नेताजी...बुरा न मानो होली है

अरविंद केजरीवाल कार्टून, मंजुल इमेज कॉपीरइट Other

लोकपाल लाएंगे, लेकिन पार्टी के भीतर लोकतंत्र सपना होगा.

लोकसभा में चित्त हो बोले, राजनीति में समझौता करना होगा.

स्वराज तो पोथी है, गुणा-गणित से ही पराया वोट अपना होगा.

आम आदमी की दी हुई सत्ता के संग, बदलते रंग-ढंग को परखना होगा

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पंजे को हराया, मगर राजधानी में नसीबवाला झाड़ू से मात खाया.

सूट वाले पीएम को गांधी की सफ़ाई भाई, धोती का न ख़्याल आया.

बजट में ज़्यादा चीज़ें महँगी कीं, तो क्या सोचकर जूतों का दाम घटाया.

नौ महीने बीत गए साहेब, न 15 लाख आया, न विकास आया.

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जब राहुल बाबा ने फाड़ा प्रेस कांफ्रेंस में पर्चा, तो हुई दुनिया में चर्चा.

जब खाया कलावती के घर खाना, तो समझा ख़ुद को ग़रीबों का मामा.

जब आई वोट की बारी तो, जनता ने कहा सब था चुनावी ड्रामा.

जब पस्त बाबा ने माँगा पोलिटिकल ऑफ़, तो मचा घर-बाहर हंगामा.

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एक गुरु के चेलों में था छत्तीस का नाता, अब बड़ा याराना लगता है.

सेक्युलर के नाम पे तीर-लालटेन मिल गए, अकेले भारी कमल को हराना लगता है.

जिसे प्यादा समझकर सीएम बनाया, वो पोलिटिक्स का खिलाड़ी पुराना लगता है.

शाह हों या सुशासन बाबू, असल मक़सद जनता को फुसलाना लगता है.

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बंगाल की लाल धरती पर दीदी ने कर दी वाम दलों की छुट्टी.

माँ माटी मानुष के नारे से रोपी पूरब में तृणमूल की दो पत्ती.

पर सीएम बनते ही बार-बार गुल होने लगी उनके टेंपर की बत्ती.

लेकिन बदली उनकी चाल जब खुलने लगी शारदा स्कैम की पोल-पट्टी.

(सभी कार्टून मंजुल की कूची से.)

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