ये हैं आज के दौर के 'राजा'

शाही शादी

भारत के राजाओं की शक्तियां उसी दिन ख़त्म हो गई थीं जब वर्ष 1947 में देश को आज़ादी हासिल हुई थी, लेकिन आज के दिन भी ये राजसी परिवार रईस और प्रभावशाली हैं.

परियों की कहानियों जैसी भव्य शादी कैसे की जाती है- ये भी कोई इनसे सीखे. ऐसी ही एक शादी में पहली बार शरीक होने का मुझे मौका मिला.

दूल्हे के पिता ने मुझसे कहा, "ऐसे मामलों में पैसे की बात नहीं सोची जाती है."

और जब मैंने दूल्हा-दुल्हन के शादी के जोड़े में सोने-चांदी की कढ़ाई देखी, हीरे आभूषण देखे, महलों की सजावट देखी तो उनकी बात सच लगी.

पढ़ें पूरी रिपोर्ट

शाही बारात

भारत में शादी खर्चीला सामाजिक कार्यक्रम होता है- आपसे उम्मीद की जाती है कि आप इस आयोजन को अपने जीवन का सबसे 'खूबसूरत' दिन बनाएँ. और ऐसी खूबसूरती में खर्चा तो होता ही है.

राजकुमार जयदीप जडेजा और राजकुमारी शिवात्मिका कुमार की शादी ने भव्य शब्द को नया अर्थ दे दिया था.

आज़ाद भारत के इतिहास की शायद सबसे भव्य शादी का नज़ारा यकीनन ज़बर्दस्त था. और अभी तो शादी की रस्में शुरू भी नहीं हुई थीं.

सैंकड़ों मेहमानों ने शादी से पहले पूरा हफ़्ता, 23 साल के दूल्हे जयदीप जडेजा के ऐतिहासिक खानदानी घर, राजकोट में गुज़ारा. 1870 में बना सौ कमरों का ये महल उनकी राजसी ठाठ-बाट का जीता जागता नमूना है.

दूल्हे के पिता मंधाता सिंह जडेजा गुजरात के पूर्व रियासत सौराष्ट्र के राजकुमार हैं.

दुल्हन 25 वर्षीय शिवात्मिका कुमार राजस्थान की पूर्व रियासत डुंगरपुर की राजकुमारी हैं.

लंबा राजसी जुलूस

राजकोट 13 लाख की आबादी वाला एक सुस्ताता सा शहर है, लेकिन सात दिन पहले यह अचानक जैसे जाग गया था.

शादी के आकर्षण का केंद्र था आठ किलोमीटर लंबा राजसी जुलूस- जिसमें राजसी कपड़ों से सजे 30 राजकुमारों समेत 5,000 लोग थे. ढोल- नगाड़ों के साथ-साथ कई ऊंट, घोड़े, हाथियों के साथ-साथ चल रहे थे.

उनमें से एक हाथी पर लगे सिंहासन पर दूल्हा बैठा हुआ था.

कई सारे बैंड बॉलीवुड के लोकप्रिय गाने बजा रहे थे और सड़कों, छतों, पेड़ों, सीढ़ियों पर लोगों का हुजूम इस शानदार जुलूस को देख रहा था.

यह किसी फ़िल्म का दृश्य हो सकता था- तड़क-भड़क, जोश और भीड़, सब कुछ सपना सा लग रहा था.

'मैं ऐसे शादी नहीं करूंगी'

इस भव्यता के बीच भी गहरा बंटवारा नज़र आ रहा था. महंगे कपड़े और जेवर पहने इन रईस और मशहूर लोगों को भीड़ में शामिल लोग हसरत से, कुछ आदर भाव से देख रहे थे

भीड़ में कई ऐसे लोग थे जो बमुश्किल अपना पेट पालते होंगे. कैसे देखते हैं आम लोग इस अमीरी को...

पूर्व राजाओं के साथ बदलते भारत का क्या रिश्ता है?

उस भीड़ में शामिल कुछ लोगों से मैंने पूछा कि उन्हें विलासिता और संपत्ति का ऐसा प्रदर्शन कैसा लगता है.

16 साल की गीता ने कहा, "मुझे तो यह बहुत अच्छा लगता है. वह कितने ख़ूबसूरत लगते हैं. मुझे राजशाही पसंद है क्योंकि यह हमारी परंपरा का हिस्सा है, लेकिन मैं ऐसे किसी से शादी नहीं करना चाहूंगी."

"फिर मैं सड़क किनारे ठेले से कुछ खा नहीं पाऊंगी और अपनी स्कूटी नहीं चला सकूंगी."

'राजशाही लौट आए'

एक बुज़ुर्ग महिला ने कहा कि कितना अच्छा हो कि राजाओं का राज फिर से आ जाए, लेकिन तभी पीछे से कोई चिल्लाया, "नहीं, नहीं हमें अपना लोकतंत्र पसंद है."

लड़के के पिता, राजकुमार मंधाता सिंह जडेजा, इस सारे खर्च को लेकर सहज थे, "यह ऐसा आयोजन है जिसमें हमने समाज के हर वर्ग को शामिल किया है."

इस आयोजन के दौरान राजपरिवार ने राजकोट के 17,000 लोगों को खाना खिलाया. रक्तदान शिविर लगाए. वे गरीब और ज़रूरतमंदों की मदद उनके लिए काम करने वाली संस्थाओं के ज़रिए कर रहे हैं. गरीबों के लिए भारी दान देते हैं.

जाहिर है इस भारी खर्च में ये सब भी शामिल होगा.

लेकिन क्या यह काफ़ी है? बहुत से भारतीय दुनिया के अरबपतियों की सूची में शामिल हैं और यह तर्क दिया जाता है कि भारत के अमीरों को गरीबों के लिए और ज़्यादा करना चाहिए.

वह इससे सहमति जताते हैं, "बिल्कुल सही बात है. हमारे जैसे रईसों की गरीबों के प्रति ज़िम्मेदारी भी बड़ी है और हमें और ज़्यादा करना चाहिए."

परंपरा, पुरातन सोच

राजकोट में हफ़्ते भर तक पारंपरिक जश्न के बाद 600 से ज़्यादा मेहमान सैकड़ों किलोमीटर दूर बेंगलुरू पंहुचे.

शादी शानदार बैंगलोर पैलेस में हुई, जो इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के आधिकारिक आवासों में से एक विंडसर कैसल की तर्ज पर बनाया गया है.

नए भारत में राजशाही नए तरीके से अपने आपको स्थापित कर रही है. भारत के दूसरे कई शाही परिवारों की तरह जडेजा परिवार भी अब अच्छा व्यवसाय कर रहा है- इसने जलविद्युत, खनन, जैव-ईंधन और अन्य कई क्षेत्रों में पैसा लगाया है.

पुराने राजा अब नए सफल उद्दोगपति और व्यापारी बन गए हैं. इस परिवार ने 3 करोड़ 13 लाख रुपए से ज़्यादा देकर स्टार ऑफ़ इंडिया रॉल्स रॉयस कार को दोबारा खरीदा.

यह कार कभी परिवार के पास हुआ करती थी, लेकिन 40 साल पहले बेच दी गई थी. राजकुमार मंधाता सिंह जडेजा ने कहा ये कार देश की विरासत का हिस्सा है और इसीलिए इसे वापस लाना उनकी जिम्मेदारी थी.

शाही परिवार में ही शादी

बैंगलूरु में शादी की चहल-पहल में सादगी थी. भारत के सभी प्रमुख राजसी परिवार के लोग मौजूद थे. ये मौका आपसी रिश्तेदारी को बेहतर करने का भी होता है. यहां शादियां भी तय होती हैं और व्यापारिक रिश्ते भी.

हाल ही में मैसूर की पूर्व रियासत के राजा बनाए गए 22 वर्षीय यदुवीर कृष्णादत्ता अमरीका में पढ़े हैं, लेकिन अपनी पारिवारिक विरासत और व्यवसाय को जारी रखने के लिए वापस लौट आए.

जब मैंने हीरे जड़ी पगड़ी पहने हुए शर्मीले और ख़ामोश इस युवक से पूछा कि क्या वह किसी आम लड़की से शादी कर सकते हैं तो उन्होंने दृढ़ता के साथ जवाब दिया, "नहीं, मैं शाही परिवार की ही किसी लड़की से शादी करूंगा. परंपरा को जारी रखना मेरा कर्तव्य है."

दूल्हे जयदीप जडेजा भी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि शादियां शाही परिवार में होना ही बेहतर है.

वह कहते हैं, "लोग हमारे शाही परिवार में ही शादी इसलिए करना चाहते हैं, क्योंकि आम आदमी के लिए शाही परिवार में लागू प्रतिबंधों के साथ रहना मुश्किल हो जाएगा."

दरअसल, मुझे यहां ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जिसने शाही खानदान के बाहर शादी की हो या करना चाहता हो.

शायद ऐसी ज़िंदगी जीना सचमुच में मुश्किल होता हो जो अब भी पुराने वक्त से बंधी हो.

शादी के दौरान मैंने शाही परिवार के सैकड़ों महिला, पुरुषों को देखा जो सभी पढ़े-लिखे थे. ज़्यादातर विदेश में पढ़े थे लेकिन मुझे ऐसा लगा कि ज्यादातर लोग हर हाल में परंपरा को बनाए रखने के हक में थे.

दुल्हन

दुल्हन, शिवात्मिका कुमार, के पास मनोविज्ञान की डिग्री है और वह बेंगलुरू में ही पली-बढ़ी हैं.

जब मैं शादी से ठीक पहले उनसे मिली तो वह अंगूठे से सिर तक लाल लिबास में ढकी हुईं थीं. पूरी तरह से घूंघट हटाए बगैर वे मुझे कहती हैं "इसकी इजाज़त नहीं है."

मैंने पूछा कि क्या वह बेंगलुरू जैसे बड़े शहर से काफ़ी छोटे शहर राजकोट जाना पसंद करेंगी. अपना घूंघट हल्का सा उठाते हुए उन्होंने धीरे से कहा, "हां मैं बहुत ख़ुश हूं."

"मेरे अभिभावकों ने यह शादी तय की है और मुझे यक़ीन है कि मेरे लिए यही सबसे अच्छा है. मैं अपनी परंपरा का पालन करूंगी."

और अभी तक वह दूल्हे से बस ज़रा देर को मिली हैं. वह कहती हैं, "मेरी बस एक ही ज़रूरत थी कि आदमी जानवरों को पसंद करने वाला होना चाहिए, जो कि वह हैं. इसलिए मैं बहुत ख़ुश हूं."

उसने उत्साह से कहा, "मैं अपने सारे पालतू जानवरों को ले जाऊंगी. मैं अपने कछुए को, तोतों को और कुत्तों को ले जाऊंगी."

शादी कुछ ही घंटों में पूरी हो गई. दुल्हन अपने पति के साथ राजकोट के लिए रवाना हो गई जहां कुछ और जश्न होंगे.

मुझे एहसास हुआ कि ये महाराजा भी उसी द्वंद्व से गुज़र रहे हैं, जिससे इस वक्त भारत गुज़र रहा है- आधुनिक विचारों और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना.

मुझे यह भी अहसास हुआ कि राजकुमार और राजकुमारियां सिर्फ़ मेरी बेटी की कहानियों की किताबों के किरदार नहीं हैं- एक क्षण के लिए मैं उस दुनिया में पहुंच गई थी जहां परियों के किस्से और हक़ीक़त मिलते हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार