हाशिमपुरा नरसंहारः फ़ैसले से जुड़ी 10 बातें

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उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले के हाशिमपुरा में 22 मई 1987 को हुए नरसंहार में 42 लोग मारे गए थे.

रमज़ान के दौरान हुए इस नरसंहार के 28 साल बाद कोर्ट का फ़ैसला आया लेकिन ये नहीं पता चला कि उन 42 लोगों को किसने मारा था जबकि घटना की रात ही मामले की एफ़आईआर दर्ज कर ली गई थी.

घटना के दो दिन बाद 24 मई को मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी गई थी. लेकिन मामले की सुनवाई 13 साल बाद गाज़ियाबाद की एक अदालत में साल 2000 में शुरू हुई.

'सरकारी एजेंसी ने ली जान'

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मामले को 2002 में दिल्ली की एक कोर्ट में ट्रांसफ़र कर दिया गया. चार साल बाद 2006 में आरोप तय हुए. अभियोजन पक्ष की ओर से 91 लोगों की गवाही हुई.

आरोप तय होने के नौ साल बाद अपने फ़ैसले में एडिशनल सेशन जज संजय जिंदल ने कहा कि यह बहुत तकलीफ़देह है कि कुछ निर्दोष लोगों को इतनी यंत्रणा झेलनी पड़ी और एक सरकारी एजेंसी ने उनकी जानें लीं.

जज ने फ़ैसले में कहा, "लेकिन जांच एजेंसी और अभियोजन पक्ष दोषियों की पहचान को साबित करने लायक सबूत पेश करने में नाकाम रहा. इसलिए मौजूदा परिस्थितियों में सभी 16 अभियुक्तों को उन पर लगाए सभी आरोपों से बरी किया जाता है."

हालांकि मुकदमे की शुरुआत में मामले में 19 अभियुक्त थे जिनमें से तीन की मौत हो गई.

आखिर हुआ क्या था?

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मेरठ शहर के अलग-अलग मोहल्लों के कुछ सौ लोगों को पीएसी और अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने हाशिमपुरा मोहल्ले से हिरासत में लिया था.

उनमें से 40-45 लोगों को पीएसी के कुछ अफसरों ने पीएसी की ही एक ट्रक में अग़वा किया.

यह भी साबित हुआ कि उन्हें गोली मारकर गंग नहर, मुरादनगर और हिंडन नदी, गाज़ियाबाद में फेंक दिया गया. एक लाश बहकर दिल्ली तक आई थी.

लेकिन किसी शक़ और शुबहे से परे ये साबित नहीं हो पाया कि मुक़दमे का सामना कर रहे अभियुक्त ही पीएसी के वे जवान थे जिन्होंने इस नरसंहार को अंजाम दिया था.

फ़ैसले के 10 बिंदु

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1. अभियुक्तों के खिलाफ़ एक भी ऐसा सबूत नहीं था जिससे उनके गुनाह साफ़ तौर पर साबित होते हों. लगभग 42 लोगों के नरसंहार का ये मामला केवल हालात बयान करने वाले सबूतों के आधार पर तय किया जाने वाला मुकदमा बन गया.

2. कई लोग थे जो इस मामले में पीड़ित थे और वाक़ए के चश्मदीद भी और जिन्होंने अभियोजन की तरफ से गवाही दी. सिवाय अभियुक्तों की पहचान के, इस मामले से जुड़े ज्यादातर तथ्य साबित किए गए.

3. अभियुक्तों की भूमिका को साबित कर सकने वाले सबूत नरसंहार के इस मुकदमे से नदारद थे. कोर्ट ने माना कि पुलिस वाले अपने साथियों की गलती पर अक्सर खामोश रहते हैं और कई बार तो वे उन्हें बचाने के लिए सच को गुमराह भी करते हैं.

4. कोर्ट के मुताबिक ये मामला हिरासत में यातना और मौत का था और पेश किए गए सबूतों को इसी मद्देनज़र देखे जाने की ज़रूरत है.

5. ये कोई ऐसा मामला नहीं था जिसमें छोटी सज़ा दी जानी थी. जिन अपराधों के आरोप लगे थे, उनमें सज़ा-ए-मौत या उम्र कैद हो सकती थी.

6. इस बात के कोई सबूत नहीं मिले कि जिन लोगों को अग़वा किया गया वे मुकदमे का सामना कर रहे अभियुक्तों की हिरासत में ही थे.

7. यहां तक कि सबूत के तौर पर जिस ट्रक नंबर 'URU­1493' का जिक्र किया गया था, नरसंहार में उसके इस्तेमाल को भी संदेहों से परे साबित नहीं किया जा सका.

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8. अभियुक्तों को ऐसी जाँच के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता है जिसमें दोषियों की पहचान को साबित करने लायक सबूत न मिले हों.

9. पुलिस की जांच में कई सुराख थे. जो सबूत पेश किए गए, उनके बिनाह पर अभियुक्तों पर लगाए गए आरोप साबित नहीं होते हैं.

10. एक तरह से कहा जा सकता है कि जांच की खामियों ने अभियोजन के मुकदमे को खोखला कर दिया था, कोर्ट उन्हें नज़रअंदाज करके अभियुक्तों पर कोई फैसला कर सकने की स्थिति में नहीं थी.

(लेख हाशिमपुरा मामले पर एडिशनल सेशन जज संजय जिंदल के 21 मार्च 2015 को दिए गए फ़ैसले पर आधारित है.)

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