बीफ़ बैनः पोषण पर क्या पड़ेगा असर?

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महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों में बीफ़ पर प्रतिबंध को क़ानूनी बनाना और शायद इसे लागू करना आसान हो सकता है, लेकिन आहार विशेषज्ञों का कहना है कि बीफ़ जितना प्रोटीन पाने के लिए लोगों को उसकी तुलना में कहीं ज़्यादा खर्च करना पड़ेगा.

आहार विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि सब जगह बीफ़ का सस्ता और आसानी से उपलब्ध विकल्प सब जगह सहजता से नहीं मिलेगा.

बीफ़ में प्रोटीन ज़्यादा

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हैदराबाद में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूट्रिशन के पूर्व निदेशक डॉक्टर बी सेसीकरन ने बीबीसी को बताया, "अगर कोई सिर्फ़ एक स्रोत से सबसे अधिक प्रोटीन चाहता है तो यह है बीफ़. इसमें अन्य मांस और यहां तक कि सब्ज़ियों से भी ज़्यादा प्रोटीन मिलता है."

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वह कहते हैं, "हालांकि शाकाहारी और मांसाहारी स्रोतों में भी इसका विकल्प मौजूद है, लेकिन यह बीफ़ के मुक़ाबले काफ़ी महंगा पड़ता है."

इंडियन डायटेटिक्स एसोसिएशन की अध्यक्ष डॉक्टर शीला कृष्णास्वामी कहती हैं, "बीफ़ प्रोटीन और आयरन का सबसे बढ़िया स्रोत है. लेकिन चिकन, मछली, दालों और मूंगफली भी प्रोटीन के दूसरे स्रोत हैं, जो से मिलने वाले प्रोटीन की कमी की पूरा सकते हैं. जैसे हरी और पत्ती वाली सब्जियों, मुनक्का, और अंजीर में पर्याप्त आयरन होता है."

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क्यूआ न्यूट्रिशन के सह संस्थापक और मुख्य आहार विशेषज्ञ रेयान फ़र्नांडो कहते हैं, "सब्जी में पाए जाने वाले प्रोटीन के मुक़ाबले अलग-अलग मांस में प्रोटीन का प्रतिशत अलग-अलग होता है. मान लीजिए एक किलो बीफ़ से आपको 30 प्रतिशत प्रोटीन मिलता है, तो एक किलो सब्जी से आपको लगभग 15 से 20 प्रतिशत प्रोटीन ही मिलेगा."

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फ़र्नांडो के अनुसार, "अगर आप सब्जी का विकल्प चुनते हैं तो आपको प्रोटीन वाले अन्य स्रोतों को भी भोजन में शामिल करना पड़ेगा."

नकारात्मक पक्ष

डॉक्टर सेसीकरन और डॉक्टर कृष्णास्वामी दोनों ही इस बात पर जोर देते हैं कि बीफ़ जैसा रेड मीट खाने का सबसे बड़ा नकारात्मक पक्ष है, उसमें कोलेस्ट्राल और संतृप्त वसा (सैचुरेटेड फ़ैट) ज़्यादा होती है.

उदाहरण के लिए एक खिलाड़ी, जो शाकाहारी है, के लिए फर्नांडो का सुझाव है कि उसे अधिक मात्रा में प्रोटीन वाली सब्जियां खानी चाहिए.

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डॉक्टर सेसीकरन का कहना है, "अंडे या दूध भी प्रोटीन के बेहतरीन स्रोत हैं और सफेद मांस के मुक़ाबले यह अधिक महंगे भी नहीं होते. सोयाबीन भी प्रोटीन का सबसे बढ़िया स्रोत है."

"पोषक तत्वों के विकल्पों को इस या उस तरीक़े से पूरा किया जा सकता है लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराएं, सदियों से चले आ रहे रीति रिवाज़ रातों रात नहीं बदल सकते. क़ानून लाकर आचार-व्यवहार में बदलाव लाना संभव नहीं है. इससे असंतोष पैदा होता है."

विकल्प की कमी

उदाहरण के लिए सेसीकरन कहते हैं कि, "बीफ़ खाए जाने वाले राज्य केरल में यदि प्रतिबंध लग जाए तो लोगों के लिए मछली का विकल्प चुनना संभव है. लेकिन पूर्वोत्तर के राज्यों में, जहां पर्याप्त मछली नहीं मिलती, लोगों के लिए चिकन का विकल्प चुनना मुश्किल होगा."

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डॉ. कृष्णास्वामी के अनुसार, "शायद, प्रोटीन के अन्य स्रोतों का आदी होने में लोगों को कुछ समय लगेगा. इससे लंबे समय में, लोगों की सेहत प्रभावित नहीं होगी."

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