'बीफ़ के कारोबार का धर्म से नहीं नाता'

बीफ़ का उत्पादन

2014 का आँकड़ा

5.783

करोड़ मीट्रिक टन (दुनिया भर में बीफ़ का उत्पादन)

  • 1.12 करोड़ मीट्रिक टन- अमरीका

  • 69.7 लाख मीट्रिक टन- चीन

  • 22.5 लाख मीट्रिक टन- भारत

BBC

भारत के कुछ राज्यों में हाल ही में 'बीफ़' पर लगाए गए प्रतिबंध के बाद छिड़ी बहस के बीच एक बड़ी सच्चाई ये है कि 'बीफ़' के नाम पर हो रहा व्यवसाय दरअसल गाय का नहीं भैंस के मांस का ही है.

साल 2013-14 में भारत से 26,457.79 करोड़ रुपए के बीफ़ का निर्यात हुआ जबकि भेड़ और बकरी के मांस का निर्यात 694.10 करोड़ रुपए रहा.

भारत पूरे विश्व में भैंस के मांस का सबसे बड़ा निर्यातक है मगर भारत में बीफ़़ की खपत 3.89 प्रतिशत ही है.

जबकि अमरीका, ब्राज़ील, यूरोपीय संघ और चीन में पूरे विश्व का क़रीब 58 प्रतिशत बीफ़ खाया जाता है.

पढ़िए पूरी रिपोर्ट

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भारत में तीन राज्यों को छोड़ कर लगभग सभी जगह गोहत्या पर 1976 से ही प्रतिबंध है. इसके बावजूद कुछ राज्यों में बैल और बछड़े को काटने की इजाज़त रही है.

2012 में हुए पशुओं की गणना के अनुसार भारत में गोवंश की तादाद 1951 में सबसे अधिक 53.04 प्रतिशत थी. साल 2012 में ये घटकर 37.28 प्रतिशत पर आ गई.

तो सवाल ये उठता है कि भारत में जब गोहत्या पर प्रतिबन्ध है तो फिर इनकी जनसंख्या में इतनी कमी क्यों आई?

भारत से बीफ़ का निर्यात करने वाले कारोबारी और 'आल इंडिया मीट एंड लाइवस्टॉक एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन' के महासचिव डीबी सभरवाल इसकी वजह बताते हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा कि प्रतिबंध की वजह से किसान अपनी दूध न देने वाली गायों को बेच नहीं पाते हैं. इसलिए उन्हें पालने या ज़िंदा रखने में उनकी कोई रुचि नहीं.

इसके अलावा अब खेती के मशीनीकरण के बाद जानवरों का इस्तेमाल नहीं के बराबर हो रहा इसलिए जो बछड़े और बैल कसाइयों के ज़रिए किसान के काम आ सकते थे उन्हें जिंदा रखने में किसान को कोई लाभ नहीं.

यही वजह है कि संरक्षण के बावजूद गोवंश की तादाद घट रही है. हालांकि 1951 में जहाँ भैंसों की जनसंख्या सभी जानवरों में से 14.82 प्रतिशत थी वो 2012 में बढ़कर 21.23 प्रतिशत हो गई.

'हर समुदाय के लोग'

Image caption आल इंडिया मीट एंड लाइवस्टॉक एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के महासचिव डीबी सभरवाल.

डीबी सभरवाल के मुताबिक, "भारत में बीफ़ के नाम पर भैंस के मांस का कारोबार ही होता है. 1947 के बाद से भारत में आधिकारिक रूप से गाय नहीं कटती. हाँ, चोरी छुपे गाय की हत्या के मामले कहीं-कहीं पर होते रहे हैं. मगर ये उतने बड़े पैमाने पर नहीं हैं जितना प्रचार हो रहा है."

यही वजह है कि सभरवाल मानते हैं कि प्रतिबंध का असर बीफ़ के कारोबार पर और ख़ास तौर पर उसके निर्यात पर नहीं पड़ेगा क्योंकि भारत से निर्यात होने वाला 'बीफ़' सौ प्रतिशत भैंस का मांस ही है.

उन्होंने स्वीकार किया कि इक्का-दुक्का राज्यों में गोहत्या पर प्रतिबन्ध नहीं लगा है और स्थानीय स्तर पर इसको खाया भी जाता है.

मांस के कारोबार से जुड़े व्यापारी मानते हैं कि इस धंधे में सिर्फ एक ही समुदाय के लोग नहीं हैं. लगभग 28 हज़ार करोड़ रुपए के इस व्यवसाय में मुनाफे के एक बड़े हिस्सेदार ग़ैर-मुसलमान व्यापारी भी हैं.

धर्म से कोई नाता नहीं

अरेबियन एक्सपोर्ट, अतुल सभरवाल की अल कबीर एक्सपोर्ट्स, अजय सूद की अल नूर एक्सपोर्ट, महेश जगदाले एंड कंपनी बीफ़ एक्सपोर्ट से जुड़े इन नामों से ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह व्यसाय किसी एक धर्म से जुड़ा हुआ नहीं है.

भारत में कुल 3600 बूचड़खाने सिर्फ नगरपालिकाओं द्वारा चलाये जाते हैं. इनके अलावा 42 बूचड़खाने 'आल इंडिया मीट एंड लाइवस्टॉक एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन' के द्वारा संचालित किये जाते हैं जहां से सिर्फ निर्यात किया जाता है.

32 ऐसे बूचड़खाने हैं जो भारत सरकार के एक विभाग के अधीन हैं. महाराष्ट्र, पंजाब और उत्तर प्रदेश तीन ऐसे प्रमुख राज्य हैं जहाँ से सबसे ज़्यादा भैंस के मांस का निर्यात होता है. अकेले उत्तर प्रदेश में 317 पंजीकृत बूचड़खाने हैं.

'डर का माहौल'

दिल्ली की सबसे बड़ी ग़ाज़ीपुर की भैंस मंडी के कारोबारी इमरान कुरैशी के मुताबिक भले ही वो सिर्फ भैंस के मांस का कारोबार करते हैं लेकिन कारोबारियों को हमेशा डर के माहौल में ही काम करना पड़ता है.

वो कहते हैं, "कोई भी ब्लैकमेल कर सकता है. कोई भी डरा सकता है. हमारी भैंसों को एनजीओ वाले पकड़ लेते हैं. कई बार झूठे मुक़दमे भी दायर किये जाते हैं. भैंस के मांस का कारोबार करना है तो भी दबकर ही रहना पड़ता है."

ग़ाज़ीपुर स्थित बूचड़खाने में तैनात पशु-चिकित्सक सेंथिल कुमार ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि सरकार की तरफ से काफ़ी मापदंड तय कर दिए गए हैं.

वो कहते हैं, "सिर्फ जानवरों के काटे जाने पर ही सरकार का नियंत्रण नहीं है. सरकार का नियंत्रण तो इसकी बिक्री पर भी है. बूचड़खानों से लेकर खुदरा व्यापारियों तक ऐसा सिस्टम बनाया गया है कि क़ानून की अनदेखी हो ही नहीं सकती है और गोवंश की हत्या का सवाल ही पैदा नहीं होता."

व्यापार

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पूरे विश्व में मांस का कारोबार लगभग 799,051.2 अरब अमरीकी डॉलर का है.

भारत से निर्यात होने वाले मांस और इससे जुड़े कारोबार में मुसलमानों की तुलना में ग़ैर-मुस्लिम कारोबारियों की संख्या भी खासी ज़्यादा है.

मगर आज भी 'बीफ़' के व्यवसाय को सिर्फ एक धर्म के लोगों के साथ ही जोड़कर देखा जाता है.

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