'जब इंदिरा ने कहा मैं कूड़ा-करकट नहीं पढ़ती'

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शुक्रवार, 8 अगस्त, 1980. सुबह साढ़े आठ बजे. एक पुरानी काली-पीली डीएलवाई टैक्सी प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के निवास 1 सफ़दरजंग रोड की तरफ़ बढ़ रही थी. उसमें सवार एकमात्र शख़्स अपनी आधी अंग्रेज़ी और आधी बंबइया हिंदी में सरदार टैक्सी ड्राइवर को और तेज़ चलाने के लिए कह रहा था. उस शख़्स का नाम था डॉम मोरेस, संडे स्टैन्डर्ड अख़बार के संपादक.

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उनके हाथ में अपनी ताज़ा किताब मिसेज़ गांधी की गिफ़्ट रैप्ड प्रति थी. डॉम ये किताब इंदिरा गांधी को भेंट करने जा रहे थे. मन ही मन वो सोच रहे थे कि 1 सफ़दरजंग रोड पर प्रेस का जमावड़ा होगा...अगले दिन के अख़बारों में उनकी इस किताब की चर्चा होगी...उनकी इंदिरा गाँधी के साथ तस्वीरें छपेंगीं...लेकिन हुआ ठीक इसका उल्टा....

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जब डॉम मोरेस हांपते-कांपते 1 सफ़दरजंग रोड पहुंचे तो वहाँ न तो कोई प्रेस थी और न कोई फ़ोटोग्राफ़र. उन्हें एक कोने में इंतज़ार करने के कह दिया गया. प्रधानमंत्री से उनकी मुलाक़ात का वक्त कब का निकल चुका था. अचानक प्रधानमंत्री के सचिव ने उन्हें सलाह दी कि प्रधानमंत्री अपने दफ़्तर की तरफ़ निकलने वाली हैं. बेहतर होगा कि जब वो अपनी कार में बैठ रही हों, तब आप उनसे मिल लें.

जैसे ही डॉम ने इंदिरा गाँधी को अपनी सफ़ेद एम्बेसडर कार की तरफ़ बढ़ते हुए देखा, वो उनकी तरफ़ बढ़े और उनका अभिवादन किया. इंदिरा गाँधी ने अत्यंत रूखेपन से कहा, 'कहिए.'

'मैं कूड़ा-करकट नहीं पढ़ती'

डॉम बोले, 'मैडम मैं ये किताब आप को भेंट करने आया हूँ.' 'किताब? कैसी किताब? मैं कूड़ा-करकट नहीं पढ़ती. इसको वापस ले जाइए.' ये कहकर इंदिरा गाँधी अपनी कार में बैठ गईं. सब कुछ सेकेंडों में ख़त्म हो गया.

डॉम मोरेस के लिए वो बहुत बड़ा धक्का था. वो वहाँ से सीधे बहादुरशाह ज़फ़र मार्ग पर इंडियन एक्सप्रेस के संपादक अरुण शौरी के दफ़्तर पहुंचे और वहाँ जाने-माने प्रकाशक अशोक चोपड़ा के सामने, उन्हें ये पूरा किस्सा सुनाया.

अरुण ने कहा कि अब जब इंदिरा गाँधी ने ये किताब लेने से इंकार कर दिया है, आप इसे मुझे क्यों नहीं भेंट कर देते? डॉम ने वही किया. जब अरुण ने वो किताब खोली तो उसके पहले पन्ने पर लिखा था-'फॉर द सबजेक्ट ऑफ़ दीज़ वर्ड्स', डॉम.

लता मंगेशकर की नाराज़गी

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इस तरह के न जाने कितने किस्से अशोक चोपड़ा ने अपने संस्मरणों की किताब 'स्क्रैपबुक ऑफ़ मेमोरीज़' में बयान किए हैं. अपने चालीस साल के करियर में अशोक चोपड़ा को भारत के चोटी के लेखकों जैसे खुशवंत सिंह, शोभा डे, लापिएरे और कोलिंस और डॉम मोरेस जैसे लोगों को प्रकाशित करने का मौका मिला है.

