'गोहत्या रुकी नहीं, क़ानून का दुरुपयोग जारी'

  • 2 अप्रैल 2015
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गुजरात सरकार ने 2011 में गोहत्या और गोमांस का व्यापार करने पर सात साल कैद की सज़ा और 50 हज़ार तक ज़ुर्माने का प्रावधान किया.

इससे पहले 1954 गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम में गोहत्या रोकने के लिए कोई प्रावधान नहीं था.

तत्कालीन भाजपा सरकार ने तब कांग्रेस की मदद से गुजरात पशु संरक्षण संशोधन बिल 2011 को विधानसभा में पारित करवाया था.

नए संशोधनों के बाद गोमांस के व्यापार, भंडारण और बीफ़ या उसके किसी भी उत्पाद का परिवहन गुजरात राज्य में प्रतिबंधित कर दिया गया.

कानून में गोमांस ढोने वाले वाहन को ज़ब्त करने के प्रावधान हैं. इसके अलावा पशु को ढोने वाले वाहन का परमिट जारी करने का अधिकार कृषि और पशुपालन विभाग को दे दिया गया.

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जानकर मानते हैं कि इससे गोहत्या बंद नहीं हुई है.

गुजरात में पशु पालक समाज के नेता लालजी देसाई मानते हैं कि गुजरात सरकार को गोरक्षा में कोई लगाव नहीं और आज भी गुजरात में गोहत्या बेरोक-टोक हो रही है.

वह सरकार पर नए कानून का दुरुपयोग कर कौमी हिंसा का माहौल भड़काने का भी आरोप लगाते हैं.

देसाई कहते हैं, "गुजरात सरकार को अगर मवेशियों की चिंता होती तो वह टाटा, एस्सार और अडानी को ज़मीन नहीं देती. आज गुजरात के कई गांवों में गोचर ज़मीन नहीं है."

साल 2011 के कानून के बारे में वह कहते हैं, "कानून का दुरुपयोग कर पुलिस भ्रष्टाचार कर रही है. आरएसएस और वीएचपी से जुड़ी संस्थाओं ने मामला और पेचीदा किया है, जो पशुपालन से जुड़े लोगों से और मांस का अवैध कार्य करने वालों से हफ्ता वसूलती हैं."

गौ अभ्यारण्य

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देसाई मानते हैं कि सरकार ने राजनैतिक कारणों से यह क़ानून बनाया है और इसका उपयोग लोग सांप्रदायिक तनाव फैलाने में करते है.

उनके अनुसार, "गुजरात के कच्छ में मुस्लिम गायों की रक्षा में सबसे आगे रहे हैं. पर नए कानून के बाद उनके लिए व्यापार करना नामुमकिन होता जा रहा है. कच्छ और गुजरात में कई जगह पुलिस ने पशुपालकों को गिरफ्तार किया और उनकी गाय और गाड़ी ज़ब्त कर ली. जब तक गाय कोर्ट के आदेश पर छूटी वह दूध देने लायक नहीं रही."

हालांकि गुजरात सरकार के गऊ सेवा और गोचर विकास बोर्ड के चेयरमैन वल्लभ कथीरिया देसाई की बातों से सहमत नहीं.

उन्होंने कहा, "गुजरात में अधिकतर गांवों में गोचर ज़मीन है और सरकार या पुलिस किसी को तंग नहीं करते. इस बोर्ड के पास गऊ सेवा और गोचर विकास के लिए 500 करोड़ रुपये का बजट है."

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हालांकि गुजरात के कई पुलिस थानों में और अदालतों में मवेशियों के पकड़े और उनके पशु को ज़ब्त करने के मामले दर्ज हैं.

लेकिन कथीरिया इस बात से इनकार करते हैं. गुजरात सरकार ने कुछ साल पहले पोरबन्दर के पास एक गौ अभ्यारण्य बनाने की भी बात कही थी.

वह कहते हैं, "उस पर काम चल रहा है. एक करोड़ रुपये का बजट इसके लिए प्रस्तावित हुआ है."

पुलिस की मुश्किल

मामले में सबसे ज़्यादा पुलिस अफ़सर फंसे हैं और नए कानून को लेकर कोई बात नहीं करना चाहता.

गुजरात के एक वरिष्ठ पुलिस अफ़सर ने बिन नाम सार्वजनिक किए बताया, "होता यह है कि देर शाम या रात वीएचपी या आरएसएस की किसी संस्था से जुड़े कार्यकर्ता थाने में गोमांस या अवैध रूप से गाय रखने के ठिकाने की सूचना देते हैं."

"उस वक़्त उस पुलिस स्टेशन में जो दो-तीन लोग हैं वह उस जगह दौड़ पड़ते हैं और कई बार उन पर हमला हो जाता है. कई बार छापा कारगर होता है और कभी कुछ अवैध हाथ नहीं लगता."

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पिछले साल अहमदाबाद, वड़ोदरा और नवसारी में इस तरह के पुलिस छापों के बाद लोगों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं और कई पुलिस वाले और लोग जख़्मी हुए.

अहमदाबाद के शाहपुर इलाके में बक़रीद के दिन गोमांस ढूढ़ने पहुंची पुलिस का लोगों ने जमकर विरोध किया.

जब किसी के घर से गोमांस नहीं मिला तो भीड़ का गुस्सा भड़क गया और पुलिस को फ़ायरिंग करनी पड़ी जिसमें एक युवक की मौत हो हुई.

पुलिस अधिकारी कहते हैं, "इस अवैध व्यापार में अब कई गिरोह शामिल हैं और ऐसी रेड में चार-पांच पुलिसवाले रात को अपनी जान जोख़िम में डालते हैं."

"अगर विलम्ब हो तो हिन्दू संस्थाओं के कार्यकर्ता उनके ख़िलाफ़ अवैध व्यापार करने वालों से हफ़्ता लेने की शिकायत करते हैं. अगर ख़बर ग़लत निकले तो स्थानीय लोगों का गुस्सा पुलिस को झेलना पड़ता है."

गुजरात में पुलिस सालाना करीब 200 टन गाय या भैंस का मांस जब्त करती है.

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