आप: 'एक अनूठे प्रयोग का हास्यास्पद हो जाना'

  • 12 मार्च 2015
केजरीवाल, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव इमेज कॉपीरइट AFP PTI

दिल्ली में सरकार बनाने के लिए कथित तौर पर विधायकों की खरीद-फ़रोख्त का आरोप लगने के बाद आम आदमी पार्टी की राजनीति पर कुछ दाग लगते नज़र आ रहे हैं. ख़ास बात ये है कि आम आदमी पार्टी पर ये दाग कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी ने नहीं बल्कि उसके पू्र्व सहयोगियों ने लगाए हैं.

ऐसे सहयोगी जो पहले दोस्त थे, उन्हें अब 'सहयोगी' कहना अनुचित होगा. आम आदमी पार्टी पर बीते कुछ दिनों में कई तरह की तोहमतें लगी हैं. उसी कड़ी मेें नई तोहमत ये है कि एक ऑडियो रिकॉर्डिंग सामने आई है जिसमें अरविंद केजरीवाल पर कांग्रेस विधायकों को अपने पाले में लाने की कोशिश का आरोप है.

ये तब की बात बताई जा रही है जब दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगा था और नए सिरे से विधानसभा के चुनाव नहीं हुए थे.

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आम आदमी पार्टी की फ़ज़ीहत के लिए यह टेप ही काफी नहीं था. इसके बाद योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने चिट्ठी जारी की जिसमें सफाई कम आरोप ज़्यादा थे.

योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति से जिस तरह निकाला गया और उसके बाद यह मसला खींचतान के साथ जिस मोड़ पर आ गया है, उससे नेताओं का जो भी बने, पार्टी समर्थकों का मोहभंग ज़रूर होगा. दोनों तरफ के आरोपों ने पार्टी की कलई उतार दी है.

इस घटनाक्रम ने भारतीय राजनीति के एक अभिनव प्रयोग को हास्यास्पद बनाकर रख दिया है. लोकतांत्रिक मूल्य-मर्यादाओं की स्थापना का दावा करने वाली पार्टी संकीर्ण मसलों में उलझ गई. उसके नेताओं का आपसी अविश्वास खुलकर सामने आ गया.

केजरीवाल का वर्चस्व

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'नई राजनीति' के 'प्रवर्तक' अरविंद केजरीवाल पर उनके ही 'साथियों' ने विधायकों की ख़रीद-फ़रोख्त का आरोप लगाया है.

योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने पार्टी की रीति-नीति को निशाना बनाया है पर मामला इतना ही नहीं लगता. इसमें कहीं न कहीं व्यक्तिगत स्वार्थ और अहम का टकराव भी है.

यह स्वस्थ आत्ममंथन तो नहीं है. इस झगड़े के बाद पार्टी में अरविंद केजरीवाल का वर्चस्व ज़रूर कायम हो जाएगा, पर गुणात्मक रूप से पार्टी को ठेस लग चुकी है.

'आप' के विफल होने पर कई लोगों को बड़ा धक्का लगेगा. उनको भी जिन्होंने आम आदमी पार्टी में नरेंद्र मोदी के उभार के खिलाफ वैकल्पिक राजनीति की आहट सुनी थी.

दूसरे राज्यों में पार्टी के विस्तार की संभावनाओं को भी ठेस लगेगी. नेताओं की आपसी खींचतान में इस बात पर भी रोशनी पड़ेगी कि 'आप' के कांग्रेस और भाजपा के साथ किस तरह के रिश्ते थे.

वही सियासी अंदाज

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आम आदमी पार्टी के चार बड़े नेताओं ने 'आधिकारिक' पत्र लिखकर शांति भूषण, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव पर पार्टी विरोधी काम करने का आरोप लगाया. विधायकों के दस्तखत के साथ एक चिट्ठी भी तैयार है. ऑडियो-वीडियो टेप जारी होने लगे हैं.

