'गांधी कथा' के लिए मशहूर थे 'बापू के बबलू'

नारायण देसाई इमेज कॉपीरइट PHOTODIVISION

लेखक, गांधी कथा वाचक और गुजरात विद्यापीठ के पूर्व चांसलर नारायण देसाई का पंद्रह मार्च को देहांत हो गया.

नारायण देसाई का वास्ता सीधे महात्मा गांधी के जीवन से था और उन्होंने अपने जीवन के पहले 22 साल महात्मा गांधी के साथ गुज़ारे थे.

गांधी उन्हें 'बबलू' कह कर पुकारते थे जिसका मतलब छोेटे लड़के से था.

उनके पिता महादेव देसाई गांधी के भरोसेमंद लोगों में से थे और गांधी जी के सचिव भी थे.

महादेव देसाई को दुनिया उस शख्स के तौर पर जानती है जिन्होंने महात्मा गांधी की जीवनी का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया था.

हिंदुओं, मुसलमानों को क़रीब लाए

इमेज कॉपीरइट Getty

आज की तारीख में गांधी होते तो वे अपने आसपास धर्मांधता से लेकर बढ़ती हिंसा समेत कई चीज़ों को चुनौती देते.

गांधी को आज के दौर में प्रासंगिक बनाने की ज़रूरत को जितना नारायण देसाई समझते थे, उतना भारत या दुनिया में जीवित गांधीवादियों में शायद ही कोई और समझता होगा.

जीवन के आखिरी दशक में वे दुनिया भर में सैकड़ों जगहों पर 'गांधी कथा' का वाचन करते रहे.

उनकी जन्मभूमि गुजरात में बीते समय में हिंसा की घटनाएं हुईं जिनमें हज़ारों निर्दोष और गरीब मुसलमान मारे गए.

गुजराती में गांधी की जीवनी

इमेज कॉपीरइट Gandhi Film Foundation

गांधी कथा के जरिए नारायण देसाई की कोशिश थी कि दोनों समुदायों को क़रीब लाया जाए. वे ख़ासकर युवा पीढ़ी को गांधी के जीवन के बारे में बताना चाहते थे.

नारायण देसाई एक सफल लेखक भी थे. उन्होंने गांधी की जीवनी गुजराती भाषा में चार खंडों में लिखी है.

दक्षिणी गुजरात के 'वेदछी' में उन्होंने एक आश्रम बनाया था, जहां वे रहते भी थे. वेदछी एक जनजाति बहुल इलाका है जहां देसाई इनके उत्थान के लिए काम करते थे.

'सचमुच गांधी को देखा है?'

इमेज कॉपीरइट RAVJI SONDERVA

गांधी की जो जीवनी नारायण देसाई ने लिखी थी, उसमें महात्मा के व्यक्तित्व को महिमा मंडित करने की कोशिश की गई थी.

नारायण देसाई कहते थे कि गांधी की मातृभाषा गुजराती में उनकी एक भी संपूर्ण जीवनी नहीं है, इसलिए उन्होंने इस काम का बीड़ा उठाया था.

देसाई की लिखी गांधी की जीवनी का प्रकाशन 'नवजीवन पब्लिशिंग हाउस' ने किया. इस प्रकाशन की स्थापना गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान की थी.

इसी प्रेस के पास गांधी की जीवनी और उनके तमाम कामों का कॉपीराइट भी हैं. देसाई ने गांधी की जीवनी लिखने के कुछ और भी कारण बताए थे.

इसराइल के एक स्कूल में पढ़ रही एक अरबी लड़की ने उनके पास जाकर पूछा था, "क्या आपने सचमुच गांधी को देखा था? उनके बारे में कुछ बताएं."

इमेज कॉपीरइट AP

न्यूजर्सी के एक स्कूल में एक लड़के ने अपने होमवर्क में लिखा, "गांधी, आप बहुत जल्दी पैदा हो गए और बहुत जल्दी चले भी गए. आज हमें आपकी बेहद जरूरत है."

नारायण देसाई किताब की प्रस्तावना में ही लिखते हैं कि गांधी का जीवन महान था और उसमें एक बड़ी नाकामी भी थी.

वे ये भी कहते थे कि सत्याग्रह कोई जरिया नहीं है बल्कि एक जीवन जीने की शैली है. चार खंडों में आई इस जीवनी का शीर्षक है 'माई लाइफ़ इज़ माई लैंग्वेज.'

देसाई ने इसके लिए गांधी की लिखी रचनाओं से संबंधित सैकड़ों किताबें, 'दी डायरी ऑफ़ महादेव देसाई' की अब तक प्रकाशित हुए 23 खंडों को खंगाला था.

गांधी की जीवनी

इमेज कॉपीरइट Getty

उन्होंने गांधी के दूसरे सचिव प्यारेलाल और उनकी पत्नी सुशीला से जुड़ी 11 किताबें और हिंदी, अंग्रेजी, मराठी और बंगाली में प्रकाशित हुईं गांधी की 11 जीवनियों का भी शोध किया था.

यहां इस बात का जिक्र किया जा सकता है कि गांधी की पहली जीवनी एक अंग्रेज रेव जोसेफ जे डोक ने लिखी थी. जीवनी का शीर्षक था, 'एमके गांधी, दी इंडियन पैट्रियोट इन साउथ अफ्रीका.'

भारत में और गांधीवादियों में नारायण देसाई का नाम बहुत आदर के साथ लिया जाता है. उनका मूल्यांकन उनके कार्यों से भी किया जा सकता है.

गणतंत्र की यात्रा

इमेज कॉपीरइट

भारत के आज के राजनेताओं के मुकाबले उनका व्यक्तित्व कहीं अधिक विशाल था.

ऐसे वक्त में जब भारत में आए दिन धार्मिक स्थलों में हिंसा की घटनाएं हो रही हैं, गांधी और नारायण देसाई भविष्य की ओर बढ़ रहे गणतंत्र की यात्रा के लिए कहीं अधिक प्रासंगिक हैं.

गांधी की मृत्यु के बाद नारायण देसाई ने विनोबा भावे के साथ भी काम किया. आपातकाल के दौरान वे जयप्रकाश नारायण से भी जुड़े रहे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार