गैंगरेप डॉक्यूमेंट्री: असल मुद्दा क्या है?

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टीवी चैनलों, अख़बारों और संसद में निर्भया पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘इंडियाज़ डॉटर’ पर शंकाओं और आपत्तियों का बहुत शोर हो रहा है. पर कहीं ये सुनाई नहीं दे रहा कि इस फ़िल्म से उठनेवाला मूल सवाल क्या है?

जिन सवालों पर बहस हो रही है वो कुछ यूं हैं. क्या इस डॉक्यूमेंट्री से दुनिया में भारत की छवि ख़राब हो सकती है? फ़िल्म में बलात्कार के दोषी के इंटरव्यू को इजाज़त कैसे दी गई? क्या इस फ़िल्म को बैन करना सही है?

पर ये कोई नहीं पूछ रहा कि अगर कोई फ़िल्म एक बार फिर कुछ ऐसे पुरुषों की सोच सामने लाती है जो बलात्कार जैसी हिंसा को अपने मन में सही ठहराते हैं, तो ये सोच हमारे समाज में कितनी गहरी है? और इसको बदलने के लिए सरकार, पुलिस और समाजसेवियों की कोशिशों में क्या कमी है?

दिसंबर 2012 से बार-बार, बलात्कार और महिलाओं की सुरक्षा पर बात हो रही है. इसमें गर्व भी महसूस किया जा रहा है कि मुद्दे पर नज़र तो है. पर वाजिब सवाल उठाने और मुद्दे की पेचीदगियां समझने से क्यों लोग कतरा रहे हैं?

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Image caption लेसली उड्विन ने ‘इंडियाज़ डॉटर’ फ़िल्म बनाई है.

फ़िल्म की आलोचना

इस नई फ़िल्म को ही लीजिए. इसके आलोचकों में मीडिया और राजनेताओं से भी आगे महिला आंदोलनकारी हैं.

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह समेत कई महिलाओं ने पत्र लिखकर निर्भया के केस की अदालती कार्रवाई ख़त्म होने तक इस फ़िल्म को ना दिखाए जाने की मांग की है.

उनके मुताबिक़ दोषी या उसके व़कील के बयान आगे की कार्रवाई पर असर डाल सकते हैं. बल्कि उन्हें डर है कि ऐसे बयान घृणा पैदा करेंगे और दोषी के लिए फांसी की मांग को बल मिलेगा और बलात्कार के लिए फांसी की सज़ा के वो ख़िलाफ़ हैं.

ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमेन्स एसोसिएशन की अध्यक्ष कविता कृष्णनन ने एक लेख में कहा है कि बलात्कार करने वाले पुरुषों की मानसिकता दुनियाभर में ऐसी ही है.

वो कहती हैं कि इसे ऐसी फ़िल्म में दोहराने से भारतीय मर्दों और ग़रीब तबके के लड़कों के बारे में ग़लत आम धारणाएं बनने का डर है.

नाराज़गी फ़िल्म के नाम से भी है - निर्भया को ‘इंडियाज़ डॉटर’ कहने से. उनके मुताबिक ये फिर उस सोच को बढ़ावा देता है जो लड़कियों को ‘बेटी’ या ‘बहू’ के दायरे में रखकर उनकी सुरक्षा के लिए उन्हीं की आज़ादी कम करने की पैरवी करती है.

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क्या समाधान ‘बैन’ है?

अपनी सभी आपत्तियों के बावजूद महिला आंदोलनकारी फ़िल्म पर ‘बैन’ की मांग नहीं कर रहीं.

‘द हिन्दू’ अख़बार में रुकमिणी श्रीनिवासन ने लिखा है कि इस फ़िल्म को देखना ज़रूरी है ताकि भारत में यौन हिंसा की मूल वजहों को सही तरीके से समझा जाए और उससे निपटने के कारगर रास्ते निकाले जाएं.

कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें लगता है कि ये फ़िल्म रूढ़िवादी विचारों और लड़कियों और लड़कों की बराबरी को ग़लत बताने वाले बयानों को सामने लाकर आईना दिखा रही है.