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के शपथ ग्रहण के दिन ही पार्टी की धड़ेबाज़ी सामने आ गई थी. अब सुनाई पड़ रहा है कि 28 मार्च को राष्ट्रीय परिषद की बैठक में 'बागियों' को पार्टी से निकाला जाएगा. यह कहानी दूसरी पार्टियों में दोहराई जाती रही है.

सिद्धांत और व्यवहार में 'आप' और उससे जुड़े लोगों का आचरण कांग्रेस और भाजपा की सियासत से किसी तरह अलग नहीं लगता. पार्टी के सामने संरचना को लोकतांत्रिक बनाने का भी मौका था. उसने मौका खो दिया. यह पूरी राजनीति स्वांग साबित हुई.

बहुमत का खतरा

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मतदाताओं ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार को बिना किसी डर के पांच साल तक काम करने का मौका दिया है. लेकिन विधानसभा की 70 सीटों में से 67 का अभूतपूर्व बहुमत पार्टी के लिए खतरनाक है.

राजनीति में 'नए' शामिल हुए इन जन-प्रतिनिधियों में कई किस्म की मनोकामनाएं हैं. इनमें सत्ता की मनोकामना भी है. इन विपरीत मनोकामनाओं को समझना और उन्हें पूरा करना बड़ी चुनौती है.

'आप' की सफलता के पीछे कई कारण बताए जाते हैं. उनमें से एक है मोदी-विरोधियों का एक साथ आना. दिल्ली में चुनाव से ठीक पहले जामा मस्जिद के शाही इमाम से लेकर हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी, ममता बनर्जी से लेकर प्रकाश करात और नीतीश कुमार से लेकर लालू यादव तक ने आम आदमी पार्टी का समर्थन किया था.

दरअसल इन सबको 'आप' में उम्मीदों का एक नया आकाश नज़र आया. इस घटनाक्रम से यह भी नज़र आ रहा है कि कांग्रेस ने भी भाजपा को हराने के लिए 'आप' को अपना समर्थन दिया.

छूमंतर होता जादू

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आम आदमी पार्टी तीसरे मोर्चे का रूप लेती दिखाई पड़ती थी. इसके विपरीत देश के मध्यवर्ग, युवाओं और महिलाओं की उम्मीदों की 'नई राजनीति' का मॉडल भी इसमें दिखाई पड़ रहा था.

अब ज़्यादा बड़ा सवाल यह है कि दिल्ली की प्रयोगशाला से निकला यह जादू क्या इस विवाद के बाद भी देश के सिर पर चढ़कर बोलेगा? या उसी तेजी से छूमंतर हो जाएगा, जिस तेजी से जन्मा था?

सत्तर के दशक में असम आंदोलन के बाद असम गण परिषद ऐसी ही 'पवित्र' पार्टी के रूप में उभरी थी.

दुनिया के कुछ अन्य देशों में आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियां बनीं हैं. अमरीका में एक टी-पार्टी बनी थी. हाल में ग्रीस में जीतकर आई सिरीजा पार्टी भी परम्परागत राजनीति के विकल्प के रूप में आई है.

लेकिन महत्वपूर्ण बात है दीर्घकालीन विकल्प बनना. 'आप' में उसकी इच्छा दिखाई नहीं पड़ती.

वैचारिक अंतर्विरोध

भारत में 'आप' का उदय आर्थिक संकट के कारण नहीं हुआ. वह राजनीति और प्रशासन की परम्परागत रीति-नीति के खिलाफ़ एक प्रकार की प्रतिक्रिया है.

लेकिन व्यक्तियों और शक्तियों का जो टकराव उसके भीतर दिखाई पड़ रहा है, वह परम्परागत राजनीति जैसा ही है.

पार्टी में एक-दूसरे से विपरीत विचारों के लोग जिस प्रकार जमा हुए, उससे भी संदेह पैदा होता है. मीरा सान्याल और मेधा पाटकर की गाड़ी एक साथ कैसे चल सकती है?

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