भारत-श्रीलंका: कितने दूर, कितने पास!

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की श्रीलंका यात्रा दोनों देशों के रिश्तों में एक नए अध्याय की शुरुआत है.

दोनों देशों के बीच संबंधों पर साल 1983 में श्रीलंका में सिंहला समुदाय और तमिल अल्पसंख्यकों के बीच शुरू हुए जातीय संघर्ष का सीधा असर रहा है.

मोदी का यह दौरा कई वजहों से अहम कहा जा सकता है. भारत सरकार की 'पड़ोसी पहले' की नीति के तहत 27 साल बाद प्रधानमंत्री का श्रीलंका दौरे हो रहा है.

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विश्व के राजनीतिक मंच पर भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभाए, इसके लिए यह ज़रूरी है कि वह पड़ोसी देशों को भरोसे में ले. पड़ोसी देशों से निपटते वक़्त यह मुख्य पहलू होता है.

मोदी के श्रीलंका दौरे को इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है.

भारत और श्रीलंका की सरकारों ने चार समझौतों पर दस्तखत किए हैं. इनमें अधिकारियों के दौरों पर वीज़ा नियमों में छूट, कस्टम मामलों में सहयोग, दोनों देशों के युवाओं के बीच बेहतर संवाद और विश्वविद्यालय में एक ऑडिटोरियम बनाने समेत शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग के मुद्दे शामिल हैं.

जाफ़ना में रेल

इन समझौतों के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीलंका के लोगों के लिए ई-वीज़ा सेवा शुरू करने की घोषणा की. उन्होंने श्रीलंका में रेलवे के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए 31.8 करोड़ डॉलर के मदद की घोषणा भी कर दी.

श्रीलंका के उत्तरी और पूर्वी इलाकों के संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में रेल लाइन बिछाने के लिए भारत की मदद अहमियत रखती है.

श्रीलंका को दी जा रही सहायता और मुक्त व्यापार समझौता द्विपक्षीय सहयोग के लिए महत्वपूर्ण है.

तमिलों का मुद्दा

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हालांकि दोनों देशों के बीच सहयोग का मुद्दा तमिल अल्पसंख्यकों के साथ मेल मिलाप, मछुआरों की रिहाई और हिंद महासागर में सुरक्षा सहयोग जैसी बातों पर ज़्यादा निर्भर है.

तमिल और मुस्लिम अल्पसंख्यकों ने जनवरी में श्रीलंका में हुए राष्ट्रपति चुनाव का इस्तेमाल महिंदा राजपक्षे की सिंहला बहुमत वाली सरकार को एक कड़ा संदेश देने के लिए किया था.

साल 2009 में तमिल टाइगर्स की हार के बावजूद राजपक्षे की सरकार तमिल अल्पसंख्यकों से मेलजोल की प्रक्रिया शुरू करने में नाकाम रही.

स्पष्ट बहुमत

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नए राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना को संघर्ष प्रभावित उत्तरी और पूर्वी इलाके में साफ़ बहुमत मिला.

श्रीलंका ने इस इलाके में 30 साल तक गृह युद्ध की स्थिति का सामना किया है. इस इलाके में मिले वोटों ने सिरिसेना के राष्ट्रपति चुनाव जीतने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

भारत सरकार कहती रही है कि श्रीलंका के संविधान के 13वें संशोधन को लागू किया जाए. ये संशोधन राजीव-जयवर्धने समझौते पर आधारित हैं और इसमें प्रांतों को और अधिकार दिए जाने की बात है.

मोदी ने श्रीलंका यात्रा के दौरान 'सहकारी संघ' की बात पर जोर दिया है.

तमिलों से मोदी की अपील

भारत के किसी प्रधानमंत्री ने पहली बार संघर्ष प्रभावित जाफ़ना का दौरा किया. उन्होंने तमिल नेतृत्व से कोलंबो की नई सरकार को थोड़ा वक्त देने की अपील की ताकि वह अल्पसंख्यक समुदाय को स्वीकार्य किसी राजनीतिक समाधान तक पहुंचने का रास्ता निकाल सकें.

दूसरी अोर, बहुमत सिंहला समुदाय 13वें संविधान संशोधन को भारत की ओर से थोपा गया मानता है.

कट्टरपंथी सिंहला गुट इसका विरोध करते हैं और वे मौजूदा निज़ाम का हिस्सा भी हैं.

मानवीय आधार

यह देखने वाली बात होगी कि श्रीलंका की सरकार अल्पसंख्यकों के प्रभाव वाले इलाके में सत्ता का हस्तांतरण किस तरह करती है.

भारत और श्रीलंका के बीच विवाद का एक और मुद्दा मछुआरों का है. दोनों देश समझते हैं कि मानवीय आधार पर किसी सहमति तक पहुंचने की फ़ौरी जरूरत है.

अंतरराष्ट्रीय जल सीमा पार करने पर मछुआरों को पकड़ने या फिर उन्हें हिरासत में लेने से दोनों देशों के बीच माहौल अक्सर बिगड़ जाता है.

मछुआरों की मुश्किल

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गृह युद्ध के ख़ात्मे के बाद श्रीलंका के उत्तरी इलाके में रहने वाले तमिलों को अपनी ज़िंदगी नए सिरे से शुरू करने का मौका मिला है.

लेकिन जीवन यापन के मामूली विकल्पों ने उनके सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं.

श्रीलंका के तमिल मछुआरों का कहना है कि भारतीय मछुआरों के मशीन से चलने वाली बड़ी नावों ने उनके जीवन यापन के साधनों पर बुरा असर डाला है.

दूसरी अोर, समाज के निचले पायदान पर रहने वले भारतीय मछुआरों के लिए भी यह आजीविका का मुद्दा है.

सकारात्मक कदम

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प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि दोनों देशों के मछली उत्पादकों के संगठनों को शामिल करके किसी समझौते तक पहुंचने की जरूरत है, एक सकारात्मक कदम है. इस पर आगे बढ़ा जाना चाहिए.

मोदी के श्रीलंका दौरे का एक और महत्वपूर्ण पहलू समुद्री सुरक्षा और महासागर के संसाधनों पर आधारित अर्थव्यवस्था के विकास पर सहयोग करना भी है.

18वें सार्क शिखर सम्मेलन में तय किया गया था कि समंदर के संसाधनों पर आधारित अर्थव्यवस्था विकसित की जाए. भारत यह लक्ष्य पड़ोसियों की मदद के बग़ैर हासिल नहीं कर सकता.

हिंद महासागर

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हाल में जारी किए गए त्रिपक्षीय समुद्री सुरक्षा सहयोग में श्रीलंका और मालदीव की अहम भूमिका है.

हिंद महासागर में क्षेत्रीय ताक़तों की मौजूदगी भारत के लिए चिंता का कारण रहा है. भारत को उम्मीद है कि उसके पड़ोसी देश उसकी सुरक्षा चिंताओं को समझेंगे.

राष्ट्रपति सिरिसेना ने भारत दौरे के समय इस सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि श्रीलंका की नीति भारत विरोधी नहीं होगी.

इसी तरह, श्रीलंका सरकार भारत से उम्मीद करता है कि युद्ध अपराधों से जुड़े मामलों में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वह उसकी मदद करे.

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