अशोक बताते हैं कि डॉम से इंदिरा गाँधी की नाराज़गी की वजह शायद ये थी कि किसी ने इंदिरा गाँधी के कान भर दिए थे कि डॉम की इस किताब में उनके लिए अनाप-शनाप लिखा गया है.

जबकि वास्तव में ऐसा कुछ नहीं था क्योंकि विकास पब्लिशिंग हाउज़ इस किताब के भारत में एजेंट थे और अशोक उस समय विकास के लिए काम कर रहे थे. उन्होंने इस किताब के एक-एक अक्षर को बारीकी से पढ़ा था. इंदिरा गाँधी ने बाकायदा अपॉयंटमेंट देकर डॉम को बेइज़्ज़त करने के लिए अपने घर बुलाया था.

अशोक बताते हैं कि इसी तरह की घटना उनके एक और लेखक राजू भारतन के साथ हुई थी जब उन्होंने लता मंगेशकर पर एक किताब लिखी थी. अशोक ने जब प्रकाशक के तौर पर लता पर लिखी जीवनी की एक प्रति उन्हें फूलों के गुलदस्ते और मिठाई के डिब्बे के साथ भिजवाई तो उन्होंने उसे लेने से साफ़ इंकार कर दिया.

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बाद में लता को नज़दीक से जानने वाले राज सिंह डूंगरपुर ने अशोक चोपड़ा का बताया कि लता इस 'अनऑथोराइज़्ड' जीवनी से इतनी नाराज़ थीं कि वो उसके खिलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करना चाहती थीं.

लता शायद इस बात से ख़फ़ा थी कि इस किताब में उनकी बहन आशा भोसले की काफ़ी तारीफ़ की गई थी और उनकी प्रतिद्वंद्वी अनुराधा पौडवाल को उनके ख़िलाफ़ बोलने के लिए ख़ासा मंच प्रदान किया गया था.

एमएफ़ हुसैन की ज़िद

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अशोक चोपड़ा एमएफ़ हुसैन को बाबा कहा करते थे. एक बार वो अपने खादी कुर्ते और नेहरू जैकेट में नंगे पैर अशोक के ओखला स्थित दफ़्तर पहुंचे. उस समय अशोक इंडिया टुडे के लिए काम कर रहे थे.

हुसैन ने कहा कि आपको केरल के ऊपर दस दिनों के अंदर एक कॉफ़ी टेबल बुक छापनी है जिसकी 400 प्रतियां मैं अपने साथ बेल्जियम ले जाना चाहता हूं जहां 'फ़ेस्टिवल ऑफ़ इंडिया' के दौरान उनका विमोचन होगा.

अशोक ने कहा, "बाबा दस दिनों के अंदर कॉफ़ी टेबल बुक को डिज़ाइन करना, छापना और बाउंड करना असंभव है."

हुसैन बोले, 'मैं ये सब कुछ नहीं जानता. मैं इतना जानता हूँ कि तुम इसे कर सकते हो.' अशोक ने हुसैन की वो मुराद पूरी की. उन्होंने हुसैन से कहा कि इस किताब को छापने के एवज़ में क्या आप मेरे लिए कुछ लाइनें लिख सकते हैं?

हुसैन ने कहा कि लिख तो नहीं पाऊंगा. हां तुम्हारे लिए एक चित्र ज़रूर बना सकता हूं. मुझे एक कागज़ और कुछ रंग दो.

एक प्रकाशक के दफ़्तर में कागज़ की तो कोई कमी नहीं थी लेकिन कोई रंग उपलब्ध नहीं थे. हुसैन ने अपनी वेस्टकोट की जेब से एक काला मार्कर पेन निकाला और पूछा, 'क्या बनाऊं तुम्हारे लिए?'

चोपड़ा ने जवाब दिया, 'किताब पढ़ती हुई एक खूबसूरत सी औरत.' हुसैन ने वो चित्र बनाया. उस पर अपने दस्तख़त किए. वो चित्र आज भी अशोक चोपड़ा की बैठक की शोभा बढ़ा रहा है.

