भारत में आरक्षण से जुड़े 5 ख़ास सवाल

  • 18 मार्च 2015
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फ़ैसला देते हुए जाट समुदाय को दिए गए आरक्षण को रद्द कर दिया.

पिछली यूपीए सरकार ने भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद की विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर जाटों को आरक्षण देने का फ़ैसला किया था.

अदालत ने इसे ग़लत ठहराते हुए कहा है कि तत्कालीन सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग की रिपोर्ट को नजरअंदाज़ किया. कोर्ट का कहना था कि ज़ाति आरक्षण देेने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन पिछड़ापन निर्धारित करने के लिए यह अकेले पर्याप्त नहीं है.

सीनियर वकील सूरत सिंह ने अदालत के फ़ैसले पर और आरक्षण के मुद्दे पर कुछ अहम सवालों को जवाब दिए.

आरक्षण का आधार

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है.

बशर्ते, ये सिद्ध किया जा सके कि वे औरों के मुकाबले सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं.

क्योंकि अतीत में उनके साथ अन्याय हुआ है, ये मानते हुए उसकी क्षतिपूर्ति के तौर पर, आरक्षण दिया जा सकता है.

साथ ही अगर समाज का एक हिस्सा कम तरक़्की करता है - जिसके ऐतिहासिक कारण हैं, तो इसका असर न सिर्फ़ देश की प्रगति बल्कि लंबे समय में समाज पर भी पड़ेगा.

आरक्षण देने का तरीक़ा

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इसका तरीक़ा ये होता है कि राज्य अपने यहां एक पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करे. जिसका काम राज्य के अलग अलग तबक़ों की सामाजिक स्थिति का ब्यौरा रखना है. ओबीसी कमीशन इसी आधार पर अपनी सिफारिशें देता है.

अगर मामला पूरे देश का है तो राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग अपनी सिफारिशें करें. इस मामले में ऐसा नहीं हुआ था.

1993 के मंडल कमीशन केस में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने बताया था कि किस-किस आधार पर भारतीय संविधान के तहत आरक्षण दिया जा सकता है.

बाला जी मामले का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जाति अपने आप में कोई आधार नहीं बन सकती. उसमें दिखाना पड़ेगा कि पूरी जाति ही शैक्षणिक और सामाजिक रूप से बाक़ियों से पिछड़ी है.

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हम नहीं समझते कि जाट अन्य लोगों से पिछड़े हैं.

आरक्षण में फर्क क्यों

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ऐसा देखा गया है कि किसी समुदाय को किसी राज्य में आरक्षण है तो किसी अन्य राज्य या केंद्र में नहीं.

मंडल कमीशन केस में सुप्रीम कोर्ट ने ये साफ कर दिया था कि अलग अलग राज्यों में अलग अलग स्थिति हो सकती है.

मान लें कि किसी पहाड़ी इलाके में मूलभूत सुविधाओं की कमी है तो ये हो सकता है कि वहां पहाड़ियों के लिए 70 फीसदी तक आरक्षण का प्रावधान कर दिया जाए. लेकिन इसे वाजिब ठहराना होगा.

इसके पीछे तार्किक आंकड़ें होने चाहिए. राजस्थान के मामले में हाई कोर्ट ने गुर्जरों के लिए आरक्षण की मांग के मामले में तार्किक आंकड़ें लाने के लिए कहा था, जिसके लिए एक आयोग भी बना था.

आरक्षण की अधिकतम सीमा

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1963 में बाला जी मामले के फ़ैसले को दोहराते हुए इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आम तौर पर 50 फ़ीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं हो सकता क्योंकि एक तरफ हमें मेरिट का ख़्यालल रखना होगा तो दूसरी तरफ हमें सामाजिक न्याय को भी ध्यान में रखना होगा.

लेकिन इसी मामले में जस्टिस जीवन रेड्डी ने ये साफ़ तौर पर कहा है कि विशेष परिस्थिति में स्पष्ट कारण दिखाकर सरकार 50 फ़ीसदी की सीमा रेखा को भी लांघ सकती है.

हालांकि सामान्य तौर पर 50 फ़ीसदी का नियम है कि इससे ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए.

क्या ये अंतिम फैसला है

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ये दो जजों की पीठ का फैसला है. इससे अगर कोई संतुष्ट नहीं है तो इसे पांच जजों की पीठ के सामने चुनौती दी जा सकती है.

चूंकि फ़ैसले में नौ जजों की पीठ वाले मंडल कमीशन केस का जिक्र किया गया है तो मुमकिन है कि सरकार इसे बड़ी पीठ के सामने ले जाए.

यह एक महत्वपूर्ण मामला है. मंडल कमीशन के फ़ैसले को आए 20 साल हो चुके हैं और क़ानून में भी चीज़ों को देखने का तरीक़ा बदलता रहता है.

(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से वरिष्ठ अधिवक्ता सूरत सिंह की बातचीत पर आधारित)

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