'डॉक्यूमेंट्री पर बैन लगाना गलत'

  • 8 मार्च 2015
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लेज़्ली उडविन की डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'इंडियाज़ डॉटर' पर भारत सरकार के प्रतिबंध के बावजूद बॉलीवुड की कई हस्तियों ने इसे दिखाने की पुरज़ोर वकालत की है.

नसीरुद्धीन शाह, परेश रावल और अन्नू कपूर ने इस फ़िल्म को दिखाए जाने की पुरज़ोर वकालत की है.

उनका कहना है कि यह फ़िल्म समाज को अपने अंदर झांकने पर मजबूर करती है.

नसीरुद्दीन शाह

मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि इस फ़िल्म पर प्रतिबंध लगाया ही क्यों गया है.

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मैंने फ़िल्म देखी नहीं है, लेकिन मुझे पता है कि इसमें क्या है. मैंने फ़िल्म बनाने वाली महिला का साक्षात्कार सुना है, जो खुद भी एक बलात्कार पीड़िता हैं और शायद इसीलिए वह एक बलात्कार पीड़िता का दर्द समझती हैं.

इस फ़िल्म को ज़रूर देखा जाना चाहिए, क्योंकि यह एक बलात्कारी के दिमाग़ को समझने में मदद करती है.

बहुत सारे लोग उसी तरह की बातें करते हैं जैसे वह बलात्कारी कह रहा है. न उनकी बात को ग़लत ठहराया जाता है और न उन्हें सज़ा मिलती है.

उस बलात्कारी ने जो बातें कहीं हैं वह हमारे देश के ज़्यादातर पुरुषों की मानसिकता को दर्शाता है.

प्रतिबंध का मतलब यह है कि इस देश में सभी मूर्ख हैं और वह जो देखेंगे उससे प्रभावित हो जाएंगे. लोगों को डॉक्यूमेंट्री देखने दें और फिर फ़ैसला करने दें.

परेश रावल.

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मुझे लगता है कि डॉक्यूमेंट्री से प्रतिबंध हटना चाहिए. अगर आप नाथूराम गोडसे का बयान रिकॉर्ड कर सकते हो, उसे प्रकाशित कर सकते हो तो ऐसे लोगों का बयान भी दिखाया जाना चाहिए.

ताकि हमें पता तो लगे कि वह क्या सोचता है. हमें पता लगे कि ऐसे भी लोग होते हैं.

अन्नू कपूर

मैंने यह फ़िल्म देखी है और यह आंखे खोलने वाली है. हिंदुस्तान का प्रजातंत्र, हिंदुस्तान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता- यह सब किताबी बातें हैं.

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यह फ़िल्म हर एक व्यक्ति को, हमारे बच्चों को स्कूल में, कॉलेज में दिखाई जानी चाहिए. हमारे समाज में बच्चियों को यह सिखाया जा रहा है कि अपना बलात्कार मत होने दो, लेकिन बच्चों को यह नहीं सिखाया जा रहा कि बलात्कार मत करना.

भारत में देवियों की पूजा की जाती है, लेकिन हक़ीक़त में हर बच्ची, हर बेटी, हर बहू अपमानित और प्रताड़ित की जाती है.

हमारा समाज कहता है कि हमारी संस्कृति 4,000 साल पुरानी है. ऐसी संस्कृति को चूल्हे में डाल देना चाहिए- जो स्त्री का ऐसा निरादर करती है.

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