जाने-माने गीतकार जावेद अख़्तर ने बुधवार को राज्य सभा में कहा कि, “सोचने वाली बात ये है जिस तरह का तर्क ये बलात्कारी दे रहा है, यही तर्क ऐसे लोग भी देते हैं जो अपने आप को समाज सुधारक समझते हैं, जो अपने आप को संस्कृति का पहरेदार समझते हैं.”

यौन हिंसा का मुद्दा पेचीदा है और समाज में लंबे समय से चली आ रही समझ से जुड़ा है. उसे सामने लाने वाली फ़िल्म या लेख बेचैनी पैदा करते हैं, पर प्रतिबंध लगाने का आसान तरीका बहस को आगे ले जाने की बजाय रोकता है.

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बलात्कार पर फांसी

पिछले समय में ऐसे आसान रास्ते कई बार चुने गए हैं. दिसंबर 2012 में जब यौन हिंसा के ख़िलाफ़ बने क़ानून को कड़ा करने की कवायद शुरू हुई तो वो फांसी की सज़ा पर आकर सिमट गई.

महिला आंदोलनकारी जो दशकों से क़ानून में बदलाव की मांग कर रहे थे, उन्होंने कहा कि फांसी जैसी कड़ी सज़ा बलात्कार की रोकथाम का इलाज नहीं है और ये समझ दुनियाभर के अनुभव से बनी है.

साथ ही उन्होंने मांग की कि नए क़ानून में बलात्कार को सिर्फ़ सड़क पर एक अजनबी द्वारा की गई हिंसा से आगे बढ़कर समझा जाए और उसी मुताबिक क़ानून में प्रावधान लाए जाएं.

पर शादी में बलात्कार के लिए सज़ा, और बलात्कार के मामलों में सेना को आफ़्स्पा (जो सेना को विशेषाधिकार देता है) क़ानून की सुरक्षा ना दी जाने की उनकी मांगें, नहीं मानी गईं.

ये मौजूदा समझ को चुनौती देने वाले ख़्याल थे, नई सोच थी, नज़रिया बदलने की दरकार कर रही थी, नई बहस को जन्म देने का माद्दा रखती थी. पर ये भी फांसी की सज़ा की मांग के शोर में गुम गई.

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Image caption दोषी मुकेश सिंह ने ख़ुद को मिली मौत की सज़ा के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है.

दोषी कौन?

बलात्कार के ख़िलाफ़ क़ानून कड़ा करने के लिए फांसी का प्रावधान लाना, निर्भया पर बनी फ़िल्म के कुछ अंश की जानकारी पर ही फ़ैसला सुनाना या लेखक वेन्डी डॉनिगर की हिन्दुओं पर लिखी किताब पर रोक लगाना.

क्या अलग नज़रिए को समझने की सहनशीलता कम हो रही है? या ठहरकर मुद्दों पर समझ बनाने की बजाय तेज़ी से विचारों को सामने रखने की चाह बढ़ रही है?

‘इंडियाज़ डॉटर’ बनाने वाली फ़िल्मकार लेस्ली उड्विन, ख़ुद बलात्कार का शिकार हो चुकी हैं. फिर भी इस फ़िल्म में बलात्कार के दोषी व्यक्ति के विचार सामने रखना उन्होंने सही और ज़रूरी समझा.

वहीं अमरीका में बलात्कार और जान से मारने की कोशिश से उबरी एक महिला ने तय किया कि वो अपने बलात्कारी का नाम मीडिया में नहीं आने देंगी. उनके लिए उसके पक्ष से ज़्यादा ज़रूरी उस घटना के बाद बलात्कार पीड़ितों के साथ किया जा रहे उनके अपने काम की चर्चा है.

ज़ाहिर है महिलाओं की सुरक्षा पर नज़र बहुतों की है, बस नज़रिया अलग है. ये आवाज़े जुड़ जाएं तो शोर में भी आगे का रास्ता साफ़ सुनाई पड़ेगा.

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