'बीफ़ खाना सांप्रदायिक नहीं है '

  • 3 अप्रैल 2015
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भारत में गाय को 'पवित्र' माना जाता है, इसलिए हिंदु समुदाय में बहुत से लोग गोमांस नहीं खाते.

सवाल ये है कि भारत में बीफ़ खाने का सिलसिला कैसे शुरू हुआ?

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भारत में बीफ़ एक संवेदनशील मुद्दा है. मुसलमानों को इसमें जोड़ दो तो फिर तथ्यों से जुड़ी और स्वस्थ बहस तो हो ही नहीं सकती. भारत में बीफ़-खाने के मामले में भी यही हो रहा है.

आज बीफ़ न सिर्फ़ मुसलमान बल्कि दलित, आदिवासी, इसाई और उत्तर-पूर्व के निवासी भी खाते हैं. दलितों के लिए यह प्रोटीन का सबसे सस्ता स्रोत है.

जहां तक इतिहास का सवाल है वह हमसे एकदम जुदा कहानी कहता है. भारत के सबसे महान हिंदू संतों में से एक और आरएसएस के मुताबिक हिंदुत्व के व्याख्याता स्वामी विवेकानंद का इस मामले में कुछ और ही विचार है.

अमरीका में अपनी दूसरी यात्रा के दौरान उन्होंने जानबूझकर इस विषय पर सच बोला जिसे हिंदू दक्षिणपंथी आसानी से भूल जाते हैं.

स्वामी विवेकानंद ने कैलिफ़ोर्निया के शेक्सपीयर क्लब में 'बौद्ध भारत' विषय पर बात की थी. उन्होंने प्राचीन भारत में हिंदुओं के बीफ़ खाने के मुद्दे पर जो सच बोला, वह उनके लिए ज़रूर धक्का होगा जो भारत में बीफ़ खाने के लिए मुसलमानों को ज़िम्मेदार बताते हैं.

'मछली, मीट, बीफ़ खाते थे'

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सिस्टर निवेदिता और स्वामी तुरियानंद के साथ उन्होंने उपस्थित लोगों को बताया, "आप लोग यह जानकर चकित रह जाएंगे कि पुराने संस्कारों के अनुसार जो बीफ़ नहीं खाता था वह अच्छा हिंदू नहीं था. कुछ विशेष अवसरों पर हमें सांड को मारकर उसे खाना होता था."

(स्वामी विवेकानंद, स्वामी विवेकानंद का संपूर्ण साहित्य- वॉल्यूम 3. पृष्ठ 536).

बाद में इसकी पुष्टि स्वामी विवेकानंद के स्थापित रामकृष्ण मिशन के प्रायोजित शोध कार्यों में अन्य लोगों ने भी की.

वैदिक भारत के जाने-माने विद्वान सी कुन्हां राजा ने लिखा, "वैदिक आर्य, जिनमें ब्राह्मण भी शामिल थे मछली, मीट और तो और बीफ़ भी खाते थे. विशिष्ट अतिथि को खाने में बीफ़ परोस कर सम्मान दिया जाता था. हालांकि वैदिक आर्य बीफ़ खाते थे, दुधारू गाय को मारा नहीं जाता था."

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"गाय के लिए जो नाम इस्तेमाल किए जाते थे उनमें से एक अघन्या (जिसे मारा नहीं जाना चाहिए) थे. हालांकि अतिथि को गोघना (जिसके लिए गाय मारी जाती है) कहते हैं. सिर्फ़ सांड, बांझ गाय और बछड़े ही मारे जाते थे."

(इस श्रृंखला में सी कुन्हां राजा की 'वैदिक संस्कृति', सुनिति कुमार चैटर्जी और अन्य का इस्तेमाल किया गया है.)

इन तथ्यों से साफ़ है कि बीफ़ खाना सांप्रदायिक नहीं है, जैसे कि आज इसे पेश किया जाता है, बल्कि प्राचीन भारत में यह खाने की निजी पसंद पर निर्भर था.

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