आप देंगे द्रौपदी सम्मान?

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Image caption द्रौपदी के रूप में भारतीय क्लासिक डांसर ऊषा नांगियार

भारत में महिलाओं के साथ होने वाला व्यवहार और समाज में उन्हें दिया गया दर्जा कभी अच्छा नहीं रहा है.

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर की गई टिप्पणी खेदजनक है लेकिन ऐसी बातें पहली बार कही गई हों ऐसा नहीं है.

औरतों को लेकर आमतौर पर इस तरह के असम्मान की एक अहम वजह सदियों से आज़ाद महिलाओं को लेकर बनाई गई धारणा है.

आज जो रवैया औरतों को लेकर है वो बहुत कुछ महाभारत की नायिका द्रौपदी को लेकर भी दिखता है.

आवाज़ बुलंद करने वाले की उपेक्षा

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Image caption द्रौपदी कुण्ड की साल 1975 में ली गयी तस्वीर.

द्रौपदी के कथित जन्म स्थान कांपिल्य की ही अगर बात करें तो ये भेद भाव और साफ़ हो जाता है.

कांपिल्य जिसे अब कांपिल के नाम से भी जाना जाता है, उत्तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद में है.

मिथक मानें या इतिहास द्रौपदी के स्वयंवर और कांपिल्य को अंग्रेज़ों ने राष्ट्रीय संरक्षण दिया, लेकिन इसके बाद आई भारतीय सरकारों ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया.

कुरुक्षेत्र में गुरु द्रोणाचार्य के 'अहिक्षेत्र', अर्जुन के पुराना क़िला (पांडव क़िला), कृष्ण के मथुरा और द्वारका में खुदाई और संरक्षण के काम हुए हैं, लेकिन द्रौपदी के कांपिल्य को विलुप्त होने के लिए छोड़ दिया गया.

क्या इसलिए क्योंकि ये जगह उस महिला से संबंधित है, जिसने अपने ख़िलाफ़ हुई हिंसा के खिलाफ आवाज़ बुलंद की और उस राज्य को ललकारा जो औरतों के सम्मान की रक्षा नहीं कर सकता?

पुरस्कारों तक में लिंगभेद!

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ये लिंगभेद सरकार द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों में भी दिखता है.

सरकार ने महाभारत के सूरमाओं के नाम पर ‘अर्जुन पुरस्कार’ और ‘द्रोणाचार्य पुरस्कार’ तो रखे, लेकिन एक बार फिर द्रौपदी की उपेक्षा हुई.

क्या वजह है कि महाभारत की सबसे सशक्त नायिका द्रौपदी के नाम पर कुछ भी नहीं है?

कृष्ण, अर्जुन, द्रोणाचार्य अमर हैं, लेकिन द्रौपदी को ‘मध्ययुगीन मानसिकता’ वाले लोगों के बीच पांच पतियों की अर्धांगिनी भर समझ कर छोड़ दिया गया है.

साहित्य की बात करें तो भी द्रौपदी को समझने की कोशिशें उस तरह नहीं हुई हैं जिस तरह सीता, उर्मिला या मीरा पर काम किया गया है. द्रौपदी के जन्म से जुड़े मिथक बाताते हैं कि वो एक बेहद बुद्धिमान और बौद्धिक महिला थीं.

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Image caption राम नवमी के लिए राम और सीता की मूर्ति बनाता मूर्तिकार

मेरा मानना है कि उसे भारत की उस पहली महिला के रूप में पहचान मिलनी चाहिए जिसने अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के लिए आवाज़ उठाई.

लेकिन लोक धारणाओं में द्रौपदी की उस पहचान को कभी पेश नहीं किया गया. प्रचलित धारणा तो ये कहती है कि द्रौपदी ने अगर अपने अपमान को नज़रअंदाज़ कर दिया होता तो महाभारत का युद्ध न होता!

हमारे देश में महिलाओं की गरिमा बहाल करने के लिए, हमें ‘द्रौपदी’ को सम्मानित और प्रगतिशील भारतीय महिला के रोल मॉडल के रूप में देखना शुरू करना होगा.

महिलाओं की गरिमा

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पूर्व राजनेता डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने एक बार कहा था, “अगर मुझे सीता और द्रौपदी में किसी एक को चुनना होगा तो मैं द्रौपदी को आदर्श महिला मानूंगा.”

द्रौपदी के प्रति सम्मान दिखाने से, महिलाओं के प्रति असम्मान को सहन नहीं करने का स्पष्ट संदेश जाएगा.

समस्या ये है कि मध्यकालीन मानसिकता अब भी ज़्यादातर लोगों में मौजूद है.

पुरुषों का डर

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Image caption दिल्ली गैंग रेप के विरोध में प्रदर्शन

कई पुरुषों के लिए एक औरत विनम्र पत्नी, बहन या मां है, जो तभी ‘अच्छी और नैतिक’ है, यदि वह अपनी जिंदगी में पुरुष अधिकार को स्वीकार करती है.

इसलिए जब उनका सामना शिक्षित, पेशेवर महिलाओं से होता है, तो वे असुरक्षित महसूस करते हैं. वे उन्हें विद्रोही और अपने लिए चुनौती मानने लगते हैं.

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इसके चलते, वे महिला को डराने के लिए ऐसे हथकंडे और स्थितियां पैदा करते हैं कि वो आज़ादी का दावा करने में खुद को असहज महसूस करें.

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अच्छी बात ये है कि महिलाओं का एक तबका ज़रूर संघर्ष के ज़रिए हज़ारों वर्ष की जबरन अधीनता से बाहर निकला है. उसके पास द्रौपदी की उग्र भावना है और वह बराबरी के रूप में अपनी संप्रुभता हासिल करने के लिए दृढ़-प्रतिज्ञ है.

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