वापस ली जा रही है दान दी गई ज़मीन

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भूदान आंदोलन के दौरान 1950 और 1960 के दशक में लगभग साढ़े छह लाख एकड़ ज़मीन बिहार में दान दी गई थी.

स्वतंत्रता सेनानी और वरिष्ठ गांधीवादी आचार्य विनोबा भावे की अगुवाई में 1951 में यह आंदोलन शुरु हुआ था.

इस आंदोलन से मिली ज़मीन के बड़े हिस्से पर कानूनी रुप से बिहार में साढ़े तीन लाख से अधिक परिवारों को बसाया भी गया.

लेकिन अब दान दाता या उनके परिवारों के ज़मीन वापस बेचे जाने, उन पर हक़ जताने या फिर लाभान्वित परिवारों के दान में मिली ज़मीन बेचने के कई मामले सामने आते रहते हैं.

पढ़ें विस्तार से

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लगभग दो दशक पहले 1996 में भारत की आज़ादी का दिन अररिया के बिंदेश्वर मेहतर के लिए बहुत खास तोहफ़ा लेकर आया था.

उस दिन बिंदेश्वर और उन जैसे 86 दलित परिवारों के बीच भूदान के तहत मिली ज़मीन बांटी गई थी. हर परिवार को क़रीब 1740 वर्गफ़ुट ज़मीन के काग़ज और 700 रुपये मिले थे.

उस दिन को याद करते हुए लगभग 50 साल के बिंदेश्वर का चेहरा आज भी चमक उठाता है.

वे कहते हैं, "गरीबी के कारण हम ज़मीन नहीं ख़रीद सकते थे. ज़मीन मिलने से हमें रहने के लिए जगह मिल गई."

मकान भी मिला

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बिंदेश्वर का परिवार उन 24 परिवारों में शामिल था जिन्हें एक साल बाद सरकार ने छोटा पक्का मकान भी बना कर दिया.

अपने घर के पास स्थित कॉलेज में अस्थाई सफ़ाई कर्मचारी के रुप में काम करने वाले बिंदेश्वर का मकान तो आज भी सही-सलामत है लेकिन कुछ मकान तोड़े जा चुके हैं.

और एक बार फिर से बिंदेश्वर और अररिया के जयप्रकाश नगर इलाके में बसे दूसरे अन्य परिवारों पर भूमिहीन होने का खतरा मंडरा रहा है.

दान की ज़मीन बेची

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दरअसल इन परिवारों को 1981 में भूदान की गई पांच एकड़ ज़मीन पर बसाया गया था.

लेकिन 2012 में दानदाता ने पांच में से साढ़े तीन एकड़ ज़मीन वापस पाने के लिए भूमि सुधार उप समाहर्ता यानी डीसीएलआर कोर्ट में मुकदमा दायर किया और जीत भी गए.

और फिर जिन्हें ये ज़मीन दानदाता ने बेची वे अब समय-समय पर जयप्रकाश नगर में बसे परिवारों को हटाने की कोशिशें करते रहते हैं. ज़मीन के 'नए मालिकों' ने कई घरों को गिरा दिया है.

फ़िलहाल एक स्थानीय संगठन की पहल पर प्रभावित परिवारों के आवेदन के बाद यहां धारा 144 लगी हुई है.

मामले और भी हैं

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बिहार में भूदान की ज़मीनों से संबंधित अररिया जैसे या इससे मिलते-जुलते मामले कई ज़िलों में चल रहे हैं.

ऐसे लगभग दो हजार मामले हाईकोर्ट और बिहार भूमि न्यायाधिकरण से लेकर ज़िला न्यायालयों में आज भी लंबित हैं.

भागलपुर के तिलका मांझी इलाके में दान पर यह कहते हुए आपत्ति दर्ज की गई है कि दानकर्ता ने अपनी पत्नी के हिस्से की भी ज़मीन दान में दे दी थी.

पटना ज़िले के विक्रम में बन रहे एक शराब फैक्ट्री के कारण भूदान वाली ज़मीन की कीमत अब आसमान छू रही है और मामला अब अदालत में है.

साथ ही कुछ ऐसे मामले भी सामने आते हैं जिसमें वे किसान ही ज़मीन बेच चुके हैं जिन्हें कभी भूदान की ज़मीन मिली थी. हालांकि कानूनन ऐसा संभव नहीं है.

दावा

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ऐसे हालात पैदा ही क्यूं हुए? इसके जवाब में बिहार भूदान यज्ञ समिति के अध्यक्ष कुमार शुभमूर्ति कहते हैं, "पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे और जो ज़मीन दान की गई उसे सबने स्वीकार किया. लेकिन आज बदले हालात में ऐसे परिवारों की नई पीढ़ी दान को अदालतों में चुनौती दे रही है."

ज़्यादातर माामलों में यह कहते हुए चुनौती दी जाती है कि दान-दाता ने अपने भाई या पत्नी के हिस्से की ज़मीन दान दी थी. वहीं कुछ तो यह दावा भी करते हैं कि उनके माता-पिता की मानसिक हालत ठीक नहीं थी इस कारण उन्होंने भूदान किया.

वहीं लाभान्वित परिवारों के ज़मीन बेचे जाने के मामले में शुभमूर्ति का मानना है कि भूदान किसान ऐसा करने के लिए दोषी तो हैं लेकिन वे ज़्यादातर मामलों में मजबूरी में ही ऐसा करते हैं.

कारण और योगदान

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शुभमूर्ति बिहार में ज़मीन संबंधी आंकड़ों का बहुत ही ज्यादा अव्यवस्थित होना इसका सबसे बड़ा कारण मानते हैं.

वहीं जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी के मुताबिक ऐसे मामले आज ज़्यादा इस कारण सामने आ रहे हैं क्योंकि सरकार ज़मीन विवादों को निपटाने को लेकर सक्रिय नहीं है.

लेकिन साथ ही प्रियदर्शी यह भी मानते हैं कि बिहार में भूमि पुनर्वितरण में भूदान आंदोलन ने बड़ी भूमिका निभाई है.

वे बताते हैं, "ज़मीन लोगों के बीच बंटे और वे इस पर खेती करने लगे. इसमें भूदान यज्ञ समिति का बहुत बड़ा योगदान है."

आगे की राह

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भूदान यज्ञ समिति के पास अब भी डेढ़ लाख एकड़ से अधिक ज़मीन बांटने के लिए है. लेकिन समिति के सामने चुनौती दोहरी है.

पहली यह कि जिन्हें वह ज़मीन बांट चुकी है उनको ज़मीन से बेदखल होने से कैसे बचाया जाए. दूसरी, जो ज़मीन उपलब्ध है उसको सही लोगों के बीच कैसे बांटा जाए.

शुभमूर्ति के अनुसार अगर भूदान ज़मीन से संबंधित कानून को सही तरीके से ज़मीन पर उतारा जाए तो सभी समस्याएं दूर हो जाएंगी.

मगर इस रास्ते के बाधाओं के बारे में वे कहते हैं, "कानून को ज़मीन पर उतारने के लिए जितने साधन और कार्यबल चाहिए, उसकी भारी कमी है."

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