डॉक्टर जोड़ा जिसने बनाया सस्ता अस्पताल

  • 14 मार्च 2015
आस्था अस्पताल, डॉक्टर अतुल वर्मा, डॉक्टर जयश्री शेखर इमेज कॉपीरइट British Broadcasting Corporation

उत्तरी बिहार के तेजी से उभर रहे हाजीपुर शहर के शोर शराबे के बीच पहली नज़र में लाल और सफेद रंग वाली ये इमारत किसी सरकारी गेस्ट हाउस की तरह लग रही थी.

लेकिन करीब से देखने पर मालूम पड़ा कि लोगों का 'आस्था अस्पताल' में लोगों का तांता लगा हुआ है. यह अस्पताल एक कारोबारी डॉक्टर दंपति चलाता है.

वाजिब कीमतों पर गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के मक़सद से इस जोड़े ने निजी क्षेत्र की ऊँची तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ दी थी.

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आमतौर पर भारत में ये माना जाता है कि अच्छी मेडिकल सेवा तक केवल उन्हीं लोगों की पहुंच हैं जिनकी जेब में पैसा है.

लेकिन इसी सिलसिले में पेशे से सर्जन अतुल वर्मा और आंखों की डॉक्टर जयश्री शेखर लोगों की राय बदली है.

आखिरकार भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का एक फीसदी ही देश की सेहत की देखभाल के लिए खर्च करता है.

वह दुनिया में स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च करने वाले देशों में से है. सभी घरेलू खर्चों को मिलाकर देखें तो 69 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य के नाम पर निकल जाता है.

सरकारी अस्पताल

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दुनिया भर में कम ही देशों में ऐसा देखने को मिलता है. निजी खर्चों के लिहाज से यह दुनिया के सबसे अधिक खर्च करने वाले देशों में से है. लाखों भारतीय इलाज का खर्च उठाते हुए दिवालिया हो जाते हैं.

हालांकि स्वास्थ्य सेवाओं सरकार की ओर से मुफ्त में मुहैया कराई जाती हैं लेकिन ग्रामीण आबादी का केवल 22 फीसदी और शहरी जनसंख्या का महज 19 फीसदी ही सरकारी अस्पतालों की सेवाओं तक पहुंच पाते हैं.

बिहार में हालात और भी खराब हैं. सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएँ ढहने की कगार पर हैं.

हालांकि राज्य में 800 सरकारी अस्पताल, प्राइमरी हेल्थ क्लिनिक और तकरीबन दो हज़ार के करीब प्राइवेट नर्सिंग होम या मेडिकल क्लिनिक चल रहे हैं.

डॉक्टरों की स्थिति

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प्राइवेट नर्सिंग होम को लेकर बनाए गए सरकारी नियम कायदों की धज्जियां उड़ाना कोई अनूठी बात नहीं मानी जाती.

18 हज़ार मरीज़ों के लिए महज एक डॉक्टर की उपस्थिति से मरीज़ों और उनका इलाज करने वाले डॉक्टरों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है.

बेहद गरीब लोगों के लिए स्वास्थ्य बीमा के नाम पर मामूली सरकारी मदद दिए जाने का प्रावधान है लेकिन बिना रिश्वत दिए इसे हासिल कर पाना उतना ही मुश्किल भी है.

एक अनुमान के मुताबिक बाज़ार में मौजूद दो तिहाई दवाएं नकली हैं.

मरीजों का इंतजार

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सात साल पहले ये डॉक्टर जोड़ा विदेश समेत कई जगहों पर काम करने के बाद अपने राज्य लौटा.

अपना अस्पताल शुरू करने से पहले डॉक्टर वर्मा थोड़े समय के लिए एक सरकारी अस्पताल के लिए भी काम किया था.

43 साल के डॉक्टर वर्मा कहते हैं, "दिल्ली में भारत के एक बहुत बड़े प्राइवेट अस्पताल में काम करने के दौरान मैंने देखा कि बिहार से आने वाले मरीज दाखिले के लिए कई दिनों तक इंतजार करते थे. उनके रिश्तेदार हाथ जोड़कर खड़े हो जाते थे."

सहूलियतें

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डॉक्टर वर्मा ने बताया, "हम कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं थे क्योंकि अस्पताल में बिस्तर कम थे. मुझे ये ख्याल आया कि घर लौट कर हमें कुछ करने की जरूरत है."

उन्होंने एक पुराने स्कूल की इमारत को खरीदने के लिए बैंक से कर्ज लिया और 3600 वर्ग फीट की इस जगह पर उन्होंने 12 बिस्तरों वाला एक अस्पताल पिछले साल शुरू किया.

इससे शुरू करते वक्त तमाम बारीकियों का ख्याल रखा गया था, जैसे हवादार कमरे, इमारत को ठंडा रखने का इंतजाम, बड़ी जगह वाला कंसल्टेशन रूम, साफ सुथरा ऑपरेशन थिएटर, बिजली की फायरप्रूफ़ वायरिंग, एक दवा की दुकान.

देखने की फीस

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अस्पताल के ग्राउंड फ्लोर में हर रोज मरीजों को देखा जाता है. मरीजों को देखने की फीस 200 रुपए है और उनके ऑपरेशन का खर्च 8000 से 12000 रुपए तक लिया जाता है जो इसी शहर के दूसरे प्राइवेट अस्पतालों से कहीं कम है.

थोड़े शब्दों में कहें तो आस्था अस्पताल के मरीज़ों में दो घंटे पहले बिना मलाशय के जन्मा एक नवजात बच्चे से लेकर प्रोस्टेट सर्जरी के लिए व्हीलचेयर पर आई 108 साल की एक महिला भी है.

इस अस्पताल में ये जोड़ा रोज सैंकड़ों मरीजो को देखता है. वे गांधी सेतु के कुख्यात ट्रैफिक से गुजरकर रोज यहां पटना से आते हैं.

चुनौतियों का पहाड़

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Image caption बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं पर कई बार गंभीर सवाल खड़े हुए हैं.

उनके सामने बिजली और पानी जैसी तमाम मुश्किलें हैं. लेकिन वे पीछे हटने की बात नहीं सोचते.

डॉक्टर वर्मा कहते हैं, "कभी कभी जब बहुत थका होता हूं तो लगता है मरीजों को नहीं देख पाऊँगा."

उनकी योजना अस्पताल की एक और मंजिल बनाने की है, जहां जयश्री अपने मरीजों को देख सकेंगी.

उन्होंने सरकार से गरीब लोगों के लिए 100 बिस्तरों वाले अस्पताल के लिए जमीन मांगी है जिसकी मंजूरी के लिए वे तीन सालों से इंतजार कर रहे हैं.

बकौल डॉक्टर वर्मा, "हम हारे नहीं है, अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है."

(साथ में बीबीसी संवाददाता रूपा झा के इनपुट्स)

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