भूमि अधिग्रहण बिल: विकल्प तो हैं पर...

भूमि अधिग्रहण बिल के ख़िलाफ प्रदर्शन करती महिलाएं इमेज कॉपीरइट EPA

भूमि अधिग्रहण संबंधी बिल केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के लिए मुश्किल का सबब बन गया है.

देश में विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने और रोज़गार के नए अवसर पैदा करने के लिए सरकार को यह कानून बहुत ज़रूरी लगता है.

लेकिन राज्यसभा की बाधा पार करने का रास्ता अभी तक वह खोज नहीं पाई है. सरकार के सामने विकल्प तो कई हैं लेकिन कोई सीधा और आसान नहीं है.

इसी सत्र में करे कोशिश

इमेज कॉपीरइट AP

अभी तो फौरी तौर पर भारत सरकार को तय करना है कि अध्यादेश का क्या करे. उसे खत्म हो जाने दे या फिर से जारी करे. मौजूदा अध्यादेश पांच अप्रैल को खत्म हो जाएगा.

संसद का बजट सत्र एक महीने के रिसेस पर है. संविधान के अनुच्छेद 123 के मुताबिक संसद का सत्र चल रहा हो तो अध्यादेश जारी नहीं किया जा सकता.

उसके लिए ज़रूरी है कि दोनों में से कम से कम एक सदन का सत्रावसान किया जाए.

ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा हो. इससे पहले तेरह बार संसद के एक सदन के बीच में सत्रावसान करके अध्यादेश जारी किया जा चुका है.

पर सवाल है कि क्या राष्ट्रपति अध्यादेश फिर से जारी करने के लिए राज़ी होंगे. क्योंकि सरकार को उन्हें बताना पड़ेगा कि अध्यादेश फिर से जारी करने की इमरजेंसी क्या है?

विधेयक लाने का दूसरा तरीका

इमेज कॉपीरइट PTI
Image caption मेक इन इंडिया के विरोध में है स्वदेशी जागरण मंच.

सरकार के सामने दूसरा विकल्प यह है कि अध्यादेश को खत्म होने दे और बजट सत्र के दूसरे भाग में विधेयक पेश करे.

इस मसले पर सरकार घर के अंदर यानी संघ परिवार में सहमति बना चुकी है.

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भारतीय किसान संघ को भी विधेयक के कई प्रावधानों पर एतराज़ था. लेकिन सरकार ने विपक्षी दलों और पार्टी के अंदर चर्चा के बाद विधेयक में नौ संशोधन किए हैं.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption अन्ना हज़ारे भी उतरे प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण बिल के ख़िलाफ

इन संशोधनों के बाद संघ और भारतीय किसान संघ का एतराज़ ख़त्म हो गया है. दोनों ही इस मुद्दे पर अब सरकार के साथ हैं.

संघ और भाजपा नेताओं की उच्च-स्तरीय बैठक में इस बात पर भी सहमति बनी है कि सरकार की नीतियों से मतभेद होने पर उसे सार्वजनिक रूप से उठाने की बजाय मामला घर के अंदर ही सुलझाया जाएगा.

विपक्ष को तोड़े

इमेज कॉपीरइट AP
Image caption कांग्रेस, सपा, तृणमूल कांग्रेस और वाम दलों सहित 10 विपक्षी दलों ने किया इसके ख़िलाफ मार्च

घर के मोर्चे पर शांति स्थापित करने में कामयाबी के बाद मोदी सरकार के रणनीतिकारों की नजर ग़ैर-कांग्रेसी और ग़ैर-वामपंथी दलों पर है.

सरकार चाहती है कि जिस तरह कोयला और ख़दान विधेयक पर वह विपक्षी एकता तोड़ने में कामयाब रही वैसा ही भूमि अधिग्रहण से संबंधित कानून के मामले में भी हो जाए.

इसके लिए सरकार दो तीन मोर्चों पर एक साथ काम कर रही है.

Image caption विधेयक का विरोध करने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक दिन का उपवास रखा

एक तो बातचीत के जरिए विधेयक में कुछ और संशोधन के लिए सरकार ने विकल्प खुला रखा है.

दूसरा क्षेत्रीय दलों को यह समझाने की कोशिश हो रही है कि इस विधेयक का पास होना उनके राज्य के विकास में सहायक होगा.

सरकार यह भी कह रही है कि जो राज्य इसे लागू न करना चाहें वे पुराने कानून के आधार पर ही भूमि अधिग्रहण करने के लिए स्वतंत्र हैं.

Image caption लालू प्रसाद यादव भी मोदी सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरे.

इसके पीछे सरकार की सोच यह है कि देश की जीडीपी में चालीस फ़ीसदी से ज्यादा का योगदान करने वाले राज्यों में भाजपा या उसके सहयोगी दलों की सरकार है.

वेस्टर्न फ्रेट कॉरीडोर जिन सात राज्यों दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र से गुज़रेगा उनमें से पांच में भाजपा का शासन है.

सरकार तर्क दे रही है कि जो विकास न करना चाहे वह दूसरों को विकास से कैसे रोक सकता है.

संयुक्त अधिवेश की राह

इमेज कॉपीरइट EPA
Image caption कांग्रेसी नेता विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेते हुए

सरकार के सामने एक और विकल्प है कि वह संसद के बजट सत्र के दूसरे हिस्से में लोकसभा से पास विधेयक को राज्यसभा में पेश करे.

विपक्ष यदि मांग करता है तो उसे राज्यसभा की प्रवर समिति को भेज दिया जाए उसकी रिपोर्ट बजट सत्र ख़त्म होने से पहले मंगा ली जाए.

इसके बावजूद राज्यसभा में विधेयक गिरता है तो संसद सत्र खत्म होने के बाद दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेश बुलाकर इसे पास करा लिया जाय.

इमेज कॉपीरइट AFP

मोदी सरकार का मेक इन इंडिया का पूरा अभियान भूमि अधिग्रहण पर टिका है. इसके बिना इंडस्ट्रियल कॉरीडोर की पूरी योजना धरी रह जाएगी.

किसानों को दे सकती है सहूलियतें

लेकिन इस बीच सरकार की एक और चिंता है. इस मुद्दे पर उसकी छवि किसान विरोधी बन रही है.

इमेज कॉपीरइट AP

इसे ठीक करने के लिए प्रधानमंत्री ने रेडियो पर मन की बात में इस मुद्दे को उठाया.

इसके अलावा भाजपा और संघ परिवार के दूसरे संगठन सरकार की इस छवि को बदलने के लिए बड़े पैमाने प्रचार अभियान की तैयारी कर रहे हैं.

सरकार इसके लिए किसानों को कई तरह की सहूलियतें देने का ऐलान कर सकती है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार