'माहवारी सामान्य बात है, पर बलात्कार नहीं...

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भारत हो या कोई और देश, माहवारी में इस्तेमाल होने वाले सैनिट्री पैड को लेकर अकसर अजीब सी हिचक और लगभग शर्मिंदगी भरा एहसास रहता है.

लेकिन दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया के कुछ छात्र-छात्राएँ इन्हीं सैनिट्री पैड्स का इस्तेमाल अनोखे ढंग से कर रहे हैं.

यूनिवर्सिटी में पिछले कुछ दिनों से पेड़ों के इर्द-गिर्द, दीवारों पर आपको सैनिट्री पैड मिल जाएँगे और इन पर महिलाओं के मुद्दों से जुड़े संदेश लिखे रहते हैं.

मसलन- 'माहवारी का रक्तस्राव गंदा नहीं होता बल्कि आपकी सोच गंदी है'

'दिल्ली की सड़कों पर महिलाओं का भी हक़ है'

'माहवारी होना सामान्य बात है, पर बलात्कार नहीं' या 'कन्या कुमारी, गंदी सोच तुम्हारी'

असहज कर देने वाला एहसास

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दरअसल छात्र-छात्राओं ने महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर जागरुकता लाने के लिए #padsagainstsexism नाम का अभियान शुरु किया है. इसमें बलात्कार और माहवारी जैसे महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे हैं.

ये लोग कैंपस में तो जगह-जगह सैनिट्री पैड पर संदेश छोड़ ही रहे हैं बल्कि सड़कों, बस स्टॉप्स पर आम लोगों के बीच जाकर भी ऐसा ही कर रहे हैं. पर ये लोग अभी बेनाम ही रहना चाहते हैं.

सैनिट्री पैड के इस्तेमाल के इस तरीके का कुछ लोग दिल खोलकर समर्थन कर रहे हैं तो कई लोगों के लिए ये असहज कर देने वाला अनुभव है.

यूनिवर्सिटी के छात्रों ने बतौर टेस्ट दिल्ली में एक जगह पैड को लोगों के बीच रखा. इस मुहिम से जुड़ा एक शख़्स लोगों की प्रतिक्रिया बताता है, "हमने देखा कि लोगों ने पैड को देखकर नज़रें चुरा लीं. लड़के भी और लड़कियाँ भी. थोड़ी देर बाद गार्ड ने पैड को हटा दिया."

वहीं आश्चर्यजनक रूप से कई लोगों, ख़ासकर पुरुषों ने बिना झिझक इसका समर्थन किया और पैड के साथ फोटो भी खिंचवाई.

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जब ट्विटर और इंस्टाग्राम पर दिल्ली की ये तस्वीरें डालीं गईं तो प्रतिक्रियाएँ कुछ इस तरह थी- "कोई नहीं देखना चाहता कि पैड कैसे दिखते हैं. मैं समझ सकती हूँ कि आप क्या कहना चाहते हैं. लेकिन सैनिट्री पैड पर संदेश लिखना अजीब है."

delhiexplorer नाम से इंस्टाग्राम पर किसी ने लिखा है, "आपकी ये पहल हमारे समाज की सोच बदलने में ज़रूर मददगार साबित होगी".

जबकि @van_lassen हैंडल से ट्विटर पर किसी ने अपनी बात कुछ यूँ लिखी है- फ़ेमिनिस्ट अभियान के साथ तब ज़रूर कुछ ग़लत नज़र आता है जब वे पुरुषों के रवैए को बलात्कार और माहवारी से जोड़ने लगते हैं.

जर्मन लड़की ने की शुरुआत

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ये अभियान भले ही दिल्ली में चल रहा है लेकिन इसे शुरु करने का श्रेय जर्मनी की 19 वर्षीय इलोना को जाता है. दिल्ली के छात्रों ने इलोना से प्रेरणा लेकर ही अपना अभियान शुरु किया है.

इलोना महिला मुद्दों को लेकर काफ़ी सजग हैं. एक दिन उन्होंने खिड़की पर रखा पैड देखा और उनके दिमाग़ में ख़्याल आया कि क्यों न इसका इस्तेमाल संदेश देने के लिए किया जाए.

तब से उन्होंने ये सामाजिक प्रयोग करना शुरू किया और अपने इंस्टाग्राम पर फ़ोटो डालने लगीं. उन्हें हर तरह की टिप्पणियों का सामना करना पड़ा लेकिन इलोना को इससे झुँझलाहट नहीं होती.

बीबीसी से बातचीत में इलोना ने कहा, "मेरा मक़सद है समाज में महिलाओं के प्रति सेक्सिज़म को लेकर लोगों का ध्यान खींचना. मेरे इस अभियान की कोई तारीफ़ करे या आलोचना, आख़िरकार इस मुद्दे की चर्चा तो हो रही है."

विरोध के साथ समर्थन भी

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इलोना का अभियान इंस्टाग्राम पर देखकर दूसरे देश के लोगों ने भी ऐसी ही पहल की इच्छा जताई है. कैलिफ़ोर्निया से नीना तो कनाडा से ब्रैंडा ने उन्हें लिखा कि वे भी अपने शहर में ऐसा ही करने वाली हैं.

इलोना कहती हैं कि भारत में महिलाओं की स्थिति को लेकर जो सवाल हैं, वो उनसे वाकिफ हैं और उन्हें ख़ुशी है कि भारत में सबसे पहले एक लड़के ने उनसे संपर्क कर सैनिट्री पैड अभियान शुरू करने की पहल की थी.

दिल्ली में छात्रों का अभियान जारी है हालांकि ये उनके लिए इतना आसान नहीं है.

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ऐसे देश में जहाँ सैनिट्री पैड ख़रीदने पर आज भी उसे काले रंग की पॉलीथिन की कई परतों में लपेटकर, चोर नज़रों से आपको थमाया जाता है, वहाँ खुलेआम इसका इस्तेमाल 'फ़ेमिनिस्ट' संदेश देने के लिए किया जा रहा है.

विरोध का ये तरीक़ा अनोखा ज़रूर है पर कुछ लोगों के लिए दुविधा में डालने वाला भी है.

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इलोना का काम देखकर इंटरनेट पर कनाडा की मिशेल ने कई सवाल पूछे हैं. जैसे "लोग पूछ रहे हैं कि क्या इलोना का काम सही है? क्या लोग ख़ुद सेक्सिस्ट हैं? ये पैड शायद किसी ज़रूरतमंद के काम आ सकते थे लेकिन इनका इस्तेमाल संदेश देने के लिए हो रहा है."

ये तरीका इसी तरह के कई सवाल उठाता है और कई सवाल अपने पीछे छोड़ भी रहा है.

पर्दे के पीछे से काम कर रहा दिल्ली के छात्र-छात्राओं का ये गुट इन्हीं सवालों और इस पर हो रही बहस को अपनी जीत मानता है.

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