सिर्फ़ गंगा की ही सफाई क्यों होनी चाहिए?

  • 15 मार्च 2015
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गंगा की सफाई पिछले 30 वर्षों से जारी है और अनुमानों के मुताबिक़ अब तक इस पर दो हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च किए जा चुके हैं.

कुछ हफ़्ते पहले सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की खिंचाई करते हुए कहा था, “आप इसे इसी कार्यकाल में पूरा करना चाहते हैं या अगले कार्यकाल में....ताकि मुद्दा ज़िंदा बना रहे.”

एनडीटीवी के अनुसार अदालत ने इससे पहले एक टिप्पणी में कहा था, “आपकी कार्ययोजना देखने के बाद ऐसा लगता है कि गंगा तो 200 सालों बाद भी साफ़ नहीं हो पाएगी.”

कोर्ट ने कहा था, “आपको ऐसे क़दम उठाने चाहिए ताकि गंगा अपनी ‘प्रिस्टीन ग्लोरी’ (पुरानी भव्यता) दोबारा हासिल करे और आने वाली पीढ़ी इसे देख सके. हम नहीं जानते कि हम ऐसा होता हुआ देख पाएंगे भी कि नहीं.”

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गंगा पर अदालत की टिप्पणी के बाद केंद्र सरकार ने अदालत से कहा कि इस पर काम 2018 तक पूरा हो सकता है. इसका मतलब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वर्तमान कार्यकाल तक.

सरकार ने अदालत को बताया कि नदी के किनारे स्थित प्रदूषण फैलाने वाले 118 क़स्बों को चिह्नित कर लिया गया है और "संबंधित नगर पालिकाओं को कहा जा रहा है कि वे अब कार्रवाई करें.”

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक अन्य ख़बर का शीर्षक था, "गंगा को साफ़ करने के लिए सुप्रीम कोर्ट एक श्रीधरन की तलाश कर रही है." इसमें सेवानिवृत्त नौकरशाह श्रीधरन का ज़िक्र किया गया है, जिन्होंने मुश्किल मेट्रो रेल परियोजनाओं को पूरा किया.

इस ख़बर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “गंगा सफाई योजना लगातार विफल रही है, इसके मुखिया को बदल देना चाहिए."

अदालत ने सरकार से एक हलफ़नामा दायर करने के लिए कहा है, जिसमें बताना होगा कि सभी प्लांट की स्थिति क्या है और वे कब काम करना शुरू कर देंगे.

इतनी चिंता क्यों?

इसके अलावा सरकार को एक निश्चित कार्य योजना भी प्रस्तुत करने को कहा गया.

अदालत ने कहा, “गंगा की सफाई पर आप इतने प्रतिबद्ध हैं कि हमसे ज़्यादा आपको इस बारे में चिंतित रहना चाहिए.” मेरा सवाल है, “लेकिन क्यों?”

क्यों सरकार और सुप्रीम कोर्ट को इस मुद्दे पर इतनी चिंता करनी चाहिए. यह ज़िद क्यों केवल एक अकेली नदी को लेकर है?

क्या गंगा की सफाई से भारत साफ़ हो जाएगा? नहीं इससे भारत साफ़ नहीं हो सकता. गंगा हमारे 90 प्रतिशत राज्यों से होकर नहीं जाती है. तो इस एक नदी में ऐसा क्या ख़ास है कि इसके पीछे हम इतना संसाधन और प्रशासनिक समय ज़ाया करें?

कोर्ट और मिथक

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इतना तो तय है कि अदालत इस तथ्य से प्रभावित नहीं है कि अधिकांश हिंदू इस नदी को पवित्र मानते हैं.

इस तरह के वादे करके मोदी सरकार हिंदुओं के वोट बटोरना चाहती है, लेकिन यह राजनीति है. यह पिछड़े मुस्लिमों का आरक्षण ख़त्म करने और गोवध पर प्रतिबंध लगाने जैसी कार्रवाईयों से भी दिखती है.

पिछड़े मुस्लिम उतने ही ग़रीब और मुश्किल में हैं जितने पिछड़े हिंदू. लेकिन उन्हें सिर्फ़ इसलिए सज़ा मिली क्योंकि उनके पुरखों ने अलग धर्म अपना लिया.

यह सब तो ठीक है और भारतीय जनता पार्टी से यही उम्मीद भी थी. उनकी मंशा समझने में मुझे दिक़्क़त नहीं होती.

मेरी समस्या यह है कि इन सब के बीच सुप्रीम कोर्ट क्या कर रहा है.

'यमुना कम गंदी नहीं'

एक गुजराती होने के नाते मुझे इस बात पर भी ताज्जुब है कि तापी को वह ‘फ़ोकस' नहीं मिला. सूरत में रहने वाले बहुत से लोगों के लिए यह नदी पूजनीय है.

मेरी मां नर्मदा का बहुत आदर करती हैं, तो अगर हिंदुओं को ख़ुश रखना है तो इस नदी का आदर क्यों नहीं?

दक्षिण भारत में रहने वाले किसी भी व्यक्ति की तरह मैं कृष्णा और कावेरी पर उतना ही धन और ऊर्जा ख़र्च करना चाहूंगा. लेकिन उन दो नदियों के बारे में ऐसा क्यों नहीं है?

ब्रह्मपुत्र और यमुना, जो गंगा की तरह ही या उससे भी ज़्यादा गंदी है, के बारे में ऐसा है? अगली पीढ़ियों को क्यों नहीं उनकी ‘पुरानी भव्यता’ (इसका जो भी मतलब हो) देखनी चाहिए?

एक रिपोर्ट में कहा गया है, “गंगा के किनारे स्थित 118 क़स्बों में पैदा होने वाले गंदे पानी का दो तिहाई हिस्सा बिना परिशोधन के राष्ट्रीय नदी में गिरता है, जो इसके पुनरुद्धार को अनिश्चितकालीन प्रक्रिया बना देता है.”

सौतेला व्यवहार

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हाल ही में, कई सरकारी एजेंसियों के विशेषज्ञों की एक टीम ने एक रिपोर्ट तैयार की है. इसमें इस बात का ज़िक्र किया गया है कि ये सभी क़स्बे मिलकर प्रतिदिन 363.6 करोड़ लीटर गंदा पानी पैदा करते हैं.

पांच राज्यों में फैले इन क़स्बों में मौजूदा 55 ट्रीटमेंट प्लांटों की कुल क्षमता क़रीब 102.7 करोड़ लीटर प्रतिदिन है.

यानी गंगा को साफ़ करने का मतलब हुआ इन क़स्बों की सफाई और यहां के निवासियों को बेहतर सीवेज और सफाई की व्यवस्था देना.

लेकिन भारत के अन्य क़स्बों का क्या होगा? क्या उन्हें सौतेला बने रहना चाहिए, महज़ इसलिए कि वो इस पवित्र नदी को प्रदूषित करने की स्थिति में नहीं हैं?

सवाल नदारद

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एक हिंदू के रूप में मुझे भी चिंता है कि ग़ैर हिंदू और नास्तिक भारतीय सुप्रीम कोर्ट की उस धारणा का क्या अर्थ लगाएंगे, जिसके अनुसार, पौराणिक कथाओं में अपनी विशेष जगह के कारण गंगा विशेष ध्यान देने की हक़दार है.

अंत में मुझे यह तथ्य परेशान करता है कि मीडिया में भी इस बात को लेकर बहुत सवाल उठते नहीं दिखाई देते.

और किसी मायने में यह ख़ास है इसलिए इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए, इस धारणा का प्रतिरोध भी बहुत कम है.

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