लाहौर के कबूतर.. पंजाब दा दाना-पानी

  • 13 मार्च 2015
पाकिस्तानी कबूतर इमेज कॉपीरइट RAVINDER SINGH

पाकिस्तान और भारत की सीमा पर स्थित दौके गांव के युवाओं की रोज़ी-रोटी का ज़रिया बन गए हैं यहाँ के कबूतर.

दौके गांव में घरों की छतों पर कबूतरों के लिए बने कमरे किसी को भी नज़र आ सकते हैं.

भारत या पाकिस्तान में अपने मूल घर से दूर आ गए भूखे-प्यासे कबूतरों को दाना-पानी देकर गांव के युवा अपने पास रख लेते हैं और फिर कबूतर पालने के शौकीनों को बेच देते हैं.

शौक बना व्यापार

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यह गांव अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज़ 450 मीटर दूर है. लाहौर से उड़कर कई प्रजातियों के कबूतर यहां इस गांव में आकर शरण लेते हैं और गांववालों के अनुसार भारतीय छोर के कबूतर भी ऐसा ही करते हैं.

हरप्रीत सिंह बताते हैं, "गांव में कबूतर पालने वाले कई जगह उनके लिए दाना पानी रख देते हैं और जब भूखे-प्यासे कबूतर नीचे उतरते हैं तो हम उन्हें पकड़ लेते हैं."

एक बार पकड़ने के बाद उनके पैरों में अलग-अलग किस्म की पाजेब डाल दी जाती है.

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दौके के कबूतर प्रेमियों ने इन 'सफ़ेद घुसपैठियों' को स्थानीय नाम भी दे दिए हैं जैसे कि जलदार, शीना, चीना, भूरा, बागा आदि.

करीब 1500 की आबादी वाले गांव में लोग मुख्यतः खेती और दुग्ध पालन पर निर्भर हैं लेकिन गांव के युवाओं ने कबूतर पालने के शौक को व्यापार बना लिया है.

'पसंदीदा गांव'

लाहौर के कबूतरों के शौकीन अपने शौक को लंबे वक्त से ज़िंदा रखे हुए हैं. लंबी उड़ान की प्रतियोगिताओं में कबूतरों को ताकत की दवाएं दी जाती हैं ताकि कबूतर अपने प्रतियोगियों से बेहतर प्रदर्शन कर सके.

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लेकिन कई बार कुछ कबूतर अनजाने में सीमा पार कर जाते हैं और जैसा कि सुखचैन सिंह कहते हैं, "फिर वह अपने पसंदीदा गांव में उतर जाते हैं."

पाकिस्तान से आने वाले कबूतरों के पंखों को अक्सर सूखे रंगों से रंगा जाता है और उनकी कीमत भारतीय कबूतरों के मुकाबले ज़्यादा मिल जाती है.

करनबीर बताते हैं कि जहां भारतीय कबूतर के 1,000 रुपए मिलते हैं वहीं रंगीन पाकिस्तानी कबूतर 4,000 तक में बिक जाता है.

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दौके के नज़दीक के गांवों गांदीविंड, नौशेहरा ढल्ला, भैनी और भारोपाल में भी युवा इस व्यापार में शामिल हो गए हैं और पंजाब के अन्य कबूतरों के शौकीनों तक पाकिस्तानी कबूतर पहुंचा रहे हैं.

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