राज्यसभा में सरकार के परीक्षा की घड़ी

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बजट सत्र की शुरुआत के बाद बुधवार को नरेंद्र मोदी सरकार को अपने कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की हल्की उम्मीद नज़र आई. विपक्षी दल सरकार को राज्यसभा में घेरने में लगातार सफल रहे हैं.

लोकसभा में सीटों के मामले में कमज़ोर विपक्षी पार्टी कांग्रेस, राज्यसभा में वाम दलों, द्रमुक, बीजू जनता दल और दूसरी धर्मनिरपेक्ष समाजवादी ताकतों से तालमेल की बदौलत मोदी सरकार को बैकफुट पर रखने में कामयाब रही है.

यही वजह है कि सरकार ने जब भी राज्यसभा में विधेयक पारित कराने की कोशिश की है वो एक अंधी गली में फंस गया है. भाजपा के सहयोगी दल भी उसके लिए मुसीबत का सबब बनते रहे हैं.

शिवसेना ने भूमि अधिग्रहण विधेयक का खुलेआम विरोध करने की घोषणा की है. इसी तरह शिरोमणि अकाली दल और लोक जनशक्ति पार्टी का इसपर रूख साफ नहीं है.

साथ चलने की कोशिश

प्रधानमंत्री मोदी को शायद इस बात का अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि गुजरात विधानसभा की तरह संसद में एक नहीं बल्कि दो सदन होते हैं. अब उन्हें इस बात का अहसास हो गया होगा कि सरकार चलाने के लिए सिर्फ लोकसभा में भारी बहुमत हासिल होना काफी नहीं है.

बीते मंगलवार को कोयला एवं खदान नियमन विधेयक पर एकजुट विपक्ष और असंतुष्ट शिवसेना की ओर से गतिरोध के मद्देनज़र ऐसा लगा कि सरकार को विपक्ष की ताकत का पहली बार अहसास हुआ है.

इस विधेयक को सेलेक्ट कमिटि को सौंप दिया गया है और 18 मार्च तक रिपोर्ट देने को कहा है.

पहली बार ऐसा लग रहा है कि मोदी अपनी कार्यशैली से अलग अपने मंत्रियों को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहे हैं. राज्यसभा में विश्वास हासिल करने के लिए ऐसा करना ज़रूरी भी है.

प्रधानमंत्री मोदी ने भूमि अधिग्रहण विधेयक पर बहस शुरू करने की कवायद में अपने चार मंत्रियों राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, वेंकैया नायडू और नितिन गडकरी को लगाया है.

'दोहरा मापदंड'

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सरकार ने भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक का रास्ता साफ कराने के लिए लोकसभा में विपक्ष की पूर्व नेता और मौजूदा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की भी मदद ली. लेकिन विश्वास की कमी तब नज़र आई जब पूर्व कांग्रेसी नेता और ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी वीरेंद्र सिंह को आगे किया गया.

चौधरी वीरेंद्र सिंह के बारे में माना जाता है कि वे यूपीए सरकार की ओर से पेश किए गए भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक पर प्रधानमंत्री मोदी से भी ज्यादा कड़ा रुख अख्तियार करते हैं.

मौजूदा एनडीए सरकार के विधेयक को यूपीए के विधेयक की तुलना में कॉर्पोरेट जगत का ज़्यादा हिमायती माना जाता है.

चौधरी वीरेंद्र सिंह ने लोकसभा में गुस्से से भरे अपने भाषण में कांग्रेस पर ज़मीन अधिग्रहण विधेयक पर 'दोहरा मापदंड' अपनाने का आरोप लगाया.

उन्होंने आरोप लगाया कि जब कांग्रेस सत्ता में थी तो हरियाणा में निजी खरीदारों को बहुत सारी ज़मीन बेची गई. और अब वो भाजपा का इसी बात के लिए विरोध कर रही है.

दिल से साथ

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चौधरी वीरेंद्र ने अपने भाषण से मोदी को खुश करने की कोशिश करने के साथ ही उन्होंने यह भी बताना चाहा कि वे दिल से भाजपा गठबंधन के विधेयक के साथ हैं.

राजनाथ सिंह जो खुद को किसान बताते हैं, के रवैए से लगता है कि वे एनडीए के विधेयक को लेकर बहुत गंभीर नहीं है.

इसलिए अब विधेयक को लेकर पूरी जिम्मेवारी नायडू और जेटली पर टिकी है. फ़िलहाल लगता है कि विपक्ष मोटर वाहन अधिनियम और बीमा विधेयक पर सरकार का समर्थन करेगी.

लेकिन सरकार की असली परीक्षा गुरुवार को उस वक्त होगी जब सरकार बीमा विधेयक सदन में पेश करेगी.

बीमा विधेयक के अंतर्गत बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश को 26 फ़ीसदी से बढ़ाकर 49 फ़ीसदी करने का प्रस्ताव है.

इसकी जगह पर विधेयक के यूपीए संस्करण को लाया गया तो कांग्रेस को एनडीए का साथ देने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए.

असली परीक्षा

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कांग्रेस की उलझन यह है कि वे बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश बढ़ाने के संदर्भ में अन्य विपक्ष के विरोध में नहीं दिखना चाहेगी.

अगर कांग्रेस बीमा विधेयक का समर्थन करती है तो यह इस बात को रेखांकित करेगी कि विपक्ष की रणनीति मुद्दों पर आधारित है जो हर मुद्दों पर अलग-अलग है.

तो सवाल उठता है कि क्या मोदी, जेटली और नायडू की टीम ने लोकसभा में भूमि अधिग्रहण विधेयक पास करा के बड़ी सफलता हासिल की है?

अब यह विधेयक राज्यसभा में है और सरकार के लिए असल परीक्षा की घड़ी आ गई है.

सरकार ने इस विधेयक के मसले पर अपने आप को किसी समयसीमा में नहीं बांधा है जो कि यह दिखाता है कि वे एनडीए के अंदर भी इस बिल पर मिलने वाले समर्थन को लेकर संशकित है.

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