उनकी होली जिन्होंने कभी रंग नहीं देखे..

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रंग ज़िंदगी को गुलज़ार करते हैं और होली इन्हीं रंगों का त्योहार है. होली के मौक़े पर रंग और गुलाल की बात तो बहुत हुई, लेकिन कुछ बातचीत उन लोगों से भी हो जाए जो रंगों की इस दुनिया से बहुत दूर हैं.

रंगों को कैसे समझते हैं दृष्टिहीन, क्या हैं होली के मायने उन लोगों के लिए जिन्होंने कभी रंग नहीं देखे?

प्रणव- तकनीक विशेषज्ञ

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मैं जन्म से ही नेत्रहीन हूं और मैंने कभी ये दुनिया नहीं देखी है. जो लोग देख नहीं सकते वो चीज़ों को समझने के लिए रंगों का इस्तेमाल नहीं करते. जिस तरह आम लोग अपनी आंखों से देखकर चीज़ों को समझते हैं, उस तरह मैं तकनीक के सहारे एक डिवाइस के ज़रिए दुनिया को समझता हूं.

इस डिवाइस से निकलने वाली ध्वनि आसपास की चीज़ों से टकराकर मेरे लिए उनका एक ख़ाका तैयार करती है.

लेकिन अफ़सोस, रंगों का कोई ख़ाका तैयार नहीं हो सकता.

मेरे लिए रंग केवल एक इकाई है जिनका इस्तेमाल मैं कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए कर सकता हूं. मेरे पास रंगों का कोई अनुभव नहीं. जब आप गुलाबी कहते हैं तो आम लोगों की तरह मेरे मन में कोई भाव पैदा नहीं होता. मैं नहीं समझ सकता कि किस चीज़ की बात हो रही है.

मैंने पढ़ा और सुना ज़रूर है कि लाल रंग का एक मतलब है लेकिन मैंने इस मतलब को कभी अपने अंदर महसूस नहीं किया है. मैं अच्छे और बुरे होली के रंगों में सिर्फ़ एक तरह से फ़र्क़ कर सकता हूं. यदि उन्हें आसानी से धोया जा सकता है तो वो अच्छे हैं और अगर नहीं तो बुरे!

निधि गोयल, सामाजिक कार्यकर्ता

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12-13 साल की उम्र में मुझे एक ऐसी बीमारी हुई जिसके चलते धीरे-धीरे मेरे आंखों की रोशनी जाने लगी. फिर मैंने स्टिक लेकर चलना शुरु किया और अब मैं दिन और रात के फ़र्क़ के अलावा कुछ नहीं देख सकती. मैंने अपनी आख़िरी याद तक रंग देखे हैं और मुझे पता है कि एक रंग दूसरे से कैसे अलग है.

लेकिन होता ये है कि अंधापन जितना बढ़ता जाता है, आपके दिमाग़ में जो एक तस्वीर है वो धुंधली पड़ती जाती है. तो अगर आप मुझसे अभी पूछें कि दो रंगों से मिलकर क्या बनता है तो मैं नहीं बता सकती.

होली पर किसी के चेहरे पर तिरंगा बनाकर कैसा महसूस होता है ये मैं नहीं समझ सकती क्योंकि मुझे नहीं पता वो क्या रंग हैं. अगर मैं वाकई होली खेलने के मूड में हूं तो मेरा केवल एक ही मक़सद होता कि मैं सामने वाले को गुलाल से भर दूं, फिर चाहे रंग कोई भी हो.

कंचन पमनानी, एडवोकेट

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मैंने अपनी ज़िंदगी के लगभग बीस साल आम लोगों की तरह बिताए जिसके बाद मेरी आंखों की रोशनी चली गई. इस नई ज़िंदगी में मैं सबसे ज़्यादा अगर किसी चीज़ की कमी महसूस करती हूं तो वो हैं रंग.

मुझे रंगों की बहुत बारीक समझ थी. मेरे लिए भूरे और बादामी, दूधिया और सफ़ेद रंगों का फ़र्क़ मायने रखता था. लेकिन अब मेरी ज़्यादातर चीज़ें सफ़ेद और काली है.

मुझे याद है एक बार अपने कपड़ों को ध्यान में रखकर मैंने एक ही तरह के जूते काले और भूरे दोनों रंग में ख़रीदे. एक दिन जब मैं ऑफ़िस के लिए निकली तो गार्ड मेरे पीछे दौड़ता हुआ आया.

बाद में समझ में आया कि मैं एक काला और एक भूरा जूता पहनकर निकल पड़ी थी. मैं रंग देख नहीं सकती फिर भी मुझे रंगों का शौक़ है. कुछ दोस्त हैं जो रंग चुनने में मेरी मदद करते हैं लेकिन आमतौर पर मैंने अब ख़ुद को काले-सफेद और सपाट रंगों तक ही सीमित कर लिया है.

ऑगस्टिन चेतिया, सॉफ़्टवेयर इंजीनियर

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मुझे हैरानी होती है कि लोग रंगों को लेकर इतने उत्साहित रहते हैं. सब कुछ सही तरह से देख पाने के बावजूद मैं कुछ रंग पहचान नहीं सकता, यानि कुछ रंगों के मामले में मैं कलर-ब्लाइंड हूं. जो रंग आपके लिए नीला है वो हो सकता है मुझे बैंगनी दिखाई दे. जो आपके लिए लाल है वो मेरे लिए हरा.

इस बात का एहसास मुझे 14-15 साल की उम्र में हुआ. मेरी मां मुझे किसी रंग की शर्ट निकालने को कहती थीं तो मैं कोई और रंग उठा लाता था. स्कूल में पढ़ाई के दौरान भी रंगों को लेकर मैंने काफ़ी घालमेल किया.

मुझे याद है बचपन में जब मैं कैरम खेलता था तो सफ़ेद और काली गोटी तो आसानी से निकाल लेता था, लेकिन तेज़ गुलाबी रंग की क्वीन गोटी पहचान में ही नहीं आती थी. अक्सर ऐसा हुआ कि कवर पहले निकाल दिया और क्वीन रह गई.

मैं आजतक ये समझ नहीं पाया कि आख़िर क्या वजह है कि जो रंग दूसरों को आसानी से दिखते हैं, वो मुझे समझ क्यों नहीं आते.

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