पांच मुद्दे जिन पर मचा है 'आप' में घमासान

  • 4 मार्च 2015
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आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक पार्टी के तीन साल के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना साबित हो सकती है.

अटकलें हैं कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को 'आप' के राजनीतिक मामलों की समिति से निकाला जा सकता है.

सोमवार को जब एक प्रेस कांफ्रेंस में 'आप' के नेता संजय सिंह से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "किसी को पार्टी में शामिल करने का फ़ैसला या निकालने का निर्णय पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में होता है और चार तारीख़ को इस बैठक के बाद आपको पता चल जाएगा कि क्या होगा."

योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के रिश्ते 'आप' संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ पिछले साल से नाज़ुक हैं.

इन नेताओं के बीच मतभेद कई मुद्दों पर हैं जिनमें कुछ नए हैं और कुछ पुराने. ऐसे पांच मुद्दों पर एक नज़र.

व्यक्ति केंद्रित होने का ख़तरा

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Image caption अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी का चेहरा हैं

योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण कथित तौर पर अरविंद केजरीवाल को पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक पद पर नहीं बने देखना चाहते हैं.

उनका तर्क है कि दूसरी पार्टियों की तरह 'आप' को 'व्यक्ति केंद्रित' नहीं होने देना चाहिए. एक ही व्यक्ति के हाथ में ढेर सारे अधिकार देने से पार्टी की 'अलग पहचान' पर धब्बा लग सकता है.

संजय सिंह ने आरोप लगाया कि कुछ लोग अरविंद केजरीवाल को संयोजक पद से हटाने की साज़िश कर रहे हैं. हालांकि उन्होंने ये नहीं बताया कि ऐसी कोशिशें कौन कर रहा है.

पिछले साल आम चुनाव में हार के बाद भी इस मुद्दे पर केजरीवाल और यादव के बीच ठन गई थी. तब यादव ने एक चिट्ठी में केजरीवाल के इर्द गिर्द सारे अधिकार केंद्रित होने पर ऐतराज़ जताया था.

उस समय केजरीवाल ने इसे स्वीकार करते हुए साथ मिलकर काम करने का एलान किया था. लेकिन अब वही मुद्दा एक बार फिर सामने आया है

पार्टी के विस्तार पर मतभेद

पार्टी के संस्थापक सदस्य योगेंद्र यादव पार्टी का दूसरे राज्यों में विस्तार चाहते हैं. उन्होंने चार राज्यों में पार्टी के विस्तार की बातें कही थीं, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने सार्वजनिक तौर पर इसे ख़ारिज कर दिया था.

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Image caption दिल्ली चुनावों में पार्टी ने अभूतपूर्व कामयाबी हासिल करते हुए 70 में 67 सीटें जीतीं

दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद एक भाषण में उन्होंने कहा था, "हमारे कुछ नेता विस्तार की बात कर रहे हैं. मैं कहता हूं ये सब ग़लत है. हम केवल दिल्ली में काम करेंगे."

पार्टी के कुछ नेताओं के अनुसार, आम चुनाव से पहले भी केजरीवाल केवल 50 से 60 सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन योगेंद्र यादव के सुझाव के आगे वो झुक गए और इसका भयानक नतीजा सबके सामने है.

इस मुद्दे पर पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति के अधिकतर सदस्य केजरीवाल के साथ हैं.

टिकट पर टकराव

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ये आरोप है कि हालिया दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कुछ ऐसे लोगों को टिकट दिए हैं जिनकी कथित रूप से आपराधिक पृष्ठभूमि थी.

पार्टी ने साफ़ किया था कि सबका बैकग्राउंड कई बार जांचने के बाद टिकट बांटे गए थे.

उस समय भी यादव और प्रशांत भूषण ने कथित तौर पर इस पर ऐतराज़ जताया था और भूषण ने तो कुछ उम्मीदवारों को अपना सहयोग देने से भी इंकार कर दिया था.

इसके बाद पार्टी ने दो उम्मीदवारों को बदल दिया था. आज ये मुद्दा पार्टी में चर्चा का विषय नहीं है, लेकिन प्रशांत भूषण इसे भी पार्टी फोरम में उठा रहे हैं.

आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शिता

प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव पार्टी के बुनियादी आदर्श पर क़ायम रहने के पक्ष में हैं. वो पार्टी के अंदरूनी मामलों में आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शिता की कसौटी पर खरा देखने के हक़ में हैं.

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Image caption प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल दोनों पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं

बताया जाता है कि उनकी शिकायत है कि कई मामलों में पार्टी के फैसले पार्टी के इन सिद्धांतों को अलग रख कर किए जाते हैं.

लेकिन केजरीवाल के क़रीबी नेताओं के अनुसार, केजरीवाल सबकी बातें सुनते हैं और सर्वसहमति से फैसले किए जाते हैं.

हाँ, कुछ मामलों में केजरीवाल को संयोजक के नाते किसी अहम मुद्दे पर आख़िरी फ़ैसला लेने का अधिकार है.

अहम का टकराव

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Image caption आशुतोष ने ट्वीट कर मतभेद की बात मानी

पार्टी के एक नेता आशुतोष मौजूदा घटनाक्रम को विचारों का टकराव मानते हैं. उन्होंने सोमवार को ट्वीट कर कहा, "आप में मंथन का वक़्त. ये दो तरह के विचारों के बीच मतभेद है. एक तरफ़ हैं कट्टर वामपंथी विचारधारा जो कश्मीर में जनमत संग्रह की बात करती है तो दूसरी ओर विकास में यक़ीन करने वाली विचारधारा."

लेकिन विचारधारा में मतभेद के इलावा ये अहम का टकराव भी है. केजरीवाल पार्टी के स्टार हैं, लेकिन यादव इसकी रूह हैं. पार्टी को आगे बढ़ाने में दोनों का हाथ है.

केजरीवाल पार्टी का चेहरा हैं और दिल्ली के विधानसभा चुनाव में जीत ने उन्हें पार्टी के अंदर और बाहर और भी मज़बूत किया है. वहीं योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण पार्टी में अकेले पड़ चुके हैं.

बुधवार को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी ये साफ़ दिख सकता है.

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