इन 40 दिनों के लिए शुक्रिया 'मेन इन ब्लू'

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पिछले महीने मैं एडिलेड की विलियम स्ट्रीट पार कर रहा था और मेरे आगे एक भारतीय मूल के बुज़ुर्ग थे. मेरा रुख एडिलेड ओवल मैदान था, जहाँ अगले दिन भारत-पाकिस्तान विश्व कप का अपना पहले मैच खेलने वाले थे. सड़क पार करते ही वो बोले, "भारत से लगते हो और पक्का मैच देखने आए होगे. मुझे यहाँ 27 वर्ष हो गए लेकिन पिछले दो महीनों में हमारी टीम जिस कदर पिटी है मुझसे अब विश्व कप देखा नहीं जाएगा."

उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन

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मैं खुद जब विश्व कप कवर करने निकल रहा था तब पत्नी ने पूछा था, "कप फिर मिल सकेगा क्या." मेरी हंसी छूट गई थी. क्योंकि दो महीने तक ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर टीम इंडिया के नसीब में सिर्फ़ करारी हार ही रही थी, चाहे टेस्ट शृंखला हो या त्रिकोणीय मैच. लेकिन 15 फ़रवरी को एडिलेड में पाकिस्तान को हराकर धोनी की टीम ने न सिर्फ समर्थकों बल्कि पत्रकारों तक को भौचक्का कर दिया था.

दमदार खेल से बढ़ीं उम्मीद

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बहरहाल, लगा था अब तो अगला मैच दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ है और नतीजा सभी को पता ही है. फिर मेलबर्न में जिस तरह से दक्षिण अफ़्रीका भारत के आगे ढही उसके बाद उम्मीदें बढ़नी स्वाभाविक थीं. वेस्टइंडीज़, ज़िम्बाब्वे वगैरह को हराकर तो टीम अजेय सी बनती जा रही थी. न चाहते हुए भी मैं 2011 के उस महीने में जा पहुंचा था जब भारत ने एक दिवसीय विश्व कप जीता था.

जीत का 'टोटका'

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हालांकि मैं टोटकों में ज़्यादा भरोसा नहीं करता लेकिन ऑस्ट्रेलिया आते समय दराज़ से वही घड़ी निकाल ली थी जो तब पहना करता था. दफ़्तर के मित्र फ़ोन पर याद भी दिला रहे थे, "पिछली बार भी तुमने कवर किया था इस बार भी तुम पर ही भरोसा है." क्वार्टर फ़ाइनल के दौरान मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड में बैठ कर यही सोच रहा था कि अब तो बस दो मैच और हैं. ऑस्ट्रेलिया में पिछले चंद महीनों के दौरान टीम इंडिया के प्रदर्शन की बात ज़हन में कहीं खो गई थी. ये तो सब जानते थे कि ऑस्ट्रेलिया भारत से कहीं ज़्यादा मज़बूत टीम है लेकिन मेरी तरह उन्हें भी लग रहा था कि क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है.

ऑस्ट्रेलिया ने तोड़ी खुमारी

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सिडनी के सेमीफ़ाइनल में जब ऑस्ट्रेलियाई टीम ने शुरूआती 25 ओवर में बल्लेबाज़ी का अपना हुनर दिखा दिया तब प्रेस बॉक्स में बैठा हुआ मैं भी अपनी खुमारी से जागा. मज़बूत टीम की जीत हुई और ऐसी टीम से हारने में कोई खराबी भी नहीं, क्योंकि किसी को तो जीतना ही था. लेकिन धोनी और उनके सहयोगियों ने क्रिकेट के दीवाने करोड़ों भारतीयों को 40 दिन तक जो ख़ुशी के पल दिए उसका एहसास मुझे बहुत करीब से होता रहा. अगर अगला क्रिकेट विश्व कप कवर करने लायक रहा तो दराज़ से पुरानी घड़ी नहीं निकलूंगा.

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