आईएस जोहर की आत्मकथा

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एक बार मशहूर कॉमेडियन आईएस जोहर चोपड़ा के पास अपनी आत्मकथा लेकर आए. चोपड़ा कहते हैं कि 40 साल बाद भी उसके मसालेदार अंश उन्हें याद हैं. जोहर आम ज़िंदगी जीने के आदी नहीं थे.

उनकी आत्मकथा एक तरह से कागज़ पर ब्लू फ़िल्म थी. पहले वो उसे लेकर खुशवंत सिंह के पास गए और चाहते थे कि वो उसके कुछ अंश इलिस्ट्रेटेड वीकली में छापें.

लेकिन वो आत्मकथा खुशवंत सिंह जैसे बेबाक संपादक के स्तर से भी कहीं ज़्यादा बोल्ड थी और उसमें जोहर ने उन तमाम महिलाओं के नाम ले रखे थे जिनके उनके साथ कभी संबंध रहे थे.

खुशवंत ने उसे छापने से इंकार कर दिया और कहा कि आप अशोक चोपड़ा के पास जाकर अपना भाग्य आज़मा सकते हैं. अशोक कहते हैं कि दिलचस्प बात ये थी कि जोहर उसमें से एक शब्द भी हटाने के लिए तैयार नहीं थे.

जब उन्होंने भी उसे छापने में अपनी असमर्थता दिखाई तो जोहर ने झटके से पांडुलिपि उनके हाथ से छीनी और बोले, 'ऐसी चीज़ें छापने के लिए आदमी मे दम होना चाहिए. आप में वो नहीं है.'

अशोक कहते हैं कि मुझे पता नहीं कि उस आत्मकथा का क्या हुआ. लेकिन अगर आज वो मुझे मिले तो मैं शायद उसे छापने के बारे में सोचूं.

अमृता प्रीतम से लेकर साहिर का साथ

Image caption बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ अशोक चोपड़ा.

उसी तरह के एक और दिलचस्प इंसान थे बलवंत गार्गी जिनको नज़दीक से जानने का मौका अशोक चोपड़ा को मिला था. गार्गी का आदर्श वाक्य था, "कहीं कोई कुछ छुपाने की कोशिश कर रहा है. वही ख़बर है. बाक़ी सब जनसंपर्क है."

गार्गी को हसीन लड़कियों का साथ बहुत पसंद था. कर्ज़न रोड पर उनका एक कमरे का फ़्लैट हुआ करता था. वहां वो धारीदार लुंगी-कुर्ता पहनकर पालथी मारकर गद्दे पर बैठा करते थे. उनके पीछे पिकासो की वर्ष 1902 की ब्लू न्यूड का फ़्रेम्ड प्रिंट लगा करता था.

वहां पर दिल्ली और मुंबई के नाट्य और साहित्य जगत की बड़ी-बड़ी हस्तियां हर शाम जमा होती थीं...अमृता प्रीतम से लेकर करतार सिंह दुग्गल, अलकाज़ी, मनोहर सिंह, अली सरदार जाफ़री और साहिर लुधियानवी तक.

अजीबोगरीब शर्त

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चोपड़ा सतीश गुजराल के घर हुई एक पार्टी का ज़िक्र करते हैं जहां दिल्ली के साहित्य जगत की दस बड़ी हस्तियां मौजूद थीं. शराब और सिगरेट के दौर चल रहे थे.

एक महिला ने सतीश का हाथ पकड़ कर कहा, "तुम मुझे अपनी वो पेंटिंग क्यों नहीं भेंट में दे देते?" सतीश गुजराल ने बिना पलक झपकाए कहा, "मैं अपनी पेंटिंग किसी को भेंट नहीं करता. ये वेश्यावृत्ति से भी गई-गुज़री चीज़ है."

उस महिला ने कहा कि तुम्हारी पेंटिंगों का मक़सद क्या है अगर वो आम लोगों के पास नहीं पहुंच पातीं. उसने फिर इसरार किया कि सतीश वो पेंटिंग तुम मुझे दे दो. सतीश ने कहा, "ठीक है, लेकिन एक शर्त पर. तुम स्टूल पर खड़ी हो, अपने सारे कपड़े उतारो और उस पेंटिंग के पास जाकर उसे उठा लो."

वो महिला स्टूल के ऊपर चढ़ी. मौजूद सारे लोगों के ऊपर उसने नज़र दौड़ाई और एक-एक करके उसने अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए....पहले साड़ी...पेटीकोट और फिर ब्लाउज़. उसके शरीर पर सिर्फ़ पैंटी और ब्रा रह गए.

तमाशबीनों में मौजूद महिलाओं ने चिल्लाकर कहा, "बस करो इतना काफ़ी है." सतीश ने तुरंत चिल्लाकर कहा, "नहीं अभी शर्त पूरी नहीं हुई."

वो महिला ये सुन कर हंसी, मॉडल की तरह घूमी और एक झटके में उसने अपने बाक़ी कपड़े भी उतार दिए. उस महिला ने अपने कपड़े उठाए. दूसरे कमरे में जाकर उन्हें पहना और उस पेंटिंग को उठाने बढ़ गई.

सतीश गुजराल को इसकी उम्मीद नहीं थी कि वो महिला इस हद तक चली जाएगी. उनका मुंह शर्म से लाल हो गया जैसे उन्हें ही सबके सामने नंगा कर दिया गया हो. उन्होंने पेंटिंग देने का अपना वादा निभाया लेकिन वो बहुत शर्मिंदा हुए.

दिलीप कुमार का चॉकलेट शौक़

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अशोक चोपड़ा की किताब में दिलीप कुमार का बहुत मार्मिक चित्रण किया गया है. चोपड़ा के अनुसार भारतीय फ़िल्म जगत में सिर्फ़ दिलीप कुमार और लता मंगेशकर को ही लीजेंड कहा जा सकता है. जब चोपड़ा ने उनकी आत्मकथा 'द सब्सटेंस एंड द शैडो' को छापा तो वो उसकी पहली प्रति लेकर दिलीप कुमार के पास गए. दिलीप ने उनका हाथ ज़ोर से जकड़ लिया.

साएरा बानो की आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने कहा कि फ़ौरन मिठाई लाओ. लेकिन दिलीप ने कहा कि अशोक को चॉकलेट खिलाओ मेरे कमरे से मंगा कर. वो चॉकलेट के बहुत शौकीन थे. उन्हें ये भी याद रहता था कि पिछली मुलाकात में उन्होंने कौन सी चॉकलेट खिलाई थी.

जब बेगम अख़्तर ने पकड़े पैर

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अशोक चोपड़ा ने एक पार्टी का बहुत मार्मिक चित्रण किया है जो मशहूर लेखिका उमा वासुदेव के घर हुई थी. सब लोग खा-पी रहे थे कि अचानक वहां बेगम अख़्तर पहुंच गईं थीं. पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. वहां पर उन्होंने अपनी कुछ ग़ज़ले सुनाई. उस समय उमा की अपने पति एलके मल्होत्रा ने बन नहीं रही थी और वो एक-दूसरे से तलाक लेने के बारे में सोच रहे थे.

जब पार्टी ख़त्म हो गई तो उमा और अशोक, बेगम अख़्तर को छोड़ने उनकी कार तक आए. तभी बेगम अचानक झुकी और उन्होंने उमा वासुदेव के पांव पकड़ लिए और बोलीं, 'उमा मैं तुम्हारे पांव पड़ती हूं...ये शादी मत टूटने दो...बेटा ख़ुदा के वास्ते मत तोड़ो.'

उमा की आंखों से आंसू बह निकले. उन्होंने बेगम को ज़ोर से भींच लिया. अशोक बेगम अख़्तर को कार तक लेकर आए. डबडबाई आखों के साथ वो कार में बैठीं और आगे बढ़ गईं.

ये अशोक चोपड़ा और बेग़म अख़्तर की आख़िरी मुलाकात थी.

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