क्या रंगभेदी हैं भारतीय ?

  • 2 अप्रैल 2015
राजीव गांधी और सोनिया गांधी

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के रंग को लेकर दिए बयान पर मीडिया और डिजिटल वर्ल्ड में बहस छिड़ी हुई है

गिरिराज सिंह ने कहा था, "अगर राजीव जी ने किसी नाइजीरियन महिला से शादी की होती, जिसकी गोरी चमड़ी न होती तो क्या कांग्रेस पार्टी उनका नेतृत्व स्वीकार करती."

सोशल मीडियापर ज़्यादातर लोग गिरिराज सिंह के इस बयान को रंगभेदी बयान बता रहे हैं.

बयान की निंदा

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इसमें कोई शक नहीं कि इस बयान की निंदा होनी चाहिए. लेकिन डिजिटल पत्रिका फर्स्टपोस्ट के मुताबिक़ गिरिराज सिंह नस्लवादी होने का आरोप कांग्रेसी ज़रूर लगा रहे हैं, जो उन्हें नहीं करना चाहिए .लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि भारत में काले रंग के खिलाफ भेदभाव आम बात है. दूसरे शब्दों में गोरी चमड़ी को प्राथमिकता हर जगह दी जाती है.

पत्रिका का कहना है कि समाज में मौजूद यह नस्ली भेदभाव देश की सियासत में भी जल्द आ सकता है. पत्रिका ने इसके एक-दो उदाहरण भी दिए हैं.

अभिनेत्री नंदिता दास ने हाल में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था,"हमारे यहाँ रंग (काले) को लेकर हीन भावना है.

वो कहती हैं, "चूंकि मैं ख़ुद सांवली हूं. और आप जब ख़ुद सांवले होते हैं तो आपको बचपन से ही कोई न कोई याद दिलाता रहता है कि आपका रंग औरों से कुछ कम है."

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नंदिता का मानना है कि अगर आप गोरी नहीं हैं, तो आप सुंदर नहीं हैं, क्योंकि जितनी फ़िल्में हैं, जितने विज्ञापन हैं, जितनी ब्यूटी मैग़ज़ीन्स हैं और टीवी सीरियल हैं, सब आपको किसी न किसी तरह से कहते रहते हैं कि आप पर्याप्त सुंदर नहीं हैं.

आम शिकायत

दिल्ली और मुंबई में मेरे कुछ अफ़्रीकी दोस्त हैं, जो अक्सर दो ख़ास शिकायतें करते हैं : एक यह कि पुलिस उन्हें बग़ैर किसी वजह के तंग करती रहती है क्योंकि उनका रंग काला है. और दूसरा यह कि जब भी वो किराए के घर की तलाश में जाते हैं तो उन्हें घर नहीं मिलता है.

दो साल पहले मैंने इस पर एक स्टोरी की थी. इस दौरान मुझे एक भारतीय लड़की शीबा रानी ने बताया था कि उसने जब नाइजीरिया के एक नागरिक से शादी की तब उसे समझ में आया कि समाज में कालेपन को लेकर कितना भेदभाव है.

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उन्होंने कहा,''क्योंकि हमारा समाज गोरे रंग के लिए पागल है. अगर मैंने किसी गोरे आदमी से शादी की होती तो हमारे नए दोस्त बनते और समाज का आशीर्वाद भी मिलता".

शीबा रानी की बातों में दम है. पिछले दस सालों में मैं कई शादियों में गया हूँ जहाँ गोरे मेहमानों को बुलाना एक गर्व की बात समझी जाती है. वो परिवार के करीबी दोस्त भी नहीं होते लेकिन शादी में उनके आने से परिवार की शान बढ़ती है. ऐसा मुझे कई लोगों ने बताया है.

गोरों को महत्व

Image caption कुछ विदेशी यात्रियों ने अपने अनुभव में भारत में गोरे रंग के महत्व को रेखांकित किया है.

हाल में लंदन से आई एक मित्र को मैंने दिल्ली के एक परिवार से मिलाया. कई हफ़्तों के बाद जब मैं उस दोस्त से मिला तो उसने पूछा मैं मिस्टर मेहरा की बेटी की शादी में क्यों नहीं आया. यह सुनकर मैं हैरान रह गया. मेहरा साहेब की बेटी और पूरे परिवार को मैं सालों से जानता हूँ लेकिन मुझे दावत नहीं मिली. मगर मेरी गोरी दोस्त को ज़रूर बुलाया जिससे वो केवल एक बार मिले थे.

भारत में गोरी चमड़ी से यह मोहब्बत पुरानी है. बल्कि उस समय से है जब से यूरोप के लोग व्यापार के कारण बंगाल, गोवा और केरल में आकर रहने लगे थे.

फ्रांस के एक यात्री फ्रांसुआ बेर्नियर 1656 में दिल्ली आए थे. वो 1668 में अपने देश वापस लौटे. उन्होंने अपनी पुस्तक 'ट्रेवल्स इन दा मुग़ल एम्पायर' में कई बार इस बात को लिखा है कि वो जहाँ भी जाते थे उनका स्वागत खूब होता था. इसकी एक वजह उनका श्वेत होना भी था.

एक जगह वो लिखते हैं, " यूरोप से आए लोगों को वो (भारतीय) खुद से उच्च मानते हैं."

क्या यह रोग समाज में आज भी मौजूद नहीं है?

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