क्या लैंड बिल विचारधाराओं की लड़ाई है?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में कहा कि भूमि अधिग्रहण संशोधन क़ानून न तो किसान विरोधी है और न ही ग़रीब विरोधी.

विपक्ष की ओर से इसके विरोध पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि किसानों को गुमराह करने की ये विपक्ष की एक साज़िश है.

बिल पर विवाद केवल सरकार और विपक्ष तक सीमित नहीं है बल्कि लगता है कि इसने भारतीय समाज को ही दो खेमों में विभाजित कर दिया है.

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इसका विरोध करने वालों का तर्क उतना ही दमदार है जितना इसके पक्ष में बोलने वालों का.

इन विपरीत विचारों को भारत के बदलते समाज और लोगों की बदलती आकांक्षाओं के संदर्भ परिपेक्ष्य में देखना ज़रूरी है.

1991 में शुरू की गई आर्थिक उदारीकरण की नीति ने दशकों से चले आ रहे गतिहीन समाज में उथल पुथल पैदा कर दी.

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Image caption 'मन की बात' महीने में एक बार प्रसारित होता है.

अब समाज में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो आर्थिक उदारीकरण के पहले वाली जीवन शैली से वाक़िफ़ भी नहीं है.

समाज का ये तबक़ा भारत को औद्योगीकरण और कॉर्पोरेट माहौल की तरफ खींच रहा है जबकि दूसरे तबक़े के लिए ये एक अज्ञात क्षेत्र है जहाँ वे जाने के लिए तैयार नहीं.

किसानों की ज़मीन

ज़मीन और खेती से जुड़े इस विधेयक ने समाज के इन दोनों तबक़ों और इन दोनों विचारों को एकदूसरे के आमने-सामने खड़ा कर दिया है.

दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि ये कृषि की दुनिया और औद्यौगिक विश्व के बीच एक निर्णायक लड़ाई है.

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ये विधेयक 2013 में यूपीए सरकार द्वारा बनाए गए क़ानून में बदलाव करके लाया गया है.

ज़्यादातर किसान इसे कृषि विरोधी मानते हैं क्योंकि उन्हें डर है कि उनके साथ इंसाफ़ नहीं होगा.

आज़ाद भारत का इतिहास इस बात का गवाह है कि किसानों की ज़मीन जब भी ली गईं हैं, उन्हें मुआवज़ा बहुत कम मिला है.

नुक़सानदेह पेशा

और भूमिहीन किसानों को नौकरियां मिलना तो दूर उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया और वे मजबूरी की हालत में शहरों में जाकर झोपड़ पट्टियों में ग़ुरबत की ज़िंदगी बसर करने पर मजबूर हो गए.

इस विधेयक के पक्ष में खड़े लोगों का तर्क है कि अब खेती आमतौर से एक नुक़सानदेह पेशा बन कर रह गई है.

एक किसान अब अपनी ज़मीन को मौजूदा क़ीमत में बेच कर खेती छोड़ दूसरे पेशे में आ सकता है. लेकिन ये विकल्प फिलहाल उसके पास नहीं है.

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विधेयक के समर्थक कहते हैं कि उन्हें इस बात पर आपत्ति है कि कृषि पर 50 प्रतिशत से अधिक लोग क्यों निर्भर करते हैं जबकि सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान अब घटकर लगभग 15 प्रतिशत हो गया है.

मतभेद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी भारतीय जनता पार्टी में भी इसे लेकर मतभेद है.

मोदी के लिए बाहर के विरोध को ख़त्म करने की चुनौती तो है ही, साथ ही बिल के प्रति आंतरिक विरोध को भी समाप्त करना उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए.

उनकी जीत के मायने शायद ये होंगे कि जीत समाज के उस तबक़े की होगी जो 1991 से पहले वाले समाज से वाक़िफ़ नहीं.

और शायद ये कृषि जगत के लिए एक बुरी ख़बर होगी.

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