसा ने लोगों की सेवा ज़रूर की लेकिन इसका उद्देश्य इस सेवा के बहाने लोगों को ईसाई बनाना था.

'ईमानदार पड़ताल'

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मदर टेरेसा जब मोहन भागवत के जन्म से दो साल पहले 1948 में भारत पहुंचीं, तो उस समय गोलवलकर आरएसएसके सरसंघ चालक थे.

उनके बाद आरएसएस के छठे सरसंघचालक सुदर्शन तक किसी को भी मदर टेरेसा की वह हरकत नज़र नहीं आई जिस पर भागवत की दृष्टि मदर टेरेसा के मरने के 18 साल बाद पड़ गई...?

मोहन भागवत वेटर्नरी साइंस के स्नातक हैं. आपातकाल के दौरान प्रचारक बने और फिर अखिल भारतीय प्रमुख बनकर नौ साल तक आरएसएस स्वयंसेवकों को वर्ज़िश करवाते और लाठी घुमवाते रहे.

उसके बाद अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख बनकर आरएसएस का इंसानियत का दोस्त वाला नज़रिया लोगों तक पहुंचाने के काम की निगरानी करते रहे, फिर आरएसएस के महासचिव और अब सरसंघ चालक बने.

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आप 64 वर्षीय मोहन भागवत पर यह आरोप भी नहीं लगा सकते कि चूंकि वह बचपन से ही मदर टेरेसा की तरह इंसानों की सेवा में लगे रहे, इसलिए मदर टेरेसा को मिलने वाली शोहरत, नोबेल पुरस्कार और सेंटहुड से जल गए होंगे.

मैं तो यही समझता हूं कि मदर टेरेसा के काम की उनकी पड़ताल को ईमानदार समझकर मान लेना चाहिए.

'पश्चिम के एजेंट'

जिस ज़माने में मदर टेरेसा कलकत्ते में रहते-रहते पश्चिम बंगाल से बिहार और उड़ीसा के पिछड़ों और मुसीबत के मारों को ईसाई बना रही थीं उस पूरे समय में संघ परिवार भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़ा रहा और आसमान की तरफ़ देखता रहा.

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फिर इससे जो समय बचा उसमें हिंदू-मुस्लिम एकता के नारे लगाता रहा.

वह तो शुक्र है कि मोहन भागवत की जन्मभूमि महाराष्ट्र कलकत्ता से बहुत दूर थी वरना आप समझ ही सकते हैं कि मदर टेरेसा क्या-क्या चमत्कार नहीं दिखा सकती थीं.

वैसे तो हम इस मामले में आत्मनिर्भर हैं लेकिन मोहन भागवत अगर पाकिस्तान में होते तो अपने विचारों के अऩुसार सौ प्रतिशत जमाते इस्लामी, जमीयत उलमा ए इस्लाम या जमात उद दावा के शारीरिक प्रमुख ज़रूर होते.

फिर वह कहते कि देखो-देखो जो जितनी भी एनजीओ और अब्दुर सत्तार ईदी जैसे लोग गरीबों के सेवक बने फिर रहे हैं, वह असल में पश्चिम के एजेंट हैं जिनका मक़सद मुसलमानों का धर्म भ्रष्ट करना है.

अब भारत की मदर टेरेसा को ही देख लो और फिर हमें देख लो.

बॉलीवुड में इतने रीमेक बन रहे हैं, मुझे इंतज़ार है कि दीवार का रीमेक कब बनेगा.

मेरे पास गांधी है, ईदी है, मलाला है, मदर टेरेसा है... तुम्हारे पास क्या है?

मेरे पास... मेरे पास नाथूराम गोडसे है. अब बोलो....!

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