बिहारः भूमि सुधार के लिए 7 साल से इंतज़ार

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भारत की केंद्र सरकार के प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण विधेयक पर संसद में रस्साकशी जारी है. लेकिन बिहार में भूमि सुधार के लिए गठित आयोग की रिपोर्ट साल 2008 से ही डब्बाबंद है.

नीतीश कुमार ने साल 2006 में डी बंदोपाध्याय की अध्यक्षता में ‘भूमि सुधार आयोग’ का गठन किया. आयोग ने 2008 में अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी.

लेकिन सात साल बाद भी नीतीश कुमार ने आयोग के सुझावों पर अमल की कोई पहल करते नहीं दिख रहे.

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डी बंदोपाध्याय की अध्यक्षता में ‘भूमि सुधार आयोग’ का 16 जून 2006 को गठित किया गया. आयोग ने अगस्त 2006 से काम करना शुरू किया था.

इसे आठ कार्यक्षेत्र दिए गए थे जिनमें मुख्य थे भूमि हदबंदी के प्रभावी उपाय, ज़मीन का सर्वेक्षण, मालिकाना और बटाईदारी के अधिकार तथा ज़मीन से जुड़े सामान्य सवाल.

अपने लिए निर्धारित एक साल की समय सीमा को एक बार बढ़वाने के बाद आयोग ने 2008 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी.

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में 1990 के दशक के दौरान भूमिहीनता का आंकड़ा रखा. इन आंकड़ों के अनुसार इस दौरान राज्य में भूमिहीनता की दर चिंताजनक हद तक बढ़ी है.

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आयोग के अनुसार 67 प्रतिशत ग्रामीण गरीब 1993-1994 में भूमिहीन या करीब-करीब भूमिहीन थे. यह आंकड़ा 1999-2000 तक 75 प्रतिशत हो गया.

इस दौरान भूमि संपन्न समूहों में गरीबी घटी जबकि भूमिहीन समूहों की गरीबी 51 प्रतिशत से बढ़कर 56 प्रतिशत हो गई.

लेकिन आंकड़े हमेशा भयावहता की पूरी तस्वीर पेश नहीं करते, यहां भी गरीबी के तत्कालीन सूचकांक की कोई चर्चा नहीं है.

आयोग की अनुशंसाएँ

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आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भूमिहीनों के हितों की रक्षा के लिए कुछ प्रमुख अनुशंसाएं की हैं.

बिहार में कुल 18 लाख एकड़ तक फैली अतिरिक्त ज़मीनें हैं. ये ज़मीनें या तो सरकारी नियंत्रण में है या भूदान समिति के नियंत्रण में, जिसे बांटा नहीं जा सका है या सामुदायिक नियंत्रण में या कुछ अन्य लोगों के कब्जे में है. आयोग ने इन ज़मीनों को भूमिहीनों में बांटने की अनुशंसा की है.

आयोग की सिफ़ारिश है कि बटाईदारों की रक्षा के लिए एक अलग बटाईदारी कानून होना चाहिए.

किसी भूमि पर मात्र दो श्रेणियों के व्यक्ति का अधिकार हो (क) रैयत, जिसे भूमि पर पूर्ण स्वामित्व, अधिकार तथा हित रहेगा (ख) बटाईदार, जिसे स्वामित्व का अधिकार नहीं बल्कि भूमि पर लगातार जोत-आबाद का अधिकार रहेगा.

हर बटाईदार के पास पर्चा रहे, जिसमें भू-स्वामी का नाम तथा जिस भूखंड पर वह जोत कर रहा है, उसकी संख्या रहे. पर्चा की सत्यापित प्रति भू-स्वामी को दी जाए.

बटाईदार का जोत आबाद का अधिकार अनुवांशिक रहे, यानी पीढ़ी दर पीढ़ी वो उसपर खेती कर सके.

भूमि उपयोग का अंतर

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आयोग के अनुसार कृषि और गैर कृषि भूमि के बीच अंतर को समाप्त कर दिया जाना चाहिए.

भूमि को उसके सरल अर्थ में परिभाषित किया जाना चाहिए ताकि किसी को सीलिंग प्रावधानों से किसी ज़मीन को कृषि योग्य और किसी को अन्य प्रकार का बनाकर, बच निकलने का अवसर न मिले.

सीलिंग के दायरे से प्लांटेशन, बगीचा, आम-लीची के बगीचे, मत्स्य पालन तथा अन्य विशिष्ट श्रेणियों के भूमि उपयोग को दी गई छूट समाप्त कर दी जाए.

पांच या अधिक सदस्यों वाले परिवार के लिए 15 एकड़ भूमि की सीमा होनी चाहिए. यदि परिवार का कोई प्लान्टेशन, बाग-बगीचा आदि हो तो उसे यह चुनाव का अधिकार रहे कि वह या तो उन्हें 15 एकड़ तक रखें अथवा 15 एकड़ तक धान/गेहूँ की ज़मीन रखें.

मंदिर और मठ की ज़मीनें

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आयोग के अनुसार 1950 से मौजूद मठों, मंदिर-चर्च सहित धार्मिक संस्थाओं को 15 एकड़ की एक इकाई दी जाए. अनेक देवी देवताओं वाले मंदिर को भी एक धार्मिक इकाई के रूप में सिर्फ एक हदबंदी दी जाए.

एक मंदिर एक इकाई माना जाए तथा यदि एक ही परिसर में या निकटवर्ती परिसर में कई मंदिरों का समूह हो तो भी वह एक ही इकाई में आ जाए.

आयोग अधिगृहित जमीनों के समुचित उपयोग की बात कहता है. इसके अनुसार ऐसी अनेक मिलें, फैक्ट्रियां, संस्थाएं तथा संगठन हैं जिनके स्वामित्व तथा दखल में बड़े पैमाने पर भूमि है.

सरकार को यह परीक्षण करने का अधिकार होना चाहिए कि उपर्युक्त संस्थाओं ने जिन उद्देश्यों के लिए जमीन हासिल की थी, उनका उपयोग उसी प्रयोजन से हुआ है या नहीं.

उसके बाद निकट भविष्य में इनके सुदृढ़ और प्रतिबद्ध विस्तारीकरण कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए, सरकार को यह अधिकार रहेगा कि किसी अतिरेक भूमि का पुनर्ग्रहण कर ले और या इकाई चलाने के लिए उन्हें अतिरिक्त आवश्यक भूमि रखने करने की अनुमति दे.

यह सिद्धान्त भविष्य में किसी नई इकाई पर भी स्वतः लागू होगा.

कॉरपोरेट खेती और किसान

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कॉर्पोरेट खेती के सभी पहलुओं को समाहित करते हुए एक क़ानून होना चाहिए ताकि किसानों विशेषकर मध्यम, लघु तथा सीमान्त किसानों को कॉर्पोरेट संगठनों के शोषण और दमन से सुरक्षा दी जा सके.

कॉर्पोरेट संगठनों और किसानों-व्यक्तिगत या उनकी सामूहिक संस्था जैसे किसान संगठन और कृषक सहकारी समूहों के बीच एक साफ़ और पारदर्शी अनुबंध होना चाहिए.

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