ये हैं आपदाओं से बचाने वाले देवता

तमिलनाडु के अय्यनार के देवताओं, टेराकोटा मूर्तियों की निर्माण प्रक्रिया और कुम्हारों के जीवन पर केंद्रित फ़ोटोग्राफ़र जूली वेन की फ़ोटोग्राफ़ी. इमेज कॉपीरइट Other

इन दिनों दिल्ली के 'आनन्दग्राम' के संस्कृति केंद्र में फ़ोटोग्राफ़र जूली वेन की फ़ोटोग्राफ़ी प्रदर्शनी चल रही है.

'फ़्रॉम अर्थ टू अर्थ' के नाम से आयोजित यह प्रदर्शनी तमिलनाडु के अय्यनार के देवताओं, टेराकोटा मूर्तियों की निर्माण प्रक्रिया और कुम्हारों के जीवन पर केंद्रित है.

जूली ने 10 साल तक तमिलनाडु के अय्यनार में रहने वाले कुम्हार परिवारों के शिल्प और जीवन से जुड़े अहम पहलुओं को बारीकी से समझा.

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इन शिल्पियों को स्थानीय भाषा में वेडार कहा जाता है. जूली ने वहां के सत्तर से अधिक धार्मिक स्थलों का सर्वेक्षण कर इनके दस्तावेज़ तैयार किए है, पचास से अधिक स्थानीय समारोहों में हिस्सा लिया है और अनगिनत घंटे इन कुम्हारों की शिल्प कला को रिकॉर्ड करने में लगाए.

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भारत में ग्राम्य देवी देवताओं को पूजने की परम्परा नई नहीं है.

भारत में लगभग पूरे देश में ग्राम्य और वन देवी देवताओं को पूजे जाने की परंपरा रही है.

यह मान्यता रही है कि ये देवी देवता बाहरी विपत्तियों और आपदाओं से गांव की रक्षा करते हैं.

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किवदंती है कि तमिलनाडु के गाँवों के बाहर एक ऐसे ही देवता पहरा दे रहे होते हैं जिन्हें 'अय्यनार' के नाम से जाना जाता है.

अय्यनार को एक तमिल देवता माना जाता है, जिन्हें तमिलनाडु और श्रीलंका के तमिल बहुल गांवों में पूजा जाता है.

वेन के अनुसार 'अय्यनार' में रहने वाले कुम्हार पीढ़ी दर पीढ़ी टेराकोटा का काम करते आ रहे हैं. लेकिन आज ये कला विलुप्त होने की कगार पर है.

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अब कुम्हार अपने बच्चों को इस काम में नहीं लाना चाहते. ये चिंता का विषय है.

यहां रहनेवाले कुम्हार अय्यनार के धार्मिक स्थलों, खासतौर पर त्योहारों में मूर्तियां और अनुष्ठान के लिए प्रतिमाएँ बनाते आ रहे हैं.

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लेकिन आने वाले समय में यह परंपरा शायद ही देखने को मिले.

वेन ने अपनी चित्र प्रदर्शनी में कुम्हार, त्योहार और अनुष्ठान की परंपरा पर प्रकाश डाला है.

गर्मियों की शुरुआत में मंदिर के पुजारी और गाँव के बुजुर्ग अय्यनार और अन्य देवताओं के सम्मान में होने वाले मेले की तारीख तय करने के लिए जमा होते हैं.

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तारीख तय होने के बाद पारम्परिक कुम्हार परिवार को मूर्तियां बनाने का निर्देश दिया जाता है.

घोड़ों के मूल आकार की टेराकोटा की प्रतिमा बनाने के लिए उसे आकार देकर भट्टी में पकाया जाता है. उसके बाद उसे रंगा जाता है.

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ये घोड़े लोक अय्यनार के चढ़ावे के तौर पर हर साल हजारों की संख्या में तैयार किए जाते हैं.

स्थानीय लोग अपनी मान्यता पूरी होने पर इन्हें अय्यनार को अर्पित करते हैं.

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इनमें घोड़ों के अलावा गाय, हाथी, कुत्ता, साँप और इंसानों की छोटी मूर्तियाँ भी होती हैं. इन्हें भक्तों की तरफ से अर्पित किया जाता है.

सारे धार्मिक अनुष्ठानों के संपन्न होने के बाद सभी मूर्तियों को मंदिर के बाहर रख दिया जाता है.

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इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, 'कान थोरिकल' जिसका अर्थ आँखें खोलना है.

कान थोरिकल मुख्य कुम्हार के द्वारा निभाया जाता है. वे मुर्गे के खून की कुछ बूँदें अर्पित की जाने वाली मुख्य मूर्ति की आँख में डालते हैं.

इस प्रकार मूर्ति को मंदिर में प्रवेश के योग्य मान लिया जाता है. और तब ही ईश्वर के साथ रखा जा सकता है.

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