रोज़ एक क़ानून ख़त्म करने का सपनाः मोदी

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को दिल्ली में हो रही राज्यों के मुख्यमंत्रियों और न्यायधीशों के सम्मेलन में बोलते हुए न्यायपालिका को सामान्य आदमी की सबसे बड़ी उम्मीद बताया.

मोदी के भाषण के मुख्य बिंदु

हमें सोचना होगा कि कहीं फ़ाइवस्टार एक्टिविस्ट कोर्ट को ड्राइव तो नहीं कर रहे हैं. ऐसे माहौल में न्याय देना कहीं मुश्किल तो नहीं हो गया है. जब मैं मुख्यमंत्री था तब हाईकोर्ट के एक जज ने बताया था कि हमारी कोर्ट हफ़्ते में दो-तीन दिन चलती है और हर रोज़ दो-तीन घंटे चलती है. क्योंकि हम जिस बिल्डिंग में काम करते हैं वहाँ उजाला नहीं है, बिजली नहीं है. बिजली क्यों नहीं है....क्योंकि कोई फ़ाइव स्टार एक्टिविस्ट अदालत में जाकर स्टे ले आया था कि यहाँ खम्भा नहीं लगेगा इसलिए बिजली नहीं है.

अब नेताओं के ऊपर जितना दबाव है, उतना पहले कभी नहीं था. पहले जिन बातों को गॉसिप कॉलम में भी नहीं जगह मिलती थी, अब ऐसी बातें ब्रेकिंग न्यूज़ बनती हैं. लेकिन न्यायपालिका के साथ ऐसा नहीं है.

चाहे लोकपाल हो या आरटीआई, राजनेता अपने ऊपर बंदिशें ख़ुद लगा रहे हैं लेकिन अदालतों के ऊपर कोई अंकुश नहीं है. अदालतों को ये काम ख़ुद करना होगा.

भारत सरकार में क़रीब-क़रीब 100 ट्रिब्यूनल हैं. एक एक मंत्रालय में चार-चार ट्रिब्यूनल हैं...देखना होगा कि ट्रिब्यूनल व्यवस्था की ज़रूरत है या नहीं. ट्रिब्यूनलों का पैसा अगर अदालतों को चला जाए तो व्यवस्था में बहुत सुधार हो सकता है.

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दुनिया में साइबर क्राइम के मामले बढ़ रहे हैं. आने वाले समय में अंतरिक्ष में मुक़दमेबाज़ी और क़ानूनों की बात भी आएगी जिसके लिए हमें तैयार रहना होगा.

आज फ़ॉरेंसिक साइंस का प्रयोग बढ़ रहा है. हमें इसके लिए वकीलों और जजों को प्रशिक्षित करना होगा. हमने इसके लिए गुजरात में फ़ॉरेंसिक साइंस की एक यूनिवर्सिटी खोली थी जो दुनिया की अपनी तरह की अकेली यूनिवर्सिटी है.

हमारे यहाँ कई गैर ज़रूरी क़ानून हैं. मेरा सपना था कि हर दिन एक क़ानून ख़त्म करूं. अभी मैंने 700 कानूनों को ख़त्म करने के लिए कैबिनेट से अप्रूवल ले लिया है. अभी 1700 ऐसे कानून हमारी नज़र में हैं.

क्रिमिनल ऑफ़ेंसेज़ की तुलना में इकॉनमिक ऑफ़ेंस बढ़ रहे हैं. अब हमारी विशेषज्ञता उस तरफ बढ़ानी होगी.

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