क्या 'आप' कंज़्युमरिज़्म की पार्टी है?

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आम आदमी पार्टी की वो वैचारिक गांठ खुल गई है जिसके क़यास इसके पैदा होने के साथ ही लगाए जाने लगे थे.

कुछ लोग मानते हैं कि पार्टी के भीतर मची रार दरअसल कई विचारधाराओं के टकराव का नतीजा है.

मुद्दों को छोड़ दें तो पार्टी ने अपनी इस वैचारिक गांठ को खोलने की इच्छा नहीं दिखाई.

पार्टी के नेताओं ने एक नई राजनीति की बात ज़रूर की लेकिन इसमें 'नया' क्या है, यह साफ नहीं हो पाया.

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दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान कई मंचों से आप के नेताओं ने पार्टी की विचारधारा पर प्रकाश डाला और उसे 'समाधान केंद्रित पार्टी' की तरह पेश किया.

कुमार विश्वास ने कई मौकों पर कहा, “जो कुछ अच्छा है उन्हें लेने से कोई गुरेज नहीं, चाहे वो दक्षिणपंथी विचार हो या वामपंथी.”

इन दिनों विवादों के केंद्र में आए वरिष्ठ नेता योगेंद्र यादव ने तब एक रोड शो में साक्षात्कार के दौरान कहा था, “इस चुनाव में एक वर्ग चरित्र ज़रूर है, लेकिन मैं इसे वर्गों की लड़ाई के रूप में नहीं देखता.”

उन्होंने कहा था, “यह पुराने कम्युनिस्ट आंदोलन की भाषा है, बीसवीं सदी की भाषा है. आप की भाषा यह नहीं है.”

एक अन्य मौके पर उन्होंने कहा था, “यह पोस्ट आइडियोलॉजिकल दौर चल रहा है और इस दौर में यही राजनीति हो रही है.”

विरोधाभास नहीं

'आप' नेता आशुतोष ने चंदे के सवाल पर कहा था कि पार्टी को कॉर्पोरेट फंडिंग से कोई परहेज नहीं है, बशर्ते वो साफ-सुथरे तरीके से आए.

एक तरह से पार्टी के नेताओं में विचार को लेकर कोई विरोधाभास नज़र नहीं आता.

जेनएनयू में हिंदी के प्रोफ़ेसर रहे राजनीतिक विश्लेषक पुरुषोत्तम अग्रवाल मानते हैं कि मौजूदा गतिरोध आप नेताओं के बीच वैचारिक टकराव नहीं है.

उनका कहना है कि आप में वाम और दक्षिण विचारधारा के खाने नहीं हैं, क्योंकि यह मानने से पहले ये मानना पड़ेगा कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण का झुकाव वाम की ओर है और बाकियों का झुकाव दक्षिण की ओर है.

इन दोनों नेताओं ने कभी खुद को वाम नहीं माना जबकि दूसरी तरफ़ पार्टी ने जो रुख अख़्तियार किए वे कहीं से भी दक्षिणपंथी नहीं हैं.

वो इसे 'निजी महत्वाकांक्षा की लड़ाई' मानते हैं.

केजरीवाल फेरी वाले

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वहीं ताज़ा विवादों में प्रशांत भूषण ने सिद्धांतों पर अडिग रहने की बात कही है और ऐसा न कर पाने की स्थिति में पार्टी छोड़ देने की बात कही है.

तो आख़िर ये सिद्धांत या विचार हैं क्या?

दिल्ली विश्विद्यालय में प्रोफ़ेसर और विश्लेषक सुधीश पचौरी कहते हैं, “यह शुद्ध कंज़्युमरिज़्म (उपभोक्तावाद) की पार्टी है- मैं यह दूंगा, वह दूंगा और केजरीवाल एक बेहतरीन फेरीवाले हैं.”

पचौरी के अनुसार, “कंज़्युमरिज़्म में विचार की कोई ज़रूरत नहीं होती. जबकि योगेंद्र यादव लोहिया की विरासत के हैं, जिसका एक सिद्धांत है, सपना है, जो शायद कभी पूरा न हो.”

ये अलग बात है कि लोहियावादी ख़ुद को वाम झुकाव वाली मध्यमार्गी राजनीति का मानते हैं.

सिद्धांत बनाम ज़रूरतें

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पचौरी कहते हैं, “यही टकराव है. उपभोग से जुड़ी छोटी-छोटी ज़रूरतों को नारों में तब्दील कर केजरीवाल जननेता हो गए हैं, जबकि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण, जैसा भी हो, सिद्धांत को सर्वोपरि मान रहे हैं.”

उनके अनुसार, “दिल्ली में आप की जीत के पीछे यहां की बड़ी आकांक्षा वाली प्रवासी आबादी है, जो हाशिए पर है. उसके लिए बिजली, पानी, सुरक्षा जैसे वादे किसी सिद्धांत से ज़्यादा अहम हैं.”

हक़ीकत भी यही है कि पार्टी ने मुद्दा आधारित और समाधान केंद्रित स्वच्छ राजनीति देने का वादा बराबर दोहराया.

योगेंद्र यादव ने कई बार कहा है, “हम राजनीति को बदलने की राजनीति कर रहे हैं. हम खेल के नियम बदल रहे हैं.”

अपने जन्म के बाद और पिछले तीन चुनावों में पार्टी ने जो 'उग्र सुधारवादी' रुख अपनाया, उससे ये धारणा बनी कि इसका झुकाव वाम की ओर है.

'नई राजनीति'

पर हालिया विधानसभा चुनाव में गोत्र के सवाल को जाति का रंग देना, मतदान के पहले धार्मिक स्थलों पर मत्थे टेकना, इमाम बुख़ारी का समर्थन लौटाना और दिल्ली की जीत को 'ऊपर वाले का चमत्कार' बताना कुछ ऐसे संकेत हैं जिससे पार्टी की 'नई राजनीति' का कुछ आभास मिलता है.

पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, “खास संदर्भों में की गई टिप्पणी से पार्टी को किसी खांचे में डालना ठीक नहीं. कई मुद्दों पर जैसे- याराना पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज़्म), कार्पोरेट ज़िम्मेदारी, स्वच्छ राजनीति और साम्प्रदायिक दंगों आदि पर 'आप' साफ़ रुख लेती रही है.”

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वह कहते हैं, “निश्चित रूप से 'कोई विचारधारा नहीं होना' एक दक्षिणपंथी विचारधारा है, लेकिन 'आप' के संदर्भ में ये कहना ज़रा ज़ल्दबाजी होगी.”

जैसा सुधीश पचौरी कहते हैं, “आप संकट से और संकट के रूप में पैदा हुई है. इसका वजूद सतत विपक्ष के रूप में है और अंदर ही अंदर इस विपक्ष का विपक्ष तैयार होता रहेगा.”

आप के अंदर जब तक कुछ बुनियादी मुद्दों पर रुख साफ नहीं होता, तब तक कोई न कोई टकराव उपजते रहेंगे